Satya Darshan

खुशहाली का बढ़ना हो बजट का पैमाना

पार्थसारथी | जुलाई 23, 2019

पिछले दिनों पेश आम बजट परंपरागत ढांचे वाला है। हाल ही में न्यूजीलैंड में पेश वार्षिक बजट एक खुशहाली मसौदे के अनुरूप तैयार किया गया था। यह एक नई राह दिखाने वाली कोशिश है। न्यूजीलैंड ने इस बजट के संकल्पनात्मक आधार एवं वैश्विक दृष्टि के तौर पर 'सर्वसमावेशी दार्शनिक नजरिया' अपनाया है। 

इसने खुशहाली आंकने के लिए जीवन-स्तर प्रारूप (एलएसएफ) में समाहित संकेतकों का इस्तेमाल किया है। उसने खुशहाली के मानक माने जाने वाले संकेतकों के लिए तकनीकी परिभाषाओं एवं श्रमसाध्य आंकड़ों के लिए ध्यान से जुटाई जानकारी भी इस्तेमाल की है। न्यूज़ीलैंड ट्रेजरी के टोनी बर्टन ने सरकार की जीवन-स्तर पर जारी रिपोर्ट 'ऑवर पीपल, ऑवर कंट्री ऐंड ऑवर फ्यूचर' के संदर्भ में हाल ही में लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में ये बातें कहीं।

व्यक्तिगत खुशहाली की तेजी से उभरी संकल्पना बड़ी तेजी से फैली है। इसमें समग्र जीवन संतुष्टि के साथ जीवन की सार्थकता का अहसास भी शामिल है। यह आराम एवं मौजमस्ती में व्यतीत किए जाने वाले समय और उसकी गुणवत्ता के रूप में प्रदर्शित होता है। लोग अपना खाली समय किस तरह व्यतीत करते हैं? भारत की निम्न खुशहाली रैंकिंग को देखते हुए क्या भारत को भी अपने भविष्य के अपने बजट में खुशहाली परिप्रेक्ष्य अपनाने की कोशिश करनी चाहिए? ऐसा होने पर बजट निर्माण प्रक्रिया के दौरान भारत की मौजूदा चुनौतियां नजर आने लगेंगी। वैसे भी अब भारतीय बजट में गोपनीयता की उपयोगी भूमिका नहीं रह गई है।

ऐसा मकसद हासिल करने के लिए हमें एलएसएफ और उसके साधनों के प्रति न्यूज़ीलैंड के नजरिये का परीक्षण करने की जरूरत है। एलएसएफ का सामाजिक आधार नागरिकों की संलिप्तता और शासन का आश्वासन है। बेहतर शासन का पता इससे चलता है कि आबादी का कितना अनुपात भेदभाव की शिकायत करता है और कोई समूह अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने में कितना सफल रहता है? 

भारत में भी खुशहाली मानक वाले बजट को अपनाने के लिए यह एक समुचित मानक होगा। न्यूज़ीलैंड ने 2019 के अपने बजट में जो पांच प्राथमिकताएं तय की हैं उनमें एक टिकाऊ एवं निम्न उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था, डिजिटल भागीदारी, माओरी एवं प्रशांत क्षेत्र की आय एवं कौशल बढ़ाना, बाल गरीबी एवं पारिवारिक हिंसा में कटौती और बच्चों की खुशहाली बढ़ाने के साथ ही मानसिक सेहत संवद्र्धन शामिल हैं। इन सभी प्राथमिकताओं को मापन-योग्य मानदंडों में बांटा भी गया था। 

जीवन-स्तर मसौदे में चुनिंदा सूक्ष्म अर्थशास्त्रीय मानदंडों के संदर्भ में, पर्यावरण की गुणवत्ता एक केंद्रीय चिंता है। इसमें वैज्ञानिक रूप से दर्ज वायु गुणवत्ता, संतोषजनक जल गुणवत्ता और बस्ती के एक किलोमीटर के दायरे में प्राकृतिक परिवेश आता है। जन्म के समय शिशु की जीवन प्रत्याशा, स्वास्थ्य की स्थिति, रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली मुश्किलें और खराब मानसिक सेहत से गुजर रही आबादी का अनुपात भी इन मानदंडों में शामिल हैं। आवास भी एक मानक है जिसमें प्रति व्यक्ति कमरों की उपलब्धता, घर की लागत का बोझ और आवास की गुणवत्ता जैसे बिंदु हैं। वयस्कों की शिक्षा और 15 साल की उम्र तक संज्ञानात्मक कौशल का स्तर भी मानदंड बनाया गया है।

आय एवं उपभोग जैसे वृहद आर्थिक मानदंडों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया था। लोगों की सभी स्रोतों से प्राप्त खर्च-योग्य आय, खर्च की मात्रा और उनके पास उपलब्ध भौतिक वस्तुओं को भी जगह दी गई। रोजगार एवं आय मानदंड के तहत बेरोजगारी दर, रोजगार दर, माध्य प्रति घंटा आय, काम के दौरान हादसों की दर और नौकरी पर तनाव जैसे बिंदु समाहित हैं। 

