Satya Darshan

पुरानी पेंशन बहाली कांग्रेस के घोषणा पत्र से गायब, कर्मचारियों में छायी घोर निराशा

अप्रैल 3, 2019

नई पेंशन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना बहाली कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल नही है। इससे साफ हो गया कि कर्मचारियों के इस सबसे ज्वलंत मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल को कोई सरोकार नहीं है। हाल ही दिनों में सोशल मीडिया में यह छाया हुआ था कि प्रियंका गांधी ने कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को आश्वासन दिया था कि इसे रद्द करने की घोषणा पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल की जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

वैसे भी सच्चाई भी यही है कि एनपीएस भले बीजेपी की सरकार लाई हो लेकिन इसे कानून कांग्रेस ने ही बनाया था। एनपीएस का मुद्दा कांग्रेस के घोषणा पत्र से गायब है। सोशल मीडिया पर काफी समय से अटकलें लगाईं जा रही थीं कि यह मुद्दा पार्टी के घोषणा पत्र में जरूर शामिल होगा। 

दरअसल एनपीएस को लेकर आंदोलित कुछ संगठनों के नेताओं ने दावा किया था कि उनसे मुलाकात के दौरान कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने वायदा किया है कि इस मुद्दे को पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल किया जाएगा तभी से कर्मचारियों की निगाहें इस पर लगीं हुईं थी।

कांग्रेस का घोषणा पत्र जारी होते ही कर्मचारियों में भारी निराशा है। कई कर्मचारियों का  कहना है कि आज उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

एनपीएस की एक कड़वी सच्चाई भी यही है कि इसे लागू करने में राजनीतिक दलों के साथ साथ श्रम संगठन भी सरकार के साथ थे। जब इसे लागू किया गया तब रेलवे के सबसे बड़े संगठन एआईआरएफ के तत्कालीन अध्यक्ष जहां इसके ट्रस्टी बने तो दूसरे संग़ठन एनआईआरएफ चुप्पी ओढ़े बैठी रही।

सबसे बड़ी विडम्बना तो यह रही कि जब इसे कांग्रेस की सरकार कानूनी रूप दे रही थी तब मजदूरों की मसीहा कहे जाने वाले वामपंथी दल सहित रेलवे के दोनों फेडरेशन विरोध करने के लिए मैदान में नही आये।

गौरतलब की वर्ष 2004 में अपने अंतिम दिनों में बीजेपी की सरकार इसे लेकर आई।एनपीएस को उस वक़्त कानूनी रूप नही दिया गया था। यानि इसके बाद बनी कांग्रेस की सरकार चाहती तो वह इसे रदद् कर सकती थी।लेकिन 2009 तक कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने इस मुद्दे पर कुछ नही किया। 

रेलवे के दोनों संगठन भी सरकार के साथ गलबहियां करते रहे। इसके बाद हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार आई। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि यह सरकार उनके सहारे टिकी रही जो अपने आपको मजदूरों का सबसे बड़ा हितेषी समझते हैं। वामपंथियों ने भी इस दौरान इस मुद्दे को न तो उठाया और न ही कुछ किया। इस दौरान कोई भी श्रम संगठन ने ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं किया जिससे एनपीएस को लेकर सरकार पर कुछ असर पड़ सके।

कर्मचारियों का यह दुर्भाग्य रहा कि सभी ने उन्हें एनपीएस को लेकर जमकर गुमराह किया।नेता अपनी रोटी सेंकते रहे, सरकार के साथ मिलकर मलाई खाते रहे। खानापूर्ति के लिए पत्र लिखकर उसे सोशल मीडिया में जारी करते रहे, ताकि कर्मचारियों को लगे कि वह इस मुद्दे पर उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं।

एनपीएस को लेकर चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस या अन्य, सभी कर्मचारियों को मोहरा बनाये रहे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज भी कर्मचारी इस मुद्दे पर बुरी तरह से दिग्भ्रमित है। टुकड़ो में बंटा कर्मचारी जबतक जागरूक होकर इसके खिलाफ आंदोलन नहीं छेड़ेगा तब तक कुछ होने वाला नहीं है।

सरकार किसी की भी आये,किसी की भी जाये, एनपीएस को लेकर सभी का एक सा नजरिया था और है भी ऐसे में किसी भी दल से कोई भी उम्मीद करना अब बेमानी है।

 

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