Satya Darshan

पत्रकारों को अवमानना की सजा सुनाने पर सवाल

ब्लॉग : रवीश कुमार

मार्च 13, 2019

इस चुनाव में मीडिया भी एक मुद्दा है. इस मीडिया के लिए आप कैसे लड़ेंगे यह एक मुश्किल सवाल है, मीडिया खुद के लिए लड़ पाएगा या नहीं यह उसका सवाल है. मगर मीडिया एक मुद्दा है. मीडिया पर इस तरह हमला है और इतना हमला है कि आप भी किन-किन सवालों की परवाह करेंगे, और इसी तरह धीरे-धीरे आप उन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सामान्य होने लगेंगे. सब कुछ जब बिखर जाए तो संभालने का काम किस दिशा से करना चाहिए पूछने की ज़रूरत नहीं. आपको जहां से लगे वहां से ठीक करने का काम शुरू कर देना चाहिए. पिछले दिनों मेघालय हाई कोर्ट ने दि शिलांग टाइम्स की एडिटर पैट्रिसिया मुखीम और प्रकाशक शोभा चौधरी को अवमानना का दोषी पाया और दोनों को दो-दो लाख रुपये जमा करने की सज़ा सुनाई.  

मेघालय हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मोहम्मद याकूब और जस्टिस सुदीप रंजन सेन की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत सज़ा सुनाते हुए दि शिलांग टाइम्स की संपादक और प्रकाशक को कोर्ट खत्म होने तक बैठने को कहा. एक हफ्ते के भीतर दोनों को दो लाख रुपये जमा करने हैं. अगर नहीं दे पाए तो छह महीने की जेल होगी. अखबार को प्रतिबंधित कर दिया जाएगा. दि शिलांग टाइम्स ने 6 दिसंबर 2018 को एक खबर छापी जिसका शीर्षक था "When judges judge for themselves" यानी जब जज ही अपने लिए जज बन जाएं. इस खबर में यह था कि जस्टिस एसआर सेन रिटायर चीफ जस्टिस, जज, उनकी पत्नियां और बच्चों के लिए कई तरह की सुविधाएं देने का फैसला किया है. मेडिकल की सुविधा, प्रोटोकोल की सुविधा, गेस्ट हाउस, घर पर अर्दली, मोबाइल इंटरनेट का बिल और फोन के लिए 80,000 रुपये इसमें शामिल हैं. इस खबर में यह लिखा था कि जस्टिस सेन मार्च में रिटायर होने वाले थे. संदेश ये गया कि वे रिटायर होने से पहले अपने लिए ऐसा चाहते हैं. जो कोर्ट की नजर में अवमानना हुई क्योंकि खबर लिखने वाले ने मंशा जोड़ दी. एक मार्च को पट्रिसिया और शोभा चौधरी ने कोर्ट में बिना शर्त माफीनामा जमा कर दिया. कोर्ट ने माना कि सजा से बचने के लिए ऐसा किया गया है. जब लगा कि आरोपों का बचाव नहीं कर पा रहे हैं तो आखिरी वक्त में बिना शर्त माफी मांग ली. नगालैंड पोस्ट की खबर से हमने ये लिया है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि उसके फैसलों की आलोचना हो सकती है. होती भी है. समीक्षा हो सकती है. मगर आप मोटिव यानी मंशा नहीं जोड़ सकते. क्या यह इतनी बड़ी चूक थी कि इतनी सख़्त सज़ा दी जाए. दो लाख का जुर्माना न देने पर अखबार पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी. मेघालय हाईकोर्ट का एक पुराना आदेश है जिसे लेकर विवाद हो चुका था. आपको याद दिला दें कि 7 जनवरी 2016 को मेघालय हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने खुद को ज़ेड कैटगरी की सुरक्ष देने का आदेश दिया और पूर्व जज के लिए वाई कैटगरी की. राज्य के एक नागरिक सजय लालू ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी और दोनों को सामान्य सुरक्षा दी गई. ज़ेड और वाई कैटगरी की सुरक्षा के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया.

