Satya Darshan

आह की सरगम, मिलन का स्पर्श और भीड़ का एकांत है अमर गायक 'मुकेश' की आवाज़

जयंती विशेष | जुलाई 22, 2019

दर्द ने गीतों में ढल कर जुबां पर चढऩे की ख्वाहिश की, जब विरह की विकलता ने माशूक को आवाज दी, जब नाकामी ने झूम कर गाने का तसव्वुर किया, जब मासूम मोहब्बत ने इजहार की तमन्ना की, जब मायूस यादों के रेगिस्तान पर उम्मीद की बदली छाई, तब ऐ मुकेश, तेरी बहुत याद आई। मुकेश नाम है पीड़ा के पैरहन का, आह की सरगम का, मिलन की छुअन का, विरह की अगन का, भीड़ के एकांत का, मजबूर के सम्मान का, निराशा की आशा का, टूटती उम्मीद में मचलती उमंग का, हसरतों की हरारतों में हमकदम के जिक्र का। मुकेश नाम है रूह की अभिव्यक्ति का। तभी तो अमर गीतकार हसरत जयपुरी ने मुकेश के बारे में लिखा है,

वो सुर का देवता था जाने कहां छुपा है,
'हसरत' का दिल उसे तो रह-रह के ढूंढता है

जो गीत उसने गाया वो गीत ही अमर है,
लोगों के साथ उसकी वो प्रीत ही अमर है,

उसकी सदायें उसके नगमों से आ रही है,
जो दिल दुखा रही है सबको रुला रही है

ऐ दिल 'मुकेश' जैसा सिंगर कहां से लाऊं
मीठी सदाओं वाला दिलबर कहां से लाऊं

ये दौर गायकों का यूं ही चला करेगा
लेकिन 'मुकेश' जैसा कोई न मिल सकेगा

जब दिल की गहराइयों से निकलकर रूह तक पहुंच जाने वाली आवाज की बात चलती है तो बस मुकेश का जिक्र होता है। 

अमर चित्रकार और मूर्तिकार लियोनार्डो द विंची की राय में सरल होना सबसे बड़ी खासियत होती है। बॉलीवुड में एक ऐसे गायक थे जिनकी इसी खासियत की बदौलत उन्हें करोड़ों चाहने वाले मिले। उनके गाने सुनिए आपको लगेगा कि ऐसा तो मैं भी गा सकता हूं। भारतरत्न लता मंगेशकर उन्हें भाई मानती थीं। इसके अलावा उनके चाहने वालों में क्रिकेटर चंद्रशेखर और सचिन तेंदुलकर भी शामिल थे।

इस कलाकार से जुड़ा एक किस्सा बड़ा दिलचस्प है। एक बार संगीतकारों की मशहूर जोड़ी कल्याण जी- आनंद जी के स्टूडियो में इस कलाकार ने अपना गाना रिकॉर्ड किया और उसके बाद वो वहां चले गए। उसी दौरान एक शास्त्रीय गायक कल्याण जी- आनंद जी के पास पहुंचे।

उन्होंने कल्याण जी आनंद जी से पूछा कि इस गायक को राग और सुरों का कुछ पता भी है या ये सिर्फ बगैर कुछ सोचे-समझे गाने गा देता है, चलता भी मर्सिडीज से है। कल्याण जी आनंद जी ने उस शास्त्रीय गायक से बहस करने की बजाए एक अनोखा प्रयोग किया। कल्याण जी-आनंद जी ने वही गाना उस शास्त्रीय गायक को गाने के लिए दिया। गाने के सुर समझा दिए।

शास्त्रीय गायक ने तमाम मुरकियां लेकर वो गाना गा दिया। कल्याण जी आनंद जी ने फिर से समझाया कि इस गाने में मुरकियां नहीं हैं आप सिर्फ सही सुरों में इसे गा दीजिए। रिकॉर्डिंग के कई 'टेक' हो गए लेकिन मुरकियां कम नहीं हुई। इसके बाद कल्याण जी आनंद जी ने बड़ी संजीदगी से उस शास्त्रीय गायक से कहाकि अब आपको समझ आया जो गायक थोड़ी देर पर मर्सिडीज से गया उसकी क्या खासियत है।

आसान गाना भी कहीं से आसान काम नहीं है। अब आपको समझ आ गया होगा कि वो गायक मर्सिडीज से क्यों चलता है। अगर आप अंदाजा नहीं लगा पाए तो मैं बताता हूं आपको। वो गाना था- चंदन सा बदन, चंचल चितवन धीरे से तेरा वो मुस्काना... और ये किस्सा है हरदिल अजीज गायक मुकेश का। मुकेश यानी मुकेश चंद माथुर। जिस गायक के दर्द भरे नगमें लाखों प्रेमियों के दिलों में अब भी धड़कते हैं।

