Satya Darshan

स्मृति शेष/कृष्णा सोबती : फर्क अंग्रेजी और देसी का

बहुत पीछे लौट रही हूं. अपने बचपन की ओर. जाने कितने मोड़ उलांघ आयी हूं. हर मोड़ का एक रंग. आंखों के आगे बेशुमार रंग झिलमिला रहे हैं. ऐसा देख सकने के लिए जाने कितने बसंत, पतझर, सर्दी, गरमी, बरसात की ऋतुएं जी चुकी हूं.

मैंने ही उन्हें जिया है. सर्द-गर्म हल्की हवाओं को, बरसाती गीले झोंकों को. बर्फों के सरदीले मौन एकांत को. 

फायर प्लेस के सामने बैठी चॉकलेट खाते फिर अनमने मन से अंगीठी में जलते अंगारों में से कुछ ढूंढ़ते हुए. उसकी राख में चटकते चैसनेट को तिड़काते हुए. फिर बड़े होकर दो हाथों के स्पर्श में सिहरते हुए. और फिर दो हाथों में सिमटते-झिझकते, चुपके- चुपके हंसते हुए.

हां, मुझे आइनेवाले चैस्टर ड्रार में तिहाकार रखे गये अपने फ्रॉक याद आ रहे हैं. फ्रिल चुन्नट और लेसें. दो छोटे डिब्बे. एक में है रिबन, रुमाल और सेफ्टी पिन. दूसरे में मोजे और स्टोकिंग. कितनी छोटी और मुख्तसर-सी दुनिया थी. पहाड़ का लम्बोतरा कमरा. एक कोने में छोटे भाई जगदीश का मेज और पलंग. दूसरी ओर मेरा. बड़ी राजदीदी का अलग कमरा. जूतों की कतारें अपने-अपने पलंग के पैताने.

मेरी बटनदार ब्राउन जूती, खेल और सैर के लिए फ्लीट और घर में छोटी-सी चप्पलें. कोने में पड़ी एक केन की टोकरी में रखे रहते हमारे उतरे हुए मोजे. उन्हें हम इतवार को खुद धोते. अपने जूतों की पॉलिश भी आप ही करते. यह दोनों काम हम बच्चों के जिम्मे थे और इन्हें नौकर या नौकरानी से करवाने की मनाही थी. 

हम सभी बहन-भाई शाम पिताजी के दफ्तर से लौटने से पहले तैयार रहते उन्हें नमस्कार करने के लिए. वह जब कपड़े बदल चाय लेते तभी हम लोग खेलने जाते और हमेशा लाइटनिंग अप से पहले लौट आते. रात हमारे सोने का वक्त था ठीक 9 बजे.

पिताजी के पास किताबों का खजाना था. पिताजी अपने कमरे से हमें किताब या कुछ-न-कुछ सुनाते. हम सुनते-सुनते सो जाते. इतवार सुबह नाश्ते के बाद हमारा इम्तहान भी ले लिया जाता. कहानी के प्रसंग पूछकर वह जान लेते कि हम कितना सुन पाये. 

हां, बचपन से एक सिरदर्दी लगातार बनी रही. हर शनीचर को बच्चों को रात सोने से पहले ओलिव-ऑयल या क्रस्टायल पीना ही पड़ता. इससे छुटकारा नहीं था. पीने की बात सोचकर ही मुझे मितली होने लगती. शनिवार की यह घबराहट मैं कभी नहीं भूल सकती. इसे लेकर बड़ों की ओर से किसी छूट की गुंजाइश ही नहीं थी. 

वैसे हम लोग इस ओलिव-ऑयल की सज़ा के कारण कुछ कम ही बीमार पड़ते. बीमार होते तो कहा जाता कि जैसा भी महसूस कर रहे हो वह लिखकर लाओ. जब इस लिखे हुए को पिताजी द्वारा पढ़ा जाता तो गलतियां सही कर दी जातीं. उसके बाद बीमारी पर टिप्पणी होती.

‘देखो बेटे, अगर तुम बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर लिखोगे तो डॉक्टर की मदद नहीं होगी. वह तुम्हें तेज़ दवा देंगे और अगर कमतर दिखाओगे तो इलाज लम्बा चलेगा.’

