Satya Darshan

आयकर दिवस, 24 जुलाई: 159 वर्ष पुराना है देश में आयकर का इतिहास

दिवस विशेष | जुलाई 24, 2019

हमारे देश में कर या टैक्स प्राचीन काल से ही वर्तमान प्रत्‍यक्ष कर प्रणाली किसी न किसी रूप में चलती आ रही है। मनुस्‍मृति और अर्थशास्‍त्र, दोनों में अनेक प्रकार के करों के संदर्भ मिलते है। इसका उद्देश्य जनता का अधिकाधिक कल्याण करना है। तात्विक कार्यो के सम्यक्‌ सम्पादन के लिए करों द्वारा ही शासन को आर्थिक दृढ़ता प्राप्त होती है।

देश में आयकर की शुरुआत 1860 में हुई जब भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल की परिषद में वित्त सदस्य सर जेम्स विल्सन ने आयकर कानून लागू किया। यह कर धनवानों, रजवाड़ों और देश में रहने वाले ब्रिटेन के नागरिकों पर लगाया गया था। पहले साल आय कर से सरकारी खजाने को 30 लाख रुपए मिले थे।

ताकतवर लोगों को यह कानून पसंद नहीं था इसलिए 1865 में यह निरस्त कर दिया। 1867 में कुछ बदलावों के साथ इसे फिर से पेश किया गया। कर की दरें फौरी आकलन के आधार पर तय की जाती थी। ब्रिटेन और रुस युद्ध के समय अतिरिक्त संसाधन की जरूरत पड़ी। 

तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डुफ्रिन ने नया आयकर कानून 1886 पेश किया। आधुनिक भारत का यह पहला व्यापक आयकर कानून था। इससे 1886-87 में 1.36 करोड़ रुपए की राजस्व वसूली हुई।

वर्ष 1914-15 में 3.32 लाख आयकरदाता थे और कर वसूली 3.05 करोड़ रुपए रही। पहले विश्वयुद्ध के बाद धन की तंगी को देखते हुये 1916 में पहली बार कर की अलग-अलग दरें तय की गई। वर्ष 1917 में युद्धप्रयासों के चलते ‘सुपरटैक्स’ लगाया गया। वर्ष 1918-19 में आयकर वसूली 11 करोड़ रुपए रही।

असहयोग आंदोलन के समय पहली बार वर्ष 1922 में व्यापाक आधार वाला आयकर कानून 1922 बनाया गया, इसी समय आयकर विभाग की विकास की कहानी शुरु हुई। वर्ष 1924 में केन्द्रीय राजस्व बोर्ड के हाथों कर प्रशासन दिया गया। 25 अप्रैल 2941 को आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण अस्तित्व में आया। वर्ष 1939-40 में कुल आयकर वसूली 19.82 करोड़ रुपए रही थी।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध और बढते कर बोझ के चलते कर चोरी बढ़ने लगी जिसके परिणाम स्वरुप वर्ष 1943 में विशेष जांच शाखाएं स्थापित की गई। वर्ष 1945 में पहली बार आयकर अधिकारियों की सीधी भर्ती की गई इसके लिए भारतीय लेखा और लेखापरीक्षा परीक्षा रखी गई। बाद में इसे ही भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) का नाम दिया गया।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पुननिर्माण और सामाजिक कल्याण के लिए राजस्व बढ़ाने की जरूरत महसूस हुई और 1922 का आयकर कानून को ही सभी राज्यों में लागू किया गया। वर्ष 1945-46 में आयकर वसूली बढ़कर 57.12 करोड़ रुपए थी। आजादी के बाद वर्ष 1953 में भू-शुल्क अधिनियम अस्तित्व में आया।

कैब्रिज (ब्रिटेन) के अर्थशास्त्री प्रो. निकोलस काल्डोर की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार ने संपत्ति कर अधिनियम 1957, व्यय कर अधिनियम 1957 और उपहार कर अधिनियम 1958 पारित कराए। वर्ष 1958 में ही नये आयकर अधिनियम पर कानून आयोग की रिपोर्ट सौंपी गई और इसी दौरान 1958 में प्रत्यक्ष कर प्रशासन जांच समिति भी स्थापित की गई।

विधि आयोग और जांच समिति की सिफारिशों के आधार पर आयकर अधिनियम 1961 पारित किया गया जो पहली अप्रैल 1962 से प्रभावी हो कर आज तक लागू है।

सरकार ने नयी अवश्यकताओं को देखते हुए एक नया कर बनाने का निर्णय किया है और इसके लिए प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) विधेयक संसद में पेश कर दिया गया है और इस पर स्थायी समिति विचार कर रही है।

वर्ष 1960-61 में प्रत्यक्ष कर वसूली 287.47 करोड़ रुपए रही थी। वर्ष 1963 में केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम के जरिये केन्द्रीय राजस्व बोर्ड के स्थान पर दो अलग अलग केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) और केन्द्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) बना दिए गए।

वर्ष 2010 में पहला आयकर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर दिल्ली में तब एक कार्यक्रम भी आयोजित हुआ था। इस कार्यक्रम का उद्‍घाटन तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने किया था। आयकर विभाग प्रथम आयकर दिवस को यादगार बनाने के लिए डाक टिकट और सिक्के भी जारी किये थे।

इस दिन आयकर दिवस के अवसर पर विभाग अधिकारियों को भी सम्मानित किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन आयकर विभाग अपना प्रतीक चिन्ह भी जारी करने की योजना बना रहा है।

वित्त वर्ष 2010-11 में प्रत्यक्ष कर वसूली 4,46,070 करोड़ रुपए तक पहुंच गई थी।

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