Satya Darshan

नया खुलासा: नोटबंदी के बाद सबसे गरीब तबके की 50 लाख नौकरियां गईं - CSE रिपोर्ट

अप्रैल 17, 2019

नवंबर 2016 की एक शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक लागू की गई नोटबंदी के बाद दो साल के भीतर समाज के सबसे वंचित तबके और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले 50 लाख लोग बेरोजगार हो गए। आज बंगलुरु में अजीम प्रेमजी युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्‍टेनेबल एम्‍पलॉयमेंट (सीएसई) द्वारा जारी की गई ‘’स्‍टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2019’’ नामक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

रिपोर्ट के लेखक और सीएसई के प्रमुख प्रो. अमित बसोले ने रिपोर्ट को जारी करते हुए कहा, ‘’यह शुद्ध आंकड़े हैं इसलिए कहीं अगर और नौकरयां जुडी भी होंगी तो जो कुल रोजगारों का नुकसान हुआ वे पचास लाख हैं। यह खासकर इसलिए अहम है क्‍योंकि इस बीच जीडीपी में वृद्धि देखी गई है। लिहाजा कुल कार्यबल में इतनी गिरावट अच्‍छी बात नहीं है। इसे बढ़ना चाहिए था।‘’

सीएसई के अध्यक्ष और रिपोर्ट लिखने वाले मुख्य लेखक प्रोफेसर अमित बसोले ने हफिंगटनपोस्ट से कहा कि, इस रिपोर्ट में कुल आंकड़े हैं। इन आंकड़ों के हिसाब से 50 लाख रोजगार कम हुए हैं। कहीं और नौकरियां भले ही बढ़ी हों लेकिन ये तय है कि पचास लाख लोगों ने अपना नौकरियां खोई हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। बसोले ने आगे बताया कि कि डेटा के अनुसार, नौकरियों में गिरावट नोटबंदी के आसपास हुई (सितंबर और दिसंबर 2016 के बीच चार महीने की अवधि में) और दिसंबर 2018 में अपने स्थिरांक पर पहुंची।

बसोले ने बताया कि रोजगार नोटबंदी के दौरान चार महीने में कम हुए (सितंबर से दिसंबर 2016) और दिसंबर 2018 तक बेरोजगारी अपने चरम पर पहुंच गई। रिपोर्ट कहती है कि रोजगारों का घटना नोटबंदी के आसपास शुरू हुआ था लेकिन उन्‍होंने यह भी कहां कि रिपोर्ट उपलब्‍ध आंकड़ों के आधार पर नोटबंदी और रोजगारों की गिरावट के बीच में कोई ‘’कार्य-कारण संबंध’’ स्‍थापित नहीं कर सकी है। ऐसा हफिंगटन पोस्ट ने अपनी खबर में रिपोर्ट किया है।

गौरतलब है कि रोजगार संबंधी एनएसएसओ के आंकड़ों को कुछ दिन पहले सरकार ने दबा दिया था जिसके बाद उसके दो शीर्ष अधिकारियों ने इस्‍तीफा दे दिया था। बिजनेस स्‍टैंडर्ड ने एनएसएसओ के हवाले से बताया था कि भारत में बेरोजगारी की दर 2017-18 में पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्‍यादा है।

'सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्लॉयमेंट' की ओर से जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अपनी नौकरी खोने वाले इन 50 लाख पुरुषों में शहरी और ग्रामीण इलाकों के कम शिक्षित पुरुषों की संख्या अधिक है। इस आधार पर रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि नोटबंदी ने सबसे अधिक असंगठित क्षेत्र को ही तबाह किया है।

'2016 के बाद भारत में रोजगार' वाले शीर्षक के इस रिपोर्ट के छठवें प्वाइंट में नोटबंदी के बाद जाने वाली 50 लाख नौकरियों का जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 के बाद से कुल बेरोजगारी दर में भारी उछाल आया है. 2018 में जहां बेरोजगारी दर 6 फीसदी थी। यह 2000-2011 के मुकाबले दोगुनी है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में बेरोजगार ज्यादातर उच्च शिक्षित और युवा हैं। शहरी महिलाओं में कामगार जनसंख्या में 10 फीसदी ही ग्रेजुएट्स हैं, जबकि 34 फीसदी बेरोजगार हैं। वहीं, शहरी पुरुषों में 13.5 फीसदी ग्रेजुएट्स हैं, मगर 60 फीसदी बेरोजगार हैं।  

इतना ही नहीं, बेरोजगारों में 20 से 24 साल की संख्या सबसे अधिक है। सामान्य तौर पर पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुई हैं। पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों में बेरोजगारी और श्रम भागीदारी दर बहुत ज्यादा है।

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