Satya Darshan

प्रथम चरण का मतदान उत्साहपूर्वक संपन्न

नयी दिल्ली (एसडी) | अप्रैल 12, 2019

पहले चरण में 91 सीटों के लिए हुए मतदान में पश्चिमी यूपी की आठ सीटों पर सबकी नजर बनी रही. मतदान के दौरान वोटरों की नब्ज टटोलने पर कुछ दिलचस्प बातें सामने आईं.

2014 के चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठों सीटें बीजेपी के खाते में गईं. लेकिन इस बार मुकाबला रोचक होने के आसार हैं. विपक्ष एकजुट है और उसका एक ही मकसद है कि खोई हुई जमीन वापस हासिल की जाए और बीजेपी को हराया जाए. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने "लाठी, हाथी और 786" का नारा लगाया है. वहीं, बीजेपी 5 साल बाद भी पीएम मोदी के चेहरे को सामने लाकर चुनाव लड़ रही है.

हमारे पत्रकारों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीटों के विभिन्न पोलिंग स्टेशनों पर जाकर मतदाताओं से बातचीत की और उनके मूड को भांपने की कोशिश की. इस ग्राउंड रिपोर्टिंग में कु्छ रोचक तथ्य सामने आए.

ब्रांड मोदी सहारे बीजेपी

मेरठ लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले शहरी इलाकों के पोलिंग स्टेशनों में ब्रांड मोदी का जलवा बरकरार है और 2014 की तरह ही प्रधानमंत्री का चेहरा सामने लाकर चुनाव लड़े जा रहे है. यहां का मध्यम वर्ग बीजेपी को 'फूल' कहने के बजाए 'मोदी' कहना ज्यादा पसंद करता है. शहरी इलाकों में यूपी के महागठबंधन को लेकर एक राय नहीं है और वे ज्यादा इसपर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं. बसपा के हाजी मोहम्मद याकूब, भाजपा के वर्तमान सांसद राजेंद्र अग्रवाल और कांग्रेस के हरेंद्र अग्रवाल मेरठ सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 के चुनाव में राजेंद्र अग्रवाल ने बसपा के मोहम्मद शाहिद अखलाक को ढाई लाख वोटों से हराया था. इस बार का चुनाव भी महागठबंधन के लिए आसान नहीं होने वाला है.

गन्ना किसानों की अलग राय

बागपत लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले डबथवा गांव में लोगों में मोदी सरकार के खिलाफ रोष दिखाई दिया. यहां बड़ी संख्या में गन्ना किसान रहते हैं और उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने गन्ने का दाम बढ़ाने का वादा पूरा नहीं किया. यहां के ग्राम प्रधान बृजपाल सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने वादे किए थे कि वह किसानों की आय दोगुनी करेंगे, डाई यूरिया के दाम बढ़ने नहीं देंगे. ये वादे जस के तस हैं. यहां के ग्रामीणों ने स्वच्छता अभियान और शौचालय जैसे कदमों का तो स्वागत किया, वहीं गैस सिलेंडर के इस्तेमाल पर असहज दिखे. किसान अनिल चौधरी का कहना है ''सरकार के दिए हुए सिलेंडर को दोबारा भरवाने के हमारे पास पैसे नहीं हैं. सरकार हमारी आय बढ़ाने के बारे में सोचे. 900 रुपये का सिलेंडर कैसे भरवाया जा सकता है.''

महिलाओं की अपनी सोच नहीं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोट डालने आई महिलाओं में मतदान को लेकर उत्साह तो दिखा, लेकिन जागरूकता नहीं दिखी. शहर हो या ग्रामीण घूंघट और बुर्के में रहने वाली ज्यादातर ये महिलाएं परिवार के किसी पुरुष मुखिया के कहने पर वोट डालने आई थी. मेरठ की गीता और मिथिलेश जैसी तमाम महिलाओं से बातचीत में पता चला कि वे उसी चिह्न का बटन दबाएंगी जिसके लिए उनके पति ने कहा है.

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले सरधना नगर पालिका की मुस्लिम महिलाओं में तीन तलाक को विरोध नहीं दिखा. यहां की चेयरमैन शबीला बेगम, जिनका नाम ही वोटर लिस्ट से गायब था, का कहना है, ''तीन तलाक गलत बात है.''

मुस्लिम समाज महागठबंधन के साथ

इन तीन लोकसभा सीटों में एक भी मुस्लिम वोटर ऐसा नहीं मिला जिसने मोदी सरकार का समर्थन किया हो. हालांकि उनके पास इसका भी ठोस जवाब नहीं मिला कि वे क्यों महागठबंधन की सरकार चाहते हैं. मेरठ के रईस और सरधना के अब्दुल सरधना जैसे तमाम मुस्लिम मतदाताओं को लगता है कि मोदी सरकार ने वादे पूरे नहीं किए. तीन तलाक के मुद्दे पर इनका कहना है कि इस प्रथा पर बीजेपी को दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए. यह उनके धर्म की बात है.

मुजफ्फरनगर दंगे कोई मुद्दा नहीं

2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के अभियुक्त रहे वर्तमान सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान इस सीट से फिर एक बार बीजेपी के उम्मीदवार हैं. उनके सामने आरएलडी प्रमुख और महागठबंधन के उम्मीदवार अजित सिंह हैं. मतदाताओं से बातचीत में मालूम चला कि मुजफ्फरनगर दंगे और पिछले कुछ वर्षों में हुई हिंसा इस बार चुनावी मुद्दा नहीं है. लोगों का कहना है कि जो बीत गई उस पर वोट डालना नहीं चाहते. कस्बाई और ग्रामीण इलाकों के ज्यादातर मतदाताओं ने नोटबंदी को गलत कदम बताया.

बेरोजगारी है विकराल समस्या

युवाओं का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से वैश्विक स्तर पर भारत की छवि बेहतर हुई है. हालांकि इनमें बेरोजगारी को लेकर गुस्सा दिखाई दिया. उनका कहना है कि जिसकी भी सरकार बने, वह उन्हें रोजगार दे. एक्कादुक्का युवाओं को छोड़ दिया जाए तो सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक को लेकर युवा वोटरों में उत्साह नहीं दिखा. स्थानीय स्तर पर ये मुद्दा बनते नहीं दिखे.

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