अब सोचती हूं तो हंसी भी आती है और हैरत भी होती है. अतिश्योक्ति से दूर रहने का यह हमारा पहला पाठ था.

शिमला में होते तो हम तीनों के पास अपनी-अपनी यारडलै-वैसलीन की शीशी होती. पहाड़ पर खुश्की का इलाज. रात को सोने से पहले हम हाथ-मुंह पर लगाते. हमारे कम्बल और रजाई पर उनकी चिकनाई के दाग ज़रूर पड़ते. एक दिन देखा रजाइयों पर कवर चढ़ाये जा रहे हैं.

मैंने ऐतराज किया.

‘नहीं मुझे रजाई पर गिलाफ नहीं चाहिए.’

‘देखो बेटे रजाई का यह किनारा चिकना हो चुका है! इसीलिए यह कवर बनाये गये हैं.’

‘पर मैं अपनी चमकीली रजाई को ढकना नहीं चाहती. मैं उसे देखना चाहती हूं.’

मां ने सख्ती से कहा- ‘मैं भी इतनी अच्छी रजाई को चिकना देखना नहीं चाहती. तुम इसका इलाज बताओ. राज दीदी ने तरेरा-जिद्द छोड़ दो. अब तो कवर सिल चुके, रजाई पर चढ़ाने ही पड़ेंगे.’

मुझे कुछ सूझ गया.

‘चिकनी हुई रजाई को मैं पैताने रख लूंगी.’

मां ने कहा- ‘इस्तेमाल के बाद ऊपरवाली तरह फिर वैसी ही हो जाएगी तो क्या करोगी?’

‘मैं रजाई को ओढूंगी ही गले तक. तह चिकनी हुई तो मुझे दीजिएगा काला स्टार.’

हमें हर महीने पिताजी द्वारा स्टार दिये जाते. अच्छे व्यवहार, सफाई और नियम अनुशासन के लिए सबसे ऊपर लाल, फिर नीला और फिर काला. 

मां और पिताजी इसे मेरी जिद्द भी समझ सकते थे पर जाने क्या था कि मुझे एक महीने का वक्त मिल गया दिखाने को कि मैं ऐसा कर पाऊंगी कि नहीं.

मैं ऐसा कर सकी. तब से लेकर आज तक मैंने न कभी मुंह ढंका और न ही रजाई को गिलाफ से ढंका.

बचपन में दिलचस्पियों की कोई कमी नहीं थी. सबसे उत्साहित करनेवाला होता मूव. मूव मतलब दिल्ली से शिमला और शिमला से दिल्ली. 

गर्मी से पहले सभी सरकरी विभाग शिमला मूव कर जाते और सरदी से पहले नीचे दिल्ली उतर आते.

दिल्ली से शिमला जाते कालका पर ब्रेकफास्ट और शिमला से दिल्ली को उतरते दिल्ली स्टेशन के रिफ्रेशमेंट रूम का नाश्ता हमारे सफर को दिलचस्प बनाये रखता. 

कालका से ऊपर चढ़ते या उतरते हम बड़ोग की चाय कभी न भूलते. शिमला में हम घर से बाहर और घर में खेलते स्टापू, टीलों और ‘फूलों में हम आते हैं ठंडे मौसम में, बैगेटेल, कैरम और वर्ल्ड-बिल्डिंग. इतवार की छुट्टी खूब गुंजान रहती.

एक रात खाने पर पिताती ने बताया- ‘बच्चों इस बार हम जाड़ों में दिल्ली नहीं जा रहे.’

‘क्यों-क्यों पिताजी?’

‘ऐसे ही ऑर्डर हुए हैं. हमारी कुछ ब्रांचें शिमला में ही काम करेंगी. हम बहन-भाई निरुत्साहित हो गये. मां ने समझाया-उदास होने की बात नहीं. यहां सरदी में तुम खूब मजे करोगे. बर्फ पड़ेगी सब पहाड़ सफेद हो जाएंगे.’