इस बजट प्रक्रिया में सामाजिक हालात को भी मानदंड बनाया गया। प्रति एक लाख आबादी पर हत्या की अंतरराष्ट्रीय दर, पीडित बताए जाने की घटनाएं और सुरक्षा को लेकर लोगों की भावना को भी मानक बनाया गया। सामाजिक संपर्क में सामाजिक नेटवर्क का सहयोग, अकेलापन और सकारात्मक सामाजिक गतिविधियों में व्यतीत समय शामिल हैं। बच्चों एवं बिना बच्चों वाले दंपतियों से संबंधित आंकड़ों को भी इसमें जगह दी गई।

हालांकि जीवन-स्तर मसौदा कोई स्थिर प्रारूप नहीं है। यह इस बात को मानता है कि 'चार तरह की पूंजी' की वृद्धि, वितरण एवं स्थायित्व का अंतरराष्ट्रीय खुशहाली पर प्रभाव होता है। ये चार पूंजी हैं- प्राकृतिक पूंजी, सामाजिक पूंजी, मानव पूंजी एवं वित्तीय एवं भौतिक पूंजी। प्राकृतिक पूंजी में जमीन, मिट्टी, पानी, पेड़-पौधे और जानवर जैसे प्राकृतिक पर्यावरण वाले पहलू आते हैं। सामाजिक पूंजी के तहत विश्वास, कानून का शासन, सांस्कृतिक पहचान, लोगों एवं समुदाय के बीच संपर्क और समाज को सहारा देने वाले मानदंड एवं मूल्य आते हैं। 

न्यूज़ीलैंड के मूल निवासियों माओरी की संस्कृति का संरक्षण भी इसमें अंतर्निहित है। मानवीय पूंजी में लोगों की दक्षता, ज्ञान, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य जैसे पहलू समाहित हैं जो लोगों को पढ़ाई, काम और मौजमस्ती के लायक बनाते हैं। वित्तीय एवं भौतिक पूंजी के अंतर्गत मकान, सड़क, इमारतें, अस्पताल, कारखाने, साजोसामान और गाडिय़ां आती हैं और आय बढ़ाने एवं भौतिक जीवन स्थिति बेहतर करने में उनकी भूमिका होती है। ये सारी पूंजी अंतर्निर्भर हैं और एक साथ मिलकर खुशहाल जीवन का निर्माण करती हैं।

बजट निर्माण की यह प्रक्रिया जटिल थी। जैसे, मंत्रालयों के फैसले सरकारी प्राथमिकता निर्धारण एवं मूल्यपरक निर्णयों पर आधारित थे। आंकड़ों, विश्लेषण एवं परामर्श के जरिये सरकारी प्राथमिकताओं के बारे में सूचित किया गया और फिर पर्यावरण, सामाजिक विकास, बाल खुशहाली इकाई और वित्त जैसे कई मंत्रालयों को भी उससे जोड़ा गया। फिर उन्हें कैबिनेट समितियों एवं कैबिनेट की पूर्ण बैठक में भेजा गया जहां पर समग्र बजट रणनीति के हिसाब से अनुरूपता का परीक्षण किया गया। आखिर में कैबिनेट ने बजट प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी। 

हालांकि इसमें कुछ जोखिम होने की बात को भी न्यूज़ीलैंड ने माना है। सरकारी क्रियाकलापों के व्यापक दायरे के बारे में जानकारी के सीमित होने का जोखिम भी शामिल है। सेवा देने वाली सरकारी एजेंसियों से खुशहाली बढ़ाने में योगदान देने की अपेक्षा है लेकिन उनके मौजूदा कार्यों से अलग काम भी उन्हें करने पड़ सकते हैं। निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व को खुशहाली लाने वाले बजट की अहमियत पर गौर करने की जरूरत है जो व्यय आवंटन को न्यायसंगत बना सकेंगे। यह सरकारी व्यय को लेकर पीढ़ीगत स्थायित्व की दिशा का भी संकेत देंगे। देश एकपक्षीय ढंग से कदम उठा सकते हैं। 

भारत पर्यावरणीय स्थायित्व से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है और यहां बेहद गरीबी में जी रहे लोगों की संख्या में गिरावट भी अपेक्षित नहीं रही है। इसके अलावा भारत के सामाजिक-आर्थिक संकेतक भी संतोषजनक नहीं हैं। पिछले महीनों में आए तमाम संकेतक इस ओर इशारा करते हैं। ऐसे में सरकार को खुली एवं सहभागी परामर्श के जरिये अपनी प्राथमिकता तय करने में अधिक पारदर्शिता लाने की जरूरत है।

भारत में जीवन-स्तर प्रारूप अपनाने के लिए व्यापक कोशिश की जरूरत होगी लेकिन ऐसा किया जा सकता है। भारत में पहले से ही काफी सांख्यिकीय आंकड़े मौजूद हैं। अब नए उपकरणों वाले नजरिये एवं विवरण पर बारीक नजर रखने की जरूरत होगी। क्या भारत अगले तीन वर्षों में खुशहाली आधारित बजट पेश करने वाली पहली उदीयमान अर्थव्यवस्था बन सकता है या कम-से-कम इसकी घोषणा ही कर सकता है? 

ऐसा होने पर ही भारत के लोगों की खुशहाली बढ़ाने पर होने वाले सार्वजनिक व्यय की पारदर्शी ढंग से निगरानी हो सकेगी और जरूरी होने पर उसे सही किया जा सकेगा। अभी खुशहाली के तमाम मानदंडों पर निचले पायदान पर मौजूद भारत केवल इसी तरह से अपनी स्थिति में सुधार कर पाएगा।

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