Satya Darshan

क्यों चुप हैं, क्या देख रहे है राह ?

दो कविताएं

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वे चुप हैं
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क्यों चुप हैं वे?
क्या देख रहे हैं राह
कि कभी तो आएगा मौसम बोलने का
जब नहीं होगा खतरा कुछ भी
असहमति से
नहीं होगा कोई भी नाराज
या वे भूल गए हैं
कि उनके पास भी हैं शब्द
जिनमें छिपा है
अर्श का वैभव
और आदमी होने की
अचूक पहचान
यह प्रमाण कि
किसी भी परिस्थिति में
आदमी ही
सच बोलने की
निभा सकता है जिम्मेदारी  

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चाहता हूं
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फिर नहींआऊंगा इधर
इसलिए जी भर के
करना चाहता हूं प्यार
मुग्ध होना चाहता हूं
खिलते हुए फूलों को देखकर
नीली झील के निर्मल जल में
तैरने की लालसा को
मंद नहींहोने देना चाहता,
चाहता हूं जेब में रहें इतने पैसे
कि खरीद सकूं एक किताब
और दोस्तों को पिला सकूं काफी
ठंड के दिनों में
परिवार के साथ मजा लूं
गक्कड़ और भटे के भरते का
सुना सकूं बच्चों को कहानी
और लिख सकूं एक कविता
फिर नहींआऊंगा इस तरफ

 

इसलिए फेफड़ों में भरकर सांस
निष्कंप स्वर में
होना चाहता हूं मुखर
उनके विरूद्ध जिन्होंने
लगा ली है अपनी मुहर
जमीन, हवा और रोटियों पर
कोशिश है उनकी
अच्छे दिनों के हमारे सपने
जो झिलमिलाते हैं
नाज़िम हिकमत की कविता में
डूब जाएं उनके नारों में
जिनकी मंशा है
वे कर दें मुझे इस तरह रंग अंध
कि इंद्रधनुष भी
दिखलाई दे श्वेत श्याम
उनके विरूद्ध बनाना चाहता हूं
चटख रंगो वाला एक चित्र
क्योंकि फिर लौटकर
नहीं आऊंगा इस तरफ 

✍️रमाकांत श्रीवास्तव

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