अगले ही दिन से सरदी में रहने की तैयारियां होने लगी.

अगली शाम मां पिताजी को तारघर पर मिलीं और दोनों लोअर बाजार खरीदारी करके घर लौटे. हम अपने-अपने कपड़ों के रंग देखने को बेताब थे.

खाने के बाद मौका मिला तो लिफाफे खुले. यह रहा शेर की सी खाल का रंग यह है हमारी पप्पी का. देखो पसंद है. 

मैंने हाथ लगाया- आह मखमली! 

पिताजी ने सही किया- यह मखमल नहीं कहलाती, यह ट्वीड है. 

मैंने शक से देखा- पिताजी ट्वीड तो बहुत चुभती है.

‘वह खादी भंडार की होती है. खालिस ऊन की. खूब गर्म जगदीश भैया के लिए निकर, कोट का कपड़ा नीलाहट पर ग्रे.’

‘देखो पसंद है.’

‘अच्छा है मैं इसकी कैप भी बनवाऊंगा. फुल्लबूट पहनकर कमांडर-इन-चीफ के फाटक का गार्ड लगूंगा.’

हम सब खूब हंसे.

मां ने कहा- ‘बच्चों के बूट भी लेने होंगे.’

‘बच्चो अब देखो यह हमारी बेबी की निकर बाकर और कोट का कपड़ा. एकदम नर्म गरम. बेबी हाथ फिराओ. देखो कितना नरम है. तुम्हें यह रंग पसंद है न. बेबी ने टुकड़ा हाथ में लिया उठकर साथवाले कमरे में गयी, हम सब जान गये कि वह आइने के सामने खड़ी होगी. कपड़े को अपने पर फैलाकर देख रही होगी.’

लौटी तो बड़ी-बड़ी आंखों से हंसकर बोली- ‘अच्छा है. हां, बड़ी दीदी के लिए क्यों नहीं?’

मां ने कहा- ‘बेबी वह होस्टल से आयेगी तो उसे भी उसकी पसंद का दिलवाएंगे.’

एक इतवार सुबह मिडिल बाजार के हमारे दरजी उस्ताद गुरुदास राम हुशियारपुरी आए और हम सबके ‘माप’ ले गये. 

मां की ओर से हर कपड़े में गुंजाइश रखने की हिदायत दी जाती रही. हम जैसे-जैसे बड़े हों पहनने का कपड़ा जरा खुला और लम्बा हो सके.

यह बात मां ने जब बार-बार दोहराई तो गुरुदास राम शायद परेशान हो गये.

हाथ के गज को समेटते हुए कहा, इतना फिक्र न लगाइए इस बात का, बच्चों को खाने-पीने और बढ़ने दीजिए. पुराने ही कपड़े थोड़े पहनते रहेंगे. नये-नये कपड़े बनने दीजिए.

हम लोगों के गर्म कपड़े जब बनकर आये तो कमरा रंगों से जगमगाने लगा और हम खुशी से चहकने लगे.

बाजू और गले पर फर. टोपी के सामने फर. जगदीश भैया का सूट खूब स्मार्ट. उनकी टोपी मेरी से बिलकुल अलग.

‘लो काकाजी यह है साहिबी टोपी. जैसी साहिब लोग पहनते हैं और खूब तड़ी से माल पर घूमते हैं.’

बेबी निकर बाकर सूट पहनकर आयी तो गुरुदास के मुताबिक अंग्रेज़ बच्चे की तस्वीर लगने लगी.

‘भरजाई जी अब आपका माप ले लूं.’

मां ने कहा- मास्टरजी मेरा कोट तो अगले महीने ही बनाइए. मैंने अभी कपड़ा पसंद नहीं किया है. हां, फर के कोई टुकड़े बचें तो उन्हें सम्भालकर रखिएगा.

मास्टरजी ने रुखाई से पूछा- 

‘भला वह किसलिए?’

‘काम आ जाएंगे.’

‘अंगुली जितनी कतरनें किस काम आएंगी, बताइए तो सही. इतनी किड़सकारी भी अच्छी नहीं.’

