Satya Darshan

21 मार्च : आज ही तो है अंतरराष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस

अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस: 21 मार्च

21 मार्च 1960 को दक्षिण अफ्रीका के शार्पविले नामक स्थान पर रंगभेद पर आधारित पारित किये गये कानून के विरोध में शांति से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमे 69 लोग मारे गये। इस नरसंहार की याद में, यूनेस्को ने 21 मार्च को नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन के लिए वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में चिह्नित किया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1966 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बढ़ाने हेतु आह्वान किया। डरबन घोषणापत्र एवं कार्य योजना को वर्ष 2001 में आयोजित नस्लवाद, नस्ली भेदभाव, विद्वेष और संबंधित असहिष्णुता के खिलाफ विश्व सम्मेलन में अपनाया गया।

यह नस्लवाद, असहिष्णुता एवं भेदभाव के संबंधित रूपों से लड़ने के लिए सबसे व्यापक रूप से तैयार की गयी रूपरेखा है। यह विश्व समुदाय द्वारा भेदभाव एवं असिष्णुता के खिलाफ लिए गये संकल्प को दर्शाती है।

इसके मेनिफेस्टो में नस्लवाद का मुकाबला करने के उद्देश्य से विभिन्न उपायों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल की गयी है जिसमें सभी समुदायों के खिलाफ हो रहे नस्लीय भेदभाव को रोकने हेतु उपाय शामिल हैं। इस दस्तावेज़ में पीड़ितों को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में स्वतंत्रता देने और समानता से भाग लेने के अधिकार पर जोर दिया गया है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति भेदभाव के बिना मानव अधिकार का हकदार है। समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार मानव अधिकार कानून के मुख्य स्तंभ हैं। फिर भी दुनिया के कई हिस्सों में, भेदभावपूर्ण व्यवहार अभी भी व्यापक हैं, जिनमें नस्लीय, जातीय, धार्मिक और राष्ट्रीयता आधारित नफरत को उकसाया जाता है।

भारत देश में किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 15 को बनाया है। अनुच्छेद 15 केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, या इनमें से किसी के ही आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है।

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