Satya Darshan

विश्व सामाजिक न्याय दिवस: समाज में फैली बुराइयों को मिटाने की एक पहल

“विश्व सामाजिक न्याय दिवस” (World Day of Social Justice) विश्व भर में मनाये जाने वाले महत्त्वपूर्ण दिवसों में से एक है। संयुक्त राष्ट्र के आह्वान पर यह दिवस प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। इसका उद्देश्य अशिक्षा, बेरोजगारी तथा गरीबी से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देना है। भारत में आज भी कई लोग अपनी कई मूल जरुरतों के लिए न्याय प्रकिया को नहीं जानते, जिसके अभाव में कई बार उनके मानवाधिकारों का हनन होता है और उन्हें अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सामाजिक न्याय देशों के मध्य समृद्ध और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए एक अंतर्निहित सिद्धांत है। सामाजिक न्याय का अर्थ है- लिंग, आयु, धर्म, अक्षमता तथा संस्कृति की भावना को भूलकर समान समाज की स्थापना करना।

विश्व सामाजिक न्याय दिवस प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण विश्व में 20 फ़रवरी को मनाया जाता है। यह दिवस विभिन्न सामाजिक मुद्दों, जैसे- बहिष्कार, बेरोजगारी तथा गरीबी से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न संगठनों, जैसे- संयुक्त राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा लोगों से सामाजिक न्याय हेतु अपील जारी की जाती है।

दिवस की स्थापना

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2007 में इस दिवस की स्थापना की गयी। इसके तहत वैश्विक सामाजिक न्याय विकास सम्मेलन आयोजित कराने तथा 24वें महासभा सत्र का आह्वान करने की घोषणा की गयी। इस अवसर पर यह घोषणा की गयी कि 20 फ़रवरी को प्रत्येक वर्ष विश्व न्याय दिवस मनाया जायेगा। 

संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि- “इस दिवस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गरीबी उन्मूलन के लिए कार्य करना चाहिए। सभी स्थानों पर लोगों के लिए सभ्य काम एवं रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए तभी सामाजिक न्याय संभव है।”

समाज में फैली भेदभाव और असमानता की वजह से कई बार हालात इतने बुरे हो जाते हैं कि मानवाधिकारों का हनन भी होने लगता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 फ़रवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। सन 2009 से इस दिवस को पूरे विश्व में सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जाता है। रोटी, कपड़ा, मकान, सुरक्षा, चिकित्सा, अशिक्षा, गरीबी, बहिष्कार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने की ज़रूरत को पहचानने के लिए विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाने की शुरूआत की गयी है।

लिंग भेद

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी में 50 मिलियन बालिकाएँ व महिलाओं की गिनती ही नहीं है। प्रत्येक वर्ष पैदा होने वाली 12 मिलियन लड़कियों में से 1 मिलियन अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाती हैं। 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं की मृत्यु दर बालकों से अधिक है। 5 से 9 वर्षों की 53 प्रतिशत बालिकाएँ अनपढ़ हैं। 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं में 4 में से 1 के साथ दुर्व्यवहार होता है। प्रत्येक 6ठीं बालिका की मृत्यु लिंग भेद के कारण होती है। इस सबके पीछे मुख्य कारण अभिभावकों की यह गलत धारणा भी है कि लड़कों से ही उनका वंश आगे बढ़ता है।

अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद

आज 4 में से 1 इंसान, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बढ़ती हुई हिंसा, असुरक्षा और भेदभाव का शिकार हैं। 11 सितम्बर, 2001 को हुए न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकवादी हमले के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद आज मानव सभ्यता का सबसे घातक शत्रु बन गया है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद पूरे संसार में फैली अराजकता का ही दुष्परिणाम है। यह एक ऐसी गम्भीर स्थिति है जहाँ लोग हिंसात्मक और विध्वंसकारी गतिविधियों द्वारा अपनी शिकायतों या दुखों का काल्पनिक समाधान खोजते हैं और इनके लिए वे व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं। इंसान एक सामाजिक प्राणी माना जाता है। लेकिन इंसान की इस मुख्य विशेषता को तब चुनौती मिलती है, जब भेदभाव की वजह से एक इंसान दूसरे इंसान से जाति, रंग, धर्म, भाषा, प्रदेश, राष्ट्र, लिंग आदि के कारण नफरत करता है।

सामाजिक न्याय का अर्थ

कई बार समाज की संरचना इस प्रकार होती है कि आर्थिक स्तर पर भेदभाव हो ही जाता है। समाज में फैली असमानता और भेदभाव से सामाजिक न्याय की मांग और तेज हो जाती है। सामाजिक न्याय के बारे में कार्य और उस पर विचार तो बहुत पहले से शुरू हो गया था, लेकिन दुर्भाग्य से अभी भी विश्व के कई लोगों के लिए सामाजिक न्याय सपना बना हुआ है। सामाजिक न्याय का अर्थ निकालना बेहद मुश्किल कार्य है। सामाजिक न्याय का मतलब, समाज के सभी वर्गों को एक समान विकास और विकास के मौकों को उपलब्ध कराना है।

भारत में सामाजिक न्याय के प्रयास

भारत में फैली जाति प्रथा और इस पर होने वाला स्वार्थपूर्ण भेदभाव सामाजिक न्याय को रोकने में एक अहम कारक सिद्ध होता है। भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास आयोग जैसी कई सरकारी तंत्र एवं लाखों स्वयं सेवी संगठन हमेशा इस बात की कोशिश करते हैं कि समाज में भेदभाव से कोई आम इंसान पीड़ित न हो। आज भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता पहले से बढ़ी है। इन्हीं बढ़े भेदभावों के कारण आज सामाजिक न्याय बेहद विचारणीय विषय हो गया है।

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