‘बच्चों के स्लीपरों पर लग जाएंगी. मेरी छोटी-मोटी गुत्थलियों पर. यह देखिए कैसे लगाया है बॉर्डर इसके ऊपर.’

गुरुदास राम ने हाथ में पकड़ उस छोटी-सी थैली को उलट-पलटकर देखा और खुश होकर कहा- ‘दूंगा, आपको कुछ और भी दूंगा. आपकी सिलाई अच्छी है. अच्छा बच्चो जाओ, कपड़े एक बार ट्राई कर लो. ‘कोई नुक्स होगा तो ठीक कर दूंगा.’

हम तीनों अपनी-अपनी पोशाक पहनकर आये. हम ऐसे खड़े हुए जैसे हमें नम्बर दिये जा रहे हों, मां ने हमें कैसे देखा पता नहीं, पर मास्टरजी का चेहरा खिल उठा.

‘देखो भरजाई जी बच्चे अपने तो अंग्रेज़ लग रहे हैं.’

‘आपकी मेहरबानी है मास्टरजी. अगर सिलाई के लिए शागिर्दों को दे देते तो फिर यह हिंदुस्तानी ही लगते.’

मां अंदर गयीं. मास्टरजी का हिसाब किया और नौकर मास्टरजी के लिए नाश्ता ले आया.

मास्टरजी ने बड़े प्रेम से चाय खत्म की.

हमने बारी-बारी नमस्कार किया. और उनके जाते ही हम लोग बारी-बारी से अपने को आइने में देखने लगे.

‘हां, अंग्रेज़’ बिलकुल अंग्रेज़ बच्चे लग रहे हैं हम. शाम पिताजी ऑफिस से लौटे तो खामोशी से नयी सिलाई देखी. उनकी चाय लगी तो हम उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे कि वह नये कपड़ों के बारे में क्या कहते हैं?

मैं और भाई जगदीश दोनों इतराने लगे.

पिताजी, मास्टरजी ने कहा कि हम अंग्रेज़ बच्चे लग रहे हैं. पिताजी का चेहरा कुछ कड़ा-सा हो गया.

इशारा किया- ‘आओ यहां बैठो. पम्मी पुम्मी कपड़े पहनकर यह कभी न सोचना कि तुम अंग्रेज़ लग रहे हो. हम अंग्रेज़ नहीं हैं. हम देसी लोग हैं. हिंदुस्तानी. अगर तुम्हें कपड़े जंच रहे हों तो पहनकर यह सोचो कि हम देसी बच्चे भी चाहें तो ऐसे कपड़े पहन सकते हैं, जैसे अंग्रेज़ बच्चे पहनते हैं. मगर हम देसी हैं और देसी ही रहेंगे.’

हम लोग जैसे बड़े होते गये देसी और अंग्रेज़ी का फर्क समझ में आने लगा.

एक दिन खाने पर मैंने पिताजी से पूछा- हम लोग ब्लैस्टिंगटन रिंग में स्केटिंग के लिए क्यों नहीं जा सकते?

पिताजी ने सख्ती से देखा जैसे मैंने कुछ गलत पूछा हो.

स्केटिंग तो तुम्हें आती नहीं, वह सीखनी होती है. फिर रिंग में जाने का ख्याल कैसे आया? 

वैसे वहां, हिंदुस्तानियों को जाने की इजाज़त नहीं. उसके लिए हम लोगों को इंतज़ार करना होगा.

पहली बर्फ पड़ी तो हमारा सुबह का नाश्ता बदला. अंडा, टोस्ट, मक्खन और फल की जगह टोस्ट, दूध में अंडा और दूध में कुछ बूंदें ब्रांडी की मिलने लगीं.

हमें बाहर से खाने की चीज़ खरीदने, खाने की मनाही थी. जिस पर मन होता वह हम मां से कहते और हमें मिलता. स्कूल में हमारे टिफिन को हमारे साथी लालच से देखते. 

