Satya Darshan

बेलगाम बेरोजगारी

देश में बढ़ते अपराधों, गौरक्षकों, मंदिरों में पूजापाठ के पीछे यही बेकारी है. बैठे ठाले युवा कहीं से भी पैसा जुटाना चाहते हैं और वे कुछ भी कर लेते हैं. शिक्षा ने उन्हें थोड़ा समझदार बना दिया है, लेकिन इतना नहीं कि वे खुद अपने बल पर कारखाने खड़े कर सकें।

संपादकीय | अप्रैल 10, 2019

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे आफिस आजकल विवादों के तूफान में घिरा है क्योंकि उस की रिपोर्ट, जिसे मोदी सरकार जारी करने से कतरा रही है, कहती है कि युवाओं में 2011-12 के मुकाबले 2017-18 तक बेरोजगारी में 3 गुना वृद्धि हो गई है. करोड़ों नौकरियां पैदा कर के देश में सब का विकास करने का वादा कर के जीती भाजपा के लिए ये आंकड़े शर्मिंदगी पैदा करने वाले हैं, इसलिए वह इन्हें जारी करने में हिचकिचा रही है।

सर्वे आफिस कहता है कि ये आंकड़े सरकार की अनुमति के बिना जारी किए जा सकते हैं. देश में युवाओं में बेकारी तेजी से बढ़ रही है. गांवों में युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है. वे थोड़ाबहुत पढ़ कर बेरोजगार बने हुए हैं. वे सब सरकारी नौकरी चाहते हैं क्योंकि उन्होंने और उन के मातापिताओं ने देखा है कि पढ़लिख कर सरकारी बाबू बन कर लोग दिनभर मौज उड़ाते हैं और शाम को रिश्वत का पैसा घर लाते हैं. गांवों के आज के युवा न खेतों में काम करना चाहते हैं न कारखानों में।

खेतों और कारखानों में काम भी अब कम हो गया है. पहले नोटबंदी ने मारा, फिर जीएसटी ने. ऊपर से चाइनीज सामान बाजार में छा गया, क्योंकि उस के लिए विदेशी मुद्रा विदेशों में काम कर रहे भारतीय मजदूर अपने डौलर व दिरहम हवाई जहाज भरभर कर भेज रहे हैं. नई तकनीकों की वजह से खेतों और कारखानों में नौकरियां कम होने लगी हैं।

रिपोर्ट कहती है कि बेकारी का आंकड़ा जो अब है वह 45 सालों में सब से ज्यादा है. रेलवे क्लर्कों या पटवारियों की कुछ ही नौकरियों के लिए लाखों आवेदन मिलते हैं. सरकार के लिए तो आवेदन सिर्फ कागज भर होता है पर जिस ने आवेदन किया होता है वह रात दिन इसी का सपना देखता रहता है और उस का किसी और काम में मन नहीं लगता. वह परिवार व देश पर बोझ होता है और सरकार के लिए मात्र एक गिनती।

देश में बढ़ते अपराधों, गौरक्षकों, मंदिरों में पूजापाठ के पीछे यही बेकारी है. बैठे ठाले युवा कहीं से भी पैसा जुटाना चाहते हैं और वे कुछ भी कर लेते हैं. शिक्षा ने उन्हें थोड़ा समझदार बना दिया है, लेकिन इतना नहीं कि वे खुद अपने बल पर कारखाने खड़े कर सकें।

सरकार सफाई दे रही है कि नौकरियां हैं पर कम पैसे वाली हैं. यह बड़ी लचर दलील है. नौकरी वह होती है जो संतोष दे, घर चलाने के लायक हो और नौकरी पाने के बाद युवा किसी और सपने की आरे न भटके।

सरकार इन युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस ने तो मान लिया है कि नौकरी भाग्य से मिलती है, पूजापाठ से मिलती है, हिंदू धर्म की रक्षा से मिलती है, गांधी परिवार को दोष देने से मिलती है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बयानों को सुन लें, तो कहीं काम की कहानी नहीं मिलेगी, सिर्फ मंदिर, कुंभ, नर्मदा यात्रा, संतोंमहंतों की बातें मिलेंगी।

चुनाव से एकदम पहले आए आंकड़े विपक्षियों के लिए सुखद हैं पर बेकारी की समस्या का हल उन के पास भी नहीं है।

 

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