Satya Darshan

बड़े किले बारीक छेदों से ही दरकते हैं आइए जागरूक करें अपने आस पड़ोस

मार्च 13, 2019

अगर हम अपने अड़ोस-पड़ोस, रिश्तेदारों-नातेदारों, दोस्तों-यारों तक सही बात पहुँचाने का ज़िम्मा उठा लें, तो इन चुनावों को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकते हैं. बशर्ते हम सब्र से काम लें, अपने ज्ञान का थोथा घमंड न पालें, हमेशा पूर्ण सत्य अपने पास होने का दावा न करें और सामने वाले को बेवकूफ़ न समझें.

सोशल मीडिया की तल्ख़ बहसों के बीच अपने आसपड़ोस के लिए अगले कुछ महीने यह नुस्ख़ा अपनाएँ. क्या पता  दो-दो, चार-चार करके हम तमाम लोगों को इस बीमारी से निज़ात दिला सकें. बड़ी लड़ाइयाँ हमेशा छोटे-छोटे मोर्चों पर लड़ी जाती हैं, बड़े-बड़े किले बारीक छेदों से दरकते हैं. आइये हम और आप एक बड़े किले को आलपीन लेकर खोदते रहें, क्या पता यही दरार किले को भहराकर गिरा दे.

मोदी समर्थक लोग जन्मतः संघी नहीं हैं, वो संघ के इन्फेक्शन में हैं. जो आज इन्फेक्टेड हैं, वो कल डिसइन्फेक्टेड भी हो सकते हैं. उनके शरीर में तमाम माध्यमों से झूठ, फ़रेब और अफ़वाह का जहर चुपके से फैलाया गया है. हमारा काम संघ-ग्रसित लोगों को दुत्कारने का नहीं, पुचकारकर इलाज के लिए तैयार करने का है. जैसे शराब छुड़ाने के लिए मरीज़ की सहमति ज़रूरी होती है, सांप्रदायिक जहर से ग्रस्त व्यक्ति को इलाज के लिए पहले मानसिक रूप से तैयार करना होता है.

मैं आरएसएस से सांगठनिक तौर पर जुड़े प्रचारक/दुष्प्रचारक की बात नहीं कर रहा, वो तो लाईलाज़ हैं. मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो संघ की प्रोपगैंडा मशीनरी का इत्तेफ़ाकन शिकार हो गए हैं. अगर आप उनका ईगो हर्ट न करें और उनसे प्यार-मोहब्बत से पेश आयें, तो संभव है कि वो आपसे तमाम जटिल मुद्दों पर स्वस्थ माहौल में बात करने को तैयार हो जाएँ. अगर वो किसी स्वार्थवश आरएसएस-भाजपा से नहीं जुड़े होंगे तो यकीन मानिए उनको अज्ञान के अंधकूपों से बाहर निकाला जा सकता है.

विचारधारात्मक मुद्दों पर हम कई बार तल्ख़ हो जाते हैं और सामने वाले को घोर अज्ञानी सिद्ध करना अपनी बौद्धिक विजय समझ बैठते हैं. ऐसे में हम अपने तर्कों और विचारों के माध्यम से सामने वाले को कंट्राडिक्ट और काउंटर तो कर सकते हैं, कन्विंस नहीं कर सकते. लेकिन अगर आपने परस्पर प्रेम, सम्मान और स्नेह का तार जोड़ लिया तो कई बार मैंने लोगों को बदलते देखा है.

विचार बदलते हैं यह एक स्वाभाविक सत्य है. गाँधीजी का ह्रदय परिवर्तन का सूत्र दरअसल विचार-परिवर्तन का सूत्र है. अगर कोई हिंसक और सांप्रदायिक व्यक्ति अहिंसक और सद्भाव का हिमायती हो जाए तो आप इसे विचार परिवर्तन भी कह सकते हैं और ह्रदय परिवर्तन भी. जब कम्युनिस्ट गाँधीजी के ह्रदय परिवर्तन के सिद्धांत की खिल्ली उड़ाते थे तो विनोबा उनसे पूछते थे कि क्या कार्ल मार्क्स तुमको डंडा लेकर कम्युनिस्ट बनाने आये थे? वास्तव में तो दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार विचार ही है.

✍️सौरभ बाजपेयी
असि. प्रोफेसर,
दिल्ली विश्वविद्यालय

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक भी हैं)

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