पहाड़ी कसमल और काफिल बहुत भाते. मगर गला खराब होने के डर से कम ही मिलते. एक और गजब की चीज़ थी अनारदाने का मीठा चूर्ण. वह माल पर नहीं सिर्फ लोअर बाज़ार में बिकता. कभी-कभी हमें दूध में जलेबी मिलती. वैसे घर में मिठाइयां बहुत कम और फल गगज्यादा होते. बिस्कुट और चॉकलेट के मजे लूटते.
मेज पर नाश्ता लगा है. 

मां किसी को परोस नहीं रही. सभी कुछ सामने है, जितना चाहो लो. उनकी ओर से इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता. मां की इस मुद्रा में खामोश निगरानी रहती मगर लाड़-प्यार की मुखरता नहीं.

हमें न यह अटपटा लगता और न ही अखरता. मां की इस भंगिमा ने अपने बारे में खुद सोचना सिखाया. किसी भी अतिरिक्त से उबारकर हमें स्वावलम्बी बनने का संस्कार दिया. किसी के कहे, दबाव में कुछ न करने का अहसास दिया! 

इसके साथ वह विवेक भी जो जहां तक हो सके ‘दूसरे’ और अपने बीच के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता.

सुबह उठते ही बरामदे की खिड़कियों से धुंध छाई दिखी. हम खुश हुए. छुट्टी का दिन इतवार. इस मौसम का मजा आएगा.

नाश्ते के लिए बैठे-मुझे आमलेट- मुझे पोच- मुझे उबला हुआ. टोस्ट पर मक्खन-मेरे टोस्ट पर मारम्लेड! दूध में ओवलटीन-कोको! 

पिताजी के सामने चाय की ट्रे रख दी गयी. अब मां और पिताजी चाय पी रहे हैं और हम फर्श पर रखे गोलमेज पर अपना-अपना सामान फैलाकर बैठ गये. 

मैं अपनी ज्योग्राफी बुक में पैंसिल से पठार बनाने लगी. 

कल ही तो सीखा था. दाएं हाथ की अंगुल तले पैंसिल रख, बाएं हाथ से पैंसिल को घुमाती चली. एक के बाद एक रेखाओं को. अब उस पर ब्राउन मटमैल रंग का पेंसिल घुमा दिया.

पिताजी को दिखाया. खुश हुए. अच्छा बना है- शाबाश! 

पिताजी ने अखबार मेज़ पर रख दिया और हमसे कहा- बच्चो, तुम्हें पंद्रह मिनट दिये जाएं तो क्या घूमने के लिए तैयार हो सकते हो?

हमने जल्दी से मेज समेटा और कपड़े बदले. मोजे-जूते पहन लिये.

मैंने मां के अटैची से स्टिकिंग, प्लास्टर और रुई ले अपने कोट की जेब में डाल ली. जब भी लम्बा चलें मेरी एड़ी पर छाले ज़रूर पड़ते हैं. उधर मां पिकनिक बॉस्केट तैयार कर रही हैं और गोबिंद मदद पर है.

हमने खूंटी पर से अपने-अपने रेनकोट और छाते उतारे और घोषणा की कि हम तैयार हैं. 

एकाएक टीन की छत पर टपका पड़ने लगा. बाहर जाने का प्रोग्राम रद्द समझो.
झुंझलाहट हुई. बरामदे में जाकर बरसात का रंग-ढंग देखने लगे.

देखा मां पिताजी रेनकोट और छाते पकड़े बाहर निकले! गोबिंद के हाथ में बॉस्केट. हम लोग गिरजा मैदान पर पहुंचने वाली अपने घर की चढ़ाई चढ़ने लगे.

कमांडर-इन-चीफ की कोठी पर पहुंचते-पहुंचते बारिश तेज़ हो गयी.

कुछ देर रुकना होगा.

जगदीश भाई ने पूछा- ‘पिताजी वायसराय बड़े हैं कि कमाडंर-इन-चीफ'.

‘यूं तो वायसराय बड़े हैं पर कमांडर-इन-चीफ के अंडर हिंदुस्तान की सारी फौजें हैं. वह भी कम नहीं.’

‘डफरिन जहाज भी कमांडर-इन-चीफ के नीचे है?’

