Satya Darshan

हम ही है हिंदू और मुसलमान - अजय ब्रह्मात्मज

क्या मैं हिंदू हूँ?

मेरा नाम अजय ब्रह्मात्मज है। अजय नाम का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। यह आधुनिक और सेक्यूलर नाम है।

ब्रह्मात्मज नाम से जन्म से मिली मेरी जाति का संकेत नहीं मिलता। यह सरनेम मेरे पिता सुखदेव नारायण ने दिया। परंपरा के हिसाब से मेरा नाम अजय नारायण होना चाहिए था, लेकिन मेरे पिता निश्चित रूप से अपने समकालीनों से ज़्यादा आधुनिक और प्रगतिशील रहे और हैं कि उन्होंने हम सभी भाइयों के नाम में माँ का नाम ब्रह्मा जोड़ा। ब्रह्मात्मज यानी ब्रह्मा और आत्म और ज यानी ब्रह्मा की आत्मा से पैदा हुआ यानी उसका बेटा इस तरह हम सभी अपनी माँ के बेटे हो गए। प्रसंगवश पिताजी ने मेरी बहन के सरनेम में अपने नाम का एक अंश जोड़कर उसका नाम सुनीता देवात्मजा रखा था।

अजय ब्रह्मात्मज नाम बताते ही स्पष्ट हो जाता है कि मैं हिंदू परिवार का सदस्य हूँ। मेरी पृष्ठभूमि हिंदुओं की है। मुझे हिंदू कहलाने से कोई परहेज़ नहीं है। लेकिन क्या मैं वही हिंदू हूँ, जो हमेशा मुसलमानों के विरोध में माने जाते हैं। सच कहूँ तो मेरी कोई धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था नहीं है।

मेरी माँ हिंदू परिवारों में प्रचलित सारे व्रत करती रही, लेकिन उसने कभी बाध्य नहीं किया कि हम बेटे उन व्रतों के उपवास या पूजा इत्यादि में शामिल हों। अब वह लगभग सारे व्रत छोड़ चुकी है। कारण पूछने पर वह कहती है अब क्या ज़रूरत हैं मुझे मेरे सारे बच्चे सुखी-संपन्न हैं। मिडिल स्कूल के समय से ही धार्मिकता और पूजा-पाठ से मेरी विरक्ति हो गई।

पारिवारिक पृष्ठभूमि से हिंदू होने के नाते मैं मंदिरों में परिजनों के साथ जाता हूँ। प्रतिमाओं के आगे हाथ भी जोड़ता हूँ, लेकिन उन प्रतिमाओं के प्रति कोई श्रद्धा या पूजनीय भाव नहीं महसूस करता। शायद ऐसे व्यक्ति को नास्तिक कहते हैं और हिंदू परंपरा में ऐसे व्यक्तियों के लिए भी जगह है। इसी कारण न तो मुझे हिंदू धर्म से निष्कासित करने की ज़रूरत समझी गई और न मुझ पर दबाव डाला गया कि खुद को हिंदू सत्यापित करने के लिए मैं झूठे धार्मिक आडंबर और आचरण ओढ़ लूँ।

बहरहाल, बिहार से निकलकर पढ़ने के लिए दिल्ली आया। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नामांकन लेने के बाद नर्मदा हॉस्टल में कमरा नंबर ''511'' मिला। इस कमरे में हम तीन यानी मैं, खुर्शीद अनवर और मिथिलेश पाठक थे। कुछ कारणों से मिथिलेश पंद्रह दिनों से ज़्यादा उस कमरे में नहीं टिक सके। बाद में हम दोनों (खुर्शीद और मैं) रह गए। 

खुर्शीद अनवर इलाहाबाद से आया था। मुझे नहीं लगता कि अल्लाह में उसकी कोई आस्था थी। हाँ, कभी-कभी अम्मीजान की याद आ जाती तो कान पकड़कर दो-चार बार तौबा करता और फिर माफ़ी माँग लेता। एक सुबह न जाने उसे क्या सूझी हो सकता है वह अल्लाह के अस्तित्व को लेकर परेशान रहा हो उसने सुबह-सुबह पूछा अजय तू यार अपने देवी-देवता को नहीं मानता, मैं भी अल्लाह के सजदे में नहीं रहता, लेकिन अगर कहीं देवी-देवता और अल्लाह हुए तो हमारा क्या होगा? मरने के बाद तेरी दुर्गति होगी और कयामत के रोज़ में क्या जवाब दूँगा।

सवाल पूछने के बाद वह कुछ देर तक सोचता रहा और फिर जैसे सब कुछ झाड़कर बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। रहें खुदा अपनी जगह कैंपस में ही उसने एक कथित हिंदू लड़की से शादी कर ली। उसने अपने बेटे का नाम समर रखा है।

क्या खुर्शीद अनवर मुसलमान है?

