Satya Darshan

गायों की कब्रगाह बनती यूपी की गोशालाएं

समीरात्मज मिश्र | जुलाई 22, 2019

उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद गोशालाओं में न तो गायों की मौत में कोई कमी आ रही है और