‘सभी जहाज हवाई और पानी के उन्हीं के नीचे हैं. हां, तुम अच्छा पढ़ो तो तुम भी डफरिन में जा सकते हो.’

‘नहीं, नहीं पिताजी मैं पानी के जहाज में कभी नहीं जाऊंगा.’

फिर पिताजी ने मुझसे पूछा- ‘हमारी बेटी क्या करेगी बड़ी होकर?’

‘मैं पहाड़ों पर चढ़ूंगी, घोड़ा दौड़ाऊंगी, खूब मज़े करूंगी, पिताजी क्या समुद्र में घोड़ा दौड़ाया जा सकता है?’

‘तुम सोचो क्या कभी पानी पर घोड़ा सरपट भाग सकता है?’

‘नदी के कम पानी में दौड़ सकता है, पर समुद्र में नहीं.’

‘उसके पैरों तले लोहा लगा दिया जाए जो जहाज के तलवे में लगा होता है.’

‘बड़े घोड़े के पैर ज़मीन पर होने चाहिए. न घोड़ा समुद्र में भाग सकता है न ऊपर आसमान में, उसके पांव तले ज़मीन होनी चाहिए. घोड़ा पहाड़ पर चढ़ सकता है. सवार तजुर्बेकार होगा तो चढ़ जाएगा चोटी पर, नहीं तो गिराएगा खड्ड में. जैसे कोई घोड़ा सफेद, कोई काला, कोई ब्राउन-ग्रे- उसी तरह हम लोगों में कोई गोरा, कोई सांवला- वैसे ही जैसे अंग्रेज़ और हम लोगों में फर्क है.’

जगदीश भाई बोले- ‘अंग्रेज़ गुलाबी गोरे होते हैं जैसे बंदर.’

पिताजी ने सख्ती से भाई को खबरदार किया- ‘बंदर’ के साथ अंग्रेज़ को कभी मिलाना नहीं. समझे.’

‘पिताजी इससे क्या होगा?

‘पुम्मी मेरी बात ध्यान से सुनो- हमारे देश में अंग्रेज़ का राज है. फिर किसी की भी तुलना जानवर से करो यह कोई गवारा नहीं करेगा.’

जगदीश भाई पिताजी के दाएं से बाएं हो गये.

पानी तेज़ बरसने लगा था.
जो पहला शैड आया. हम सभी शैड के नीचे जा बैठे.
नीचे देखा बादलों के अम्बार पहाड़ों से ऊपर उठ रहे हैं.

पिताजी बोले- ‘लगता है कुछ देर में मौसम खुलेगा अभी यहीं बैठते हैं.’

‘पिताजी, कमाडंर-इन-चीफ की कोठी तक पहुंचते ही पानी बरसना बंद हो जाएगा.’

गोबिंद ने पूछा- ‘वह कैसे और क्यों बंद होगा काकाजी?’

‘कमांडर-इन-चीफ कहेंगे अगर मैं कह रहा हूं बंद हो जा तो पानी बरसना बंद ज़रूर होगा.’

मैंने भाई को चिकोटी काटी. 

‘ऐसे नहीं. फौजों के कमांडर-इन-चीफ बादलों को हुक्म देंगे. देखो, शिमला में बरसना बंद कर दो. हुक्म जारी हो चुका है. दिल्ली में जाकर बरसो.’

‘वाह! पिताजी ने मेरी सराहना की. शाबाश, अच्छा कह रही हो.’

बादल छंटने लगे और बाईं ओर के पहाड़ दीखने लगे. बारिश थम गयी थी.

मां ने सुषी बेबी का हाथ थामकर पूछा- ‘बेबी बताओ कहां बैठकर खाना खायें?

‘जी, सामने पहाड़ पर.’

‘बच्चो, चढ़ सकोगे ऊपर?’

मैंने कहा- ‘जी हां, खड़ी चढ़ाई नहीं है. पहाड़ आलथी-पालथी मारकर बैठा है.’

पिताजी ने पूछा- ‘किशन बेटी आजकल क्या पढ़ रही है?’

‘डी.एल. राय का दुर्गादास.’

‘हूं-हूं… फिर आलथी-पालथी वाली उपमा कहां से आयी.’