खुर्शीद से मेरी दोस्ती आज भी बरकरार है। बस वह दिल्ली में रहता है और मैं मुंबई में कभी-कभार वह फ़ोन कर लेता है और मैं भी हाल-चाल पूछता रहता हूँ। खुर्शीद से हुई मुलाकात के पहले दो कथित मुसलमानों से मेरा परिचय रहा। एक तो मेरे पिताजी के कार्यालय में चपरासी थे। चारखाने की लुंगी, बाँह वाली गंजी, पैरों में हवाई चप्पल, गंजा सिर और घनी दाढ़ी स़ेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद वह आए थे, इसलिए नियम-कानून सख़्ती से पालन करते थे। 

सबसे पहले उन्हें क़रीब से देखने का मौका मिला वह हमारी तरह दातुन करने के बाद उसका चीरा कर जीभ साफ़ नहीं करते थे। वह दातुन फेंकते भी नहीं थे। हमें हैरत होती थी। हम उनका दातुन चोरी से फेंक देते थे तो हमें उनकी डपट सुननी पड़ती थी। माँ ने उनके लिए एक कप अलग रखा था। उसी में उन्हें चाय मिलती थी। सिर्फ़ उनके लिए ही नहीं, बाकी मुसलमान मेहमानों के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था थी। अलग ग्लास, अलग बर्तन और थोड़ा अलग आचरण वहीं एक मास्टर थे सईद मियाँ। सफ़ेद धोती और सफ़ेद कमीज़ पहनते थे मालूम नहीं अभी हैं या नहीं? पिताजी से उनकी निभती थी। वह ऑफ़िस के काम में भी पिताजी की मदद करते थे। क़रीबी होने के कारण ईद के दिन उनके यहाँ से बुलाहट रहती थी। 

वह मास्टर बन गए थे, लेकिन उनके पिता चिक (कसाई) थे और उनके छोटे भाई दर्ज़ी थे। सईद मियाँ के परिवार से हमारे परिवार का रिश्ता इतना था कि हर हफ़्ते उनके पिताजी मांस भेजा करते थे और हमारे कपड़े उनके भाई सिलने लगे थे। ईद के दिन हमारा पूरा परिवार उनके यहाँ खाने पर जाता था। माँ नहीं जाती थी। माँ के लिए सईद मियाँ सेवइयाँ हमारे साथ भेजा करते थे। 

हम लोग जब तक बिहार के उस कस्बे में अरेराज में रहे, तब तक सईद मियाँ हमारे परिवार के अतिरिक्त सदस्य के रूप में रहे। हर वक्त-ज़रूरत पर मौजूद और मदद के लिए तैयार। वह धार्मिक आस्था के व्यक्ति थे। नमाज़ पढ़ते थे और नियम से सभी त्योहारों का पालन करते थे। मैं उनके साथ ताजिया के जुलूस में शामिल हो चुका था। एक बार उन्हीं के साथ मस्जिद भी गया था। क्या उनके दिमाग़ में उस समय यह बात नहीं आई होगी कि क्यों वह एक हिंदू को मस्जिद में ले जा रहे हैं। कस्बे में तो मौलवी भी जानते थे कि मैं किस परिवार से हूँ, लेकिन उन्हें भी कोई गुरेज नहीं हुआ था।

सईद मियाँ के परिवार में मेरा आना-जाना था। उनके आँगन और घर के कमरों में भी हम चले जाते थे। उनकी बीवी, माँ और बहनों के साथ बेहिचक बातें करते थे। उनके व्यवहार से कभी ऐसा आभास नहीं हुआ कि वे किसी दबाव में हमारे साथ सामान्य रहती हैं। झिझक और विवशता छिपी नहीं रह सकती। वह बात- व्यवहार में आ ही जाती है।

