Satya Darshan

भाग_4

गीता-बोध : चौथा अध्याय
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सोमप्रभात
1-12-30

भगवान ने अर्जुन से कहा कि मैंने जो निष्काम कर्मयोग तुझे बतलाया है वह बहुत प्राचीन काल से चला आता है, यह नया नहीं है। तू प्रिय भक्त है इसलिए, और इस समय धर्म-संकट में है इसलिए, उसमें से मुक्त करने के लिए, मैंने तेरे सामने इसे रखा है। जब-जब धर्म की निंदा होती है और अधर्म फैलता है तब-तब मैं अवतार लेता हूँ और भक्तों की रक्षा करता हूं, पापी का संहार करता हूँ।

मेरी इस माया को जो जानने वाला है वह विश्वास रखता है कि अधर्म का लोप अवश्य होगा, साधु पुरुष का रक्षक ईश्वर है। ऐसे मनुष्य धर्म का त्याग नहीं करते और अंत में मुझे पाते हैं, क्योंकि वे मेरा ध्यान धरने वाले, मेरा आश्रय लेने वाले होने के कारण काम-क्रोधादि से मुक्त रहते हैं और तप तथा ज्ञान से शुद्ध हुए रहते हैं।

मनुष्य जैसा करता है, वैसा फल पाता है। मेरे नियमों से बाहर कोई रह नहीं सकता। गुण- कर्म-भेद से मैंने चार वर्ण पैदा किये हैं, फिर भी मुझे उनका कर्ता मत समझ, क्योंकि मुझे इस कर्म में से किसी फल की आकांक्षा नहीं है, न इसका पाप-पुण्य मुझे होता है। यह ईश्वरी माया समझने योग्य है।

जगत में जितनी प्रवृत्तियां हैं, सब ईश्वरी नियमों के अधीन होती हैं, फिर भी ईश्वर उनसे अलिप्त रहता है, इसलिए वह उनका कर्ता है और अकर्ता भी। यों अलिप्त रहकर, अछूते रहकर, फलेच्छा से रहित होकर चलें तो अवश्य मोक्ष पा जाये।

ऐसा मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और ऐसे मनुष्य को न करने योग्य कर्म का भी तुरंत पता चल जाता है। कामना से संबंधित कर्म, जो कामना के बिना हो ही नहीं सकते, वे सब न करने योग्य कर्म कहलाते हैं- उदाहरण के लिए, चोरी, व्यभिचार इत्यादि।

ऐसे कर्म कोई अलिप्त रहकर नहीं कर सकता। इसलिए जो कामना और संकल्प छोड़कर कर्त्तव्य-कर्म करता है, उसके बारे में कहा जाता है कि उसने अपने ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा अपने कर्मों को जला डाला है।

यों कर्मफल का संग छोड़ने वाला मनुष्य सदा संतुष्ट रहता है, सदा स्वतन्त्र होता है। उसका मन ठिकाने होता है, वह किसी संग्रह में नहीं पड़ता और जैसे आरोग्य‍वान पुरुष की शारीरिक क्रियाएं अपने-आप चलती रहती हैं, उसी प्रकार ऐसे मनुष्य की प्रवृत्तियां अपने-आप चला करती हैं।

उनके अपने चलाने का उसे अभिमान नहीं होता, भान तक नहीं होता। वह स्वयं निमित्त मात्र रहता है - सफलता मिली तो भी ʻवाह-वाहʼ, न मिली तो भी। सफलता से वह फूल नहीं उठता, विफलता से घबराता नहीं। उसके सब कर्म यज्ञ रूप, सेवा के लिए होते हैं। वह सारी क्रियाओं में ईश्वर को ही देखता है और अंत में उसी को पाता है।

यज्ञ तो अनेक प्रकार के कहे गये हैं। उन सबके मूल में शुद्धि और सेवा होती है। इंद्रिय दमन एक प्रकार का यज्ञ है, किसी को दान देना दूसरी प्रकार का। प्राणायामादि भी शुद्धि के लिए आरंभ किये जाने वाले यज्ञ हैं। इनका ज्ञान किसी ज्ञाता गुरु से प्राप्त किया जा सकता है। वह मिलाप, विनय, लगन और सेवा से ही संभव है।

यदि सब लोग बिना समझे-बूझे यज्ञ के नाम पर अनेक प्रवृत्तियां करने लग जायें तो अज्ञान के निमित्त होने के कारण, भले के बदले बुरा नतीजा भी हो सकता है। इसलिए हरेक काम के ज्ञानपूर्वक होने की पूरी आवश्यककता है।

यहाँ ज्ञान से मतलब अक्षर-ज्ञान नहीं है। इस ज्ञान में शंका की कोई गुंजायश ही नहीं रहती। उसका श्रद्धा से आरंभ होता है और अंत में उसका अनुभव आता है।

ऐसे ज्ञान से मनुष्य सब जीवों को अपने में देखता है और अपने को ईश्वर में देखता है, यहाँ तक कि यह सब प्रत्यक्ष की भाँति उसे ईश्वरमय लगता है। ऐसा ज्ञान पापी-से-पापी को भी तार देता है। यह ज्ञान कर्मबंधन में से मनुष्य को मुक्त करता है, अर्थात कर्म का फल उसे स्पर्श नहीं करता।

इसके समान पवित्र इस जगत में दूसरा कुछ नहीं है। इसलिए तू श्रद्धा रखकर, ईश्वरपरायण होकर, इंद्रियों को वश में रखकर ऐसा ज्ञान पाने का प्रयत्न कर, उससे तुझे परम शांति मिलेगी। तीसरा, चौथा और पांचवां अध्याय, तीनों एक साथ मनन करने योग्य हैं। उनमें से अनासक्ति योग क्या है, इसका अनुमान हो जाता है।

इस अनासक्ति - निष्कामता से मिलने का उपाय भी उनमें थोड़े-बहुत अंश में बतलाया गया है। इन तीनों अध्यायों को यथार्थ रूप से समझ लेने पर आगे के अध्यायों में कम कठिनाई पड़ेगी। आगे के अध्याय में हमें अनासक्ति-प्राप्ति के साधन की अनेक रीतियां बतलाते हैं।

हमें इस दृष्टि से गीता का अध्ययन करना चाहिए, इससे अपनी नित्य पैदा होने वाली समस्याओं को हम गीता द्वारा बिना परिश्रम के हल कर सकेंगे। यह नित्य‍ के अभ्यास से संभव होने वाली वस्तु है। सबको आजमा देखनी चाहिए।

क्रोध आया कि तुरंत उससे संबंधित श्लोक का स्मरण करके उसे शांत करना चाहिए। किसी का द्वेष हो, अधीरता आवे, आहारैषणा आवे, किसी काम को करने या न करने का संकट आवे तो ऐसे सब प्रश्नों का निपटारा, श्रद्धा हो और नित्य मनन हो तो, गीता-माता से कराया जा सकता है। इसके लिए नित्य का यह पारायण है और तदर्थ यह प्रयत्न है।

♦️क्रमशः
गीता-बोध; चतुर्थ अध्याय- यज्ञ 1

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