अखबार की एडिटर और प्रकाशक सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं मगर सज़ा की सख़्ती को लेकर प्रेस संगठनों ने चिंता जताई है. एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने अपने बयान में कहा है कि एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया दि शिलांग टाइम्स के खिलाफ अवमानना के मामले में मेघालय हाई कोर्ट के आदेश से काफी बेचैन है. आदेश में फाइन के अलावा न चुकाने पर जेल और अखबार का प्रकाशन बंद करने की बात है. यह धमकी भरा आदेश है. प्रेस की स्वतंत्रता को कम करता है. विडंबना है कि जो न्यायपालिका प्रेस की स्वतंत्रता की संरक्षक रही है उसी से ऐसा सख़्त आदेश आया है. गिल्ड आग्रह करता है कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल सतर्कता से करे और लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता का भी सम्मान करे.

The Network of Women in Media, India,NWMI ने भी बयान जारी किया है और कहा है कि अवमानना का इस्तेमाल मीडिया पर तलवार की तरह नहीं होना चाहिए. संगठन ने कहा है कि मेघालय हाई कोर्ट का फैसला काफी सख्त है. अखबार की संपादक और प्रकाशक ने माफी मांगी है, कोर्ट को उसकी भावना पर विचार करना चाहिए. स्वीकार करना चाहिए. मेघालय हाईकोर्ट को उदारता दिखानी चाहिए. प्रो अपूर्वानंद ने भी मेघालय के अखबार दि शिलांग टाइम्स की संपादक पेट्रिसिया मुखीम और प्रकाशक के खिलाफ आए फैसले पर चिन्ता जताई है. अपूर्वानंद का कहना है कि अवमानना और मानहानि इन दोनों का इस्तेमाल मीडिया की आज़ादी को दबाने के लिए किया जा रहा है.

अपूर्वानंद ने कहा कि 'पेट्रिसिया का काम ही एक जर्नलिस्ट के रूप में प्रत्येक संस्था पर निगाह रखना और यदि लगे वो गलत कर रही है तो उसकी आलोचना करना है. उन्होंने अपने धर्म का पालन किया था और उच्च न्यायालय के आदेश की आलोचना की जिस में ये कहा. हो सकता है कि पेट्रिसिया के अखबार से मैं असहमत हूं लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उनको अपने मत व्यक्त करने का अधिकार नहीं है. उसमें ज्यादा आपत्ति ये है कि अदालत ने कहा कि पेट्रिसिया अदालत को कंट्रोल करना चाहती है. जब मैं कोई आलोचना करता हूं तो मैं किसी को कंट्रोल नहीं करता हूं. मैं सिर्फ ये बताना चाहता हूं कि मेरा उसके बारे में क्या मत है.'

वैसे जजों को अच्छी से अच्छी सुविधाएं मिलनी चाहिए. फोन भी बढ़िया हो और इंटरनेट भी बढ़िया. उनके काम की ज़रूरतें ही ऐसी हैं. रिटायरमेंट के बाद उनकी सुविधाओं का भी ख्याल रखा जाना चाहिए ताकि उनके सम्मान में कोई कमी न आए. यह ज़रूरी है ताकि उनके रिटायरमेंट के बाद भी कोई उनके स्वाभिमान को ठेस न पहुंचा सके. 

वैसे इस खबर के बहाने पेंशन का मुद्दा पब्लिक में आ जाए तो क्या बात. लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी चाहते हैं कि पेंशन की पुरानी व्यवस्था बहाल हो. वो इस मुद्दे को लेकर कई बार संघर्ष कर चुके हैं. मगर राजनीतिक निष्ठा के कारण उनका नैतिक बल और आत्म बल कमज़ोर पड़ गया है. इतना कि वे दबे स्वर से कहते हैं कि पेंशन का मुद्दा उठाइए न. सवाल मेरे उठाने का नहीं हैं. सवाल है कि आप अपने मुद्दे को लेकर कितने ईमानदार हैं. पुरानी पेंशन का मुद्दा धीरे-धीरे कर्मचारियों के बीच बनता जा रहा है.

आज न कल राजनीतिक दलों को इस सवाल से टकराना होगा या फिर अगर कर्मचारी ईमानदार हैं तो उन्हें अपने मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों से टकराना होगा क्योंकि इस मुद्दे के समर्थन में कोई और बात नहीं करता है. सरकारी कर्मचारियों के संगठन को अभी नैतिक बल हासिल करना होगा. वर्ना पेंशन के लिए आंदोलन कम बड़े नहीं हुए. लेकिन मंत्रियों और विपक्ष के नेताओं ने उनके मुद्दे को जवाब देने लायक भी नहीं समझा.

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