ऐसा भी नहीं था कि मुकेश को शास्त्रीय संगीत या रागदारी की समझ नहीं थी। उन्होंने कई ऐसे गाने गाए जो शुद्ध रूप से शास्त्रीय संगीत पर आधारित थे, लेकिन उन गानों में भी उनकी सहजता ही सुनने वालों का दिल जीत ले गई। मसलन- 1962 में एक फिल्म आई थी- संगीत सम्राट तानसेन। इस फिल्म के डायरेक्टर और संगीत निर्देशक एसएन त्रिपाठी थे। उन्होंने इस फिल्म में राग सोहनी पर एक गीत कंपोज किया था, जिसे मुकेश ने गाया था।

गाने के बोल थे- 'झूमती चली हवा, याद आ गया कोई।' इस फिल्म में दर्जन से ज्यादा गाने थे जिसमें से मुकेश ने इकलौता गाना गाया था। बाकी के गाने मन्ना डे, लता मंगेशकर और महेंद्र कपूर के गाए हुए थे लेकिन पचास साल बाद भी जब इस फिल्म का जिक्र होता है तो वही गाना याद आता है जो मुकेश का गाया हुआ था।

22 जुलाई 1923 को दिल्ली में जन्मे मुकेश उस दौर में आए ऐसे गायक थे जिन्हें शास्त्रीय संगीत के लिए नहीं जाना जाता था। मुकेश के पिता जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे। मुकेश के दस भाई बहन थे, वो छठे नंबर पर थे। हुआ यूं कि मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत सिखाने एक शिक्षक आते थे। मुकेश साथ के कमरे से सुनते और सीखते थे। दसवीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और कुछ समय पीडब्ल्यूडी में काम भी किया। उन्हीं दिनों मुकेश के एक दूर-दराज के रिश्तेदार थे- मोतीलाल। मोतीलाल जी खुद एक जाने-माने अभिनेता थे। उनके घर ब्याह था।

रिश्तेदारी थी लिहाजा मुकेश भी वहां गए हुए थे। शादी-ब्याह में गाने बजाने की रस्म होती ही है। मुकेश कोई गाना गा रहे थे और मोतीलाल वहीं बैठे सुन रहे थे। उन्हें मुकेश की गायकी में कुछ खास बात समझ आई। इसके बाद ही मोतीलाल उन्हें मुंबई ले आए, जहां मुकेश ने पंडित जगन्नाथ प्रसाद से सीखना शुरू किया। 1945 में फिल्म आई- पहली नजर। मोतीलाल फिल्म में थे। मुकेश ने गाया - दिल जलता है तो जलने दे। गायकी का अंदाज ऐसा कि सुनने वालों को लगा कि गाना केएल सहगल ने गाया है। यहां तक कि जब सहगल ने गाना सुना तो कहा कि ताज्जुब है, मुझे याद नहीं आ रहा कि मैंने ये गाना कब गाया।

इसके बाद करियर के कुछ और शुरुआती गाने मुकेश ने केएल सहगल के अंदाज में गाए। सहगल उस वक्त के बड़े स्टार भी थे। बाद में मुकेश को मुकेश के अंदाज में गाने के लिए प्रेरित करने का श्रेय नौशाद को दिया जा सकता है। नौशाद के बाद धीरे-धीरे हर संगीतकार एक खास किस्म के गाने के लिए मुकेश को ढूंढता था। राज कपूर की तो वो आवाज ही बन गए। 

यहां तक कि जब फिल्म चोरी-चोरी के लिए मुकेश समय नहीं निकाल पाए तो म्यूजिक डायरेक्टर शंकर जयकिशन ने मन्ना डे से गाना गवाने का फैसला किया। इस बात की जानकारी जब स्टूडियो के मालिक को हुई तो उन्होंने यह कहकर रिकॉर्डिंग ही कैंसिल कर दी कि राज कपूर की आवाज मुकेश के अलावा कोई और बन ही नहीं सकता। बाद में राज कपूर के बहुत समझाने पर मन्ना डे से 'ये रात भीगी भीगी' गावा गवाया गया, जो जबरदस्त हिट हुआ।

अपने उत्कृष्ट गायन के लिये ऐसा कौन सा पुरस्कार है जिसे मुकेश ने प्राप्त न किया हो। सर्वश्रेष्ठ गायक के लिये राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड कई बार उन्हें प्राप्त हुए। वे उस ऊँचाई पर पहुँच गए थे कि पुरस्कारों कि गरिमा उनसे बढ़ने लगी थी, लोकप्रियता के उस शिखर पर विद्यमान थे जहाँ पहुँच पाना किसी के लिए एक सपना होता है। करोड़ों भारतवासियों के हृदयों पर उनका अखंड साम्राज्य था और रहेगा। 27 अगस्त 1976 को डेट्रायट, कनाडा में एक संगीत-समारोह के दौरान एक प्रचंड हृदयाघात ने असमय ही उनको हमसे छीन लिया। लेकिन मुकेश आज भी अमर हैं। कलाकार की कभी मौत नहीं होती। उनके गीत आज भी वातावरण में वैसे ही गूँजते हैं —

एक दिन मिट जाएगा माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल....

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