‘यह तो मैंने खुद ही सोचा है पिताजी. यह पहाड़ खड़ा तो नहीं है, आराम से बैठा हुआ लग रहा है.’

हम ऊपर चढ़ने लगे. पहाड़ अपने छोटे-बड़े पेड़ों के साथ अनोखा लग रहा था. पेड़ों के पत्ते पानी से भीगे थे.

मां ने कहा- बच्चो, आसपास घूमो, उतने में हम अपना काम करें.’

पिताजी ने जेब घड़ी देखी और कहा- सिर्फ दस-पंद्रह मिनट.
हम गीली ज़मीन पर कूदने-फांदने लगे.

एकाएक सुना किसी ने आवाज़ दी- स्टॉप.

हम उधर देखने लगे जिधर मां और पिताजी बैठे थे. आवाज़ उधर से नहीं थी. फिर आवाज़ आयी- स्टॉप.

देखा ऊपर से एक अंग्रेज़ टामी चला आ रहा है.

हम दौड़ते हुए पिताजी के पास जा खड़े हुए.

टॉमी ने अंग्रेज़ी में पिताजी से कहा-‘आप यहां क्यों बैठे हैं?’

‘आप बॉस्केट देख रहे हैं न. बच्चे पिकनिक पर आये हैं.’

‘यह पिकनिक की जगह नहीं.’

पिताजी ने कहा-‘यह प्राइवेट इस्टेट नहीं है.’

‘यह प्राइवेट इस्टेट ही है.’

‘बोर्ड कहां लगा है दिखाइए.’

‘अच्छा होगा अगर आप यहां से उठ जाएं.’

पिताजी ने हमसे कहा- ‘बच्चो, आप अपनी-अपनी बरसाती पर बैठो.’

मां की ओर देखा- ‘इन्हें खाने के लिए दीजिए.

मां ने उठकर मेवे वाला डिब्बा आगे किया-‘लीजिए.’
‘नो थैंक्यू.’

जगदीश भाई बोल उठे- ‘प्लीज़’ सर.’ 

टामी ने सिर हिलाया- हूं.
‘सो यू नो इंग्लिश.’
‘सर, वी ऑल नो इंग्लिश.’
‘युअर स्कूल?’
‘हार्टकोट बटलर!’

‘तुम जानते हो हार्टकोट बटलर कौन थे?’

‘जी, हमारे मदरलैंड के वायसराय.’

टामी ने हंसकर शाबाशी दी- ‘गुड-गुड.

अब पिताजी की बारी थी.
टामी से कहा-‘मैं पृथ्वीराज हूं और आप?’

‘विलियम ट्रैविलयन.’

दोनों ने हाथ मिलाया. पिताजी ने बैठे-बैठे ही.

मिस्टर रिचर्ड्सन का बंगला पहाड़ के दूसरी तरफ है.
मैं उनके होम स्टॉफ में हूं.

पिताजी ने सख्ती से देखा और मासूमियत से कहा- उन्हें मेरी याद दिलाइएगा. कभी उनकी और हमारी ब्रांच एक ही फ्लोर और एक ही विंग में बैठती थी.

टामी ने गोरेपन की अदा से कहा- ‘अच्छा, मुझे मालूम नहीं था. अब चलता हूं.’

पिताजी ने हंसकर कहा- ‘याद रखें यह पिकनिक की जगह है. इस पर किसी का भी ऐतराज करना वाजिब नहीं.’ 

गोरे साहिब ने देसी साहिब से हाथ मिलाया.

‘आई एम रियली सॉरी सर.’
‘आगे से आप याद रखें यहां सबको पिकनिक की छूट है.’

टामी को ऊपर जाते हम सभी देखते रहे. जब आंख से ओझल गये तो जगदीश भाई बोले- ‘पिताजी, यह गोरा हमें यहां बैठने से क्यों मना कर रहा था.’

‘इसलिए कि हमारे मुल्क की हुकूमत गोरों के पास है.’

(साभार: ‘अन्यथा’ में प्रकाशित एक लम्बे इंटरव्यू का सम्पादित अंश)

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