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संपादकीय: धुर दक्षिणपंथ बना कट्टरपंथी विस्फोट का वाहक

टैरेंट ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को श्वेत पहचान और साझा उद्देश्य का प्रतीक बताया है। उसने लिखा है कि आक्रमणकारियों को दिखाना है कि हमारी भूमि कभी भी उनकी भूमि नहीं होगी। वे कभी भी हमारे लोगों की जगह नहीं ले पाएंगे।’ उसका कहना है कि यूरोपीय लोगों की संख्या हर रोज कम हो रही है।

संपादकीय | मार्च 18, 2019

न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में हुए आतंकी हमले से पूरी दुनिया सकते में है। यहां शुक्रवार को अल नूर मस्जिद और लिनवुड मस्जिद में नमाज पढ़ने गए लोगों पर हथियारबंद हमलावरों ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 50 के आसपास लोग मारे गए और कई घायल हो गए। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने इसे आतंकवादी घटना करार देते हुए देश के इतिहास का सबसे काला दिन बताया। 

मुख्य हमलावर की पहचान 28 वर्षीय ब्रैंटन टैरेंट के रूप में हुई है जो ब्रिटिश मूल का ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है। उसने हमले के पहले ‘दि ग्रेट रिप्लेसमेंट’ शीर्षक से एक सनसनीखेज मैनिफेस्टो लिखा था, जिसमें उसने हजारों यूरोपीय नागरिकों की आतंकी हमलों में गई जान का बदला लेने के साथ श्वेत वर्चस्व कायम करने के लिए आप्रवासियों को बाहर निकालने की बात कही थी। 

टैरेंट ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को श्वेत पहचान और साझा उद्देश्य का प्रतीक बताया है। उसने लिखा है, ‘आक्रमणकारियों को दिखाना है कि हमारी भूमि कभी भी उनकी भूमि नहीं होगी। वे कभी भी हमारे लोगों की जगह नहीं ले पाएंगे।’ 

उसका कहना है कि यूरोपीय लोगों की संख्या हर रोज कम हो रही है इसलिए यूरोपीय लोगों को अपनी जन्मदर बढ़ाने की जरूरत है वरना वे अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो जाएंगे। यह पश्चिमी जगत के धुर-दक्षिणपंथ का घोषणापत्र है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप से ऐसे मिजाज के लोगों की एक तरह से विदाई हो गई थी, लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों से वे दोबारा सिर उठाने लगे हैं।

यूरोप के अनेक देशों में राष्ट्रवादी सरकारों की वापसी इसका एक संकेत है। हाल तक पश्चिमी देश वैश्वीकरण के समर्थक थे लेकिन यूरोप में बढ़ती असमानता और घटते रोजगार के कारण वहां भूमंडलीकरण के विरुद्ध वातावरण पैदा हुआ है और राष्ट्रवाद मजबूत हो रहा है। इसने चरमपंथ को आगे आने का अवसर दिया है। 

आज ऐसे अनेक लोग हैं, जो यह मानते हैं कि एशियाइयों-अफ्रीकियों और खासकर मुसलमानों के यूरोप में बसने से कई तरह की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं। वे विशुद्ध श्वेतवाद को पु्नर्स्थापित करना चाहते हैं और एकीकृत यूरोप के भी खिलाफ हैं। 

ऐसे लोगों के जमावड़े के रूप में इटली की रेड आर्मी और ग्रीस की रिवॉल्यूशनरी स्ट्रगल, सीरा (कंटीन्यूटी आईआरए) जैसे नाम आते हैं, हालांकि इनकी गतिविधियां इधर कमजोर पड़ रही थीं क्योंकि मुख्यधारा की पार्टियां ही इनकी बोली बोलने लगी थीं। 

बहरहाल, टैरेंट जैसे लोगों की सक्रियता चिंताजनक है। डर इस बात का है कि ऐसी धुर-दक्षिणपंथी कार्रवाइयां कहीं धीरे-धीरे अपनी मौत मर रहे इस्लामिक आतंकवाद को नई जिंदगी न दे दें। इसलिए इस सोच के खिलाफ सबको मिलकर सख्त कार्रवाई करनी होगी। 

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