और फिर चीन का प्रवास, इस प्रवास में कई मुसलमान दोस्त बने। कुछ कट्टर और खांटी मुसलमान तो कुछ उदार और अपने मज़हब को गाली देने वाले मुसलमान ए़क रहमान साहब थे। पाकिस्तान के करांची शहर के सिगरेट, शराब और संगत के शौकीन। उनकी सबसे प्रिय गायिका लता मंगेशकर थीं। उन्होंने मेरे कमरे में एक बार शारदा सिन्हा (बिहार की लोक गायिका) को सुन लिया तो उनके नाम एक ख़त मेरे हाथों भिजवाया।

उनके पिता भारत से माइग्रेट कर गए थे, लेकिन केवल उनका शरीर पाकिस्तान गया था, दिल भारत में ही छूट गया था। रहमान साहब भी बचपन की धुंधली यादों से गाँव का नक्शा बनाते थे और पुरबिया बोली में दो-चार गालियाँ सुना देते थे। 

मशहूर थ्येनआन मन घटना के समय भारत से गए तीन विख्यात लेखकों को मैं घुमाने कहीं ले गया था, तभी ''४ जून'' की घटना घट गई थी। शहर में अचानक कर्फ्यू का माहौल बन गया था। सारी सवारियाँ बंद हो गई थीं, तब उस पाकिस्तानी मुसलमान रहमान ने अपनी कार में मृणाल पांडे, विजय तेंदुलकर और अनंतमूर्ति को बिठाकर उनके होटल छोड़ा था। एक पाकिस्तानी मुसलमान ने चंद भारतीय लेखकों (तीनों कथित हिंदू) के लिए क्यों जोखिम उठाया? असमंजस में हूँ क्या रहमान सिर्फ़ मुसलमान थे।

सालों बाद अब मेरी बेटियाँ बड़ी हो रही हैं। बड़ी बेटी के दोस्तों में कई मुसलमान लड़के हैं। उसका अंतरंग दोस्त अली है। उसे हम सभी अच्छी तरह जानते हैं। मेरी माँ भी उससे मिल चुकी है। मेरी माँ ने, पत्नी ने या मैंने उसके मुसलमान होने पर अलग से ग़ौर ही नहीं किया। क्या वह सचमुच मुसलमान मुसलमान यानी हिंदुओं के जाती दुश्मन तो फिर उसकी कैसे दोस्ती हो गई मेरी बेटी से? क्या वह मुसलमान नहीं है या फिर वह भी हमारी तरह असमंजस में हैं।

हिंदू और मुसलमान दो पहचान हैं या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मुझे लगता है पृष्ठभूमि और परिवार से मिली पहचान से हम हिंदू या मुसलमान हैं लेकिन हम में से अधिकांश वैसे हिंदू या मुसलमान नहीं हैं, जो एक-दूसरे की तबाही चाहते हैं। नाहक हम शक के घेरे में आ गए हैं या कुछ स्वार्थी ताकतें हमें एक-दूसरे के खिलाफ़ तोप की तरह इस्तेमाल करना चाहती हैं।

वे अपने मक़सद में कामयाब नहीं होंगे, क्यों कि सईद मियाँ पिताजी के दोस्त रहे हैं। मेरा दोस्त खुर्शीद अनवर है, जो अपनी मसरूफ़ियत में भी मेरी बीमारी की ख़बर सुनकर सहम जाता है और मेरी बेटी का दोस्त अली है। हम सभी आज़ाद भारत के विभिन्न दौरों में हमकदम आगे बढ़ते रहे हैं। गुज़र जाएगा शक-ओ-सुबहा का यह वक्त, क्यों कि ज़िंदगी लंबी है और चलती रहती है, नफ़रत तो एक पल का नाम है क्षणिक घटना है, नकारात्मक भावनाओं का उद्रेक है।

(सिटीजन फॉर पीस और इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आयोजित द्वितीय वार्षिक निबंध प्रतियोगिता में अजय ब्रह्मात्मज के इसी ''हम ही हैं हिंदू और मुसलमान'' शीर्षक निबंध को हिंदी श्रेणी में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था)

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