Satya Darshan

आडवाणी की हालिया टिप्पणी को मोदी विरोध समझना निरी मूर्खता

आज भी वे सांप्रदायिकता ही फैला रहे हैं उनके ट्वीट के हर कोई अपने हिसाब से माने निकाल रहा है कि यह नरेंद्र मोदी का विरोध है पर हकीकत में यह एक भीष्म का दुर्योधन प्रेम और मोह है जिसे व्यक्त करने का तरीका ऐसा है कि विरोधी भी कहें कि वाह क्या बात है।

संपादकीय | अप्रैल 9, 2019

लालकृष्ण आडवाणी को बेवजह भाजपा का भीष्म पितामह नहीं कहा जाता उनका व्यक्तित्व और आचरण दोनों सचमुच में द्वापर के भीष्म से मेल खाते हैं. भीष्म विद्वान था, नीति का ज्ञाता था, साहसी योद्धा था लेकिन न्याय प्रिय नहीं था क्योंकि दुर्योधन के प्रति उसकी आसक्ति उसके तमाम गुणों पर भारी पड़ती थी. वह कभी दुर्योधन के अन्याय और मनमानी का खुलकर विरोध नहीं कर पाया। 

प्रसंग चाहे फिर द्रौपदी के चीरहरण का रहा हो या फिर पांडवों को परेशान कर छल कपट से उनके राजपाट छीनने का, भीष्म का समर्थन हमेशा दुर्योधन के साथ रहा. धर्म और नीति का राग अलापते रहने बाले भीष्म की हिम्मत कभी उसका विरोध करने की नहीं पड़ी और इसी मोह के चलते वह दुर्योधन के हर गलत काम का सहभागी बने।

आज भी यही हो रहा है लालकृष्ण आडवाणी का ताजा चर्चित ब्लॉग कोई क्रांतिकारी या हाहाकारी वक्तव्य नहीं है बल्कि नरेंद्र मोदी का समर्थन और प्रचार ही है कि हर वो शख्स जो भाजपा की नीतियों रीतियों से इत्तफाक नहीं रखता वह देशद्रोही ही है।

आडवाणी का मकसद नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं बल्कि हताश होती भाजपा को यह संदेश देना है कि नरेंद्र मोदी अगर चुनाव को हिन्दुत्व के इर्द गिर्द समेटने की कोशिश कर रहे हैं तो पार्टीजन उनका साथ दें जिससे भाजपा दोबारा सत्ता में आकर हिन्दू राष्ट्र का अपना अधूरा मिशन पूरा कर सके।

जितना कट्टरवाद आडवाणी ने फैलाया है मोदी तो उसका दसवा हिस्सा भी नहीं फैला पाए हैं. 90 के दशक में मंदिर आंदोलन के दौरान हिंदुओं का जितना नुकसान आडवाणी ने किया और हजारों हिंदुओं की ज़िंदगी रामलला के नाम पर कुर्बान करबा दी इस बाबत इतिहास शायद ही उन्हें माफ कर पाएगा।

यह वह दौर था जब वे रथ पर सवार होकर हाथ में तीर कमान लेकर और माथे पर मुकुट धारण कर निकलते थे तो हिन्दू समुदाय पगला उठता था और उन पर चंदे की बौछार कर देता था. आडवाणी ने भी खूब हिंदुओं की भावनाओं को भुनाया, भड़काया और दंगे भी करबाए और आखिरकार भाजपा को उसकी असल मंजिल सत्ता तक पहुंचाकर ही दम लिया।

तब कुर्सी की मलाई अटलबिहारी बाजपेयी के हिस्से में आई जो राम मंदिर को आस्था का विषय तो मानते थे लेकिन उसके लिए सड़कों पर आकर फसाद जैसी हल्की हरकतें करना उनकी फितरत में नहीं था. आडवाणी ने तब भी बेमन से मोहरा बनना कुबूल कर लिया था।

2014 में इसका दौहराव यानि आडवाणी के साथ फिर अन्याय हुआ तब भी वे खामोशी से महाभारत सरीखे छल प्रपंच देखते रहा. ऐसा भी नहीं था कि उनमें विरोध का साहस नहीं था बल्कि था ऐसा कि जब आरएसएस और साधु संतों ने उन्हें मोदी की महत्ता बतलाई तो वे फिर सत्ता के रास्ते से हट गए और कल के गुजराती छोरे को हिन्दू हित में प्रधानमंत्री बन जाने दिया. यह कोई दरियादिली नहीं बल्कि डर और  घोर सांप्रदायिकता थी जिस पर भी वे ख़ासी हमदर्दी बटोर ले गए थे।

आज भी वे सांप्रदायिकता ही फैला रहे हैं उनके ट्वीट के हर कोई अपने हिसाब से माने निकाल रहा है कि यह नरेंद्र मोदी का विरोध है पर हकीकत में यह एक भीष्म का दुर्योधन प्रेम और मोह है जिसे व्यक्त करने का तरीका ऐसा है कि विरोधी भी कहें कि वाह क्या बात है।

"जो हमसे असहमत वे दुश्मन या देशद्रोही नहीं",  ये 8 शब्द ही उनकी कुत्सित मंशा प्रदर्शित करते हुये हैं कि हमसे से तात्पर्य हिन्दुत्व से ही है और अब मोदी उसका नेतृत्व कर रहे हैं. भाजपा अपने हिंदूवादी एजेंडे से भटकी नहीं है यह जताने यह मुनासिब वक्त भी है क्योंकि नरेंद्र मोदी कमजोर पड़ रहे हैं. उनकी टीम में आदित्यनाथ के अलावा किसी को इजाजत नहीं कि वह नीतिगत बात कहे, हाँ गांधी नेहरू खानदान को कोसते रहने की इजाजत सबको दे दी गई है।

लालकृष्ण आडवाणी ने नरेंद्र मोदी के किसी भी अप्रिय फैसले या राष्ट्रवाद की आलोचना कभी नहीं की क्योंकि वह आरएसएस का एजेंडा है और खुद उनकी भी ख़्वाहिश है कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने और उनके देखते ही देखते बने. इस बाबत वे कुछ भी कर सकते हैं हालिया ब्लॉग उसी मिशन का हिस्सा है इसमें उनका दर्द, भड़ास या तथाकथित व्यथा ढूंढा जाना निरी मूर्खता है जो कुछ विपक्षी नेता कर भी रहे हैं।

ममता बनर्जी और राहुल गांधी शायद ही समझ पाएँ कि यह नरेंद्र मोदी को महिमा मंडित करने की चाल है. दरअसल में यह मोदी का वह खौफ है जो साल 2014 में स्थापित हुआ था इसे विस्तार देकर उसका प्रचार ही आडवाणी कर रहे हैं।

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