Satya Darshan

अब पत्थर लिख रहा हूं इन दिनों

चार कविताएं

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पत्थर लिख रहा हूँ
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अब पत्थर लिख रहा हूँ इन दिनों  
फूल लिखा 
मुरझा गया !
कांटा लिखा 
चुभ गया !
अब पत्थर लिख रहा हूं इन दिनों 
थमाया जा सके जो 
किसी मजलूम के हाथ 
जा, तराश ले इसे
बना ले हथियार 
कभी तो गुजरेगा हुक्मरां 
तेरी बस्ती से!

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प्रश्न
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गोदी से उतरते ही बड़े
चार किताबें पढ़ते ही सयाने 
और अब प्रभातफेरी की जगह 
कांधों पर तेल पिलाये लठ्ठ लिए 
वक्त को धमकाती कदमताल
ये किस सदी के बच्चे हैं 
जो अपने ही बचपन का मर्सिया गा रहे हैं!

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मैं लिखता हूं
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मैं लिखता हूँ 
कि इन दिनों अब 
खुलकर बोलने से भय लगता है  
और चुप रहूँ 
तो हुक्कामों कि जय लगता है !
मैं लिखता हूँ
कि ये लिखा  
उन तलक पहुंचे 
जो मेरी ही तरह भयग्रस्त हैं 
थक चले हैं, त्रस्त हैं 
मैं लिखता हूँ 
कि वे इस लिखे को पढ़ें 
और ये जानकर भयमुक्त हो जाएँ 
की वे अकेले नहीं !

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आप मरे 
********

आपने सुना 
और डरे 
आपने देखा 
और डरे 
आपने कहा 
और और डरे 
आप चुप रहे 
और मरे !

✍️मोहन कुमार नागर 
(बेतवा अस्पताल, डॉ जगदीश मार्किट, गंज बसोदा जिला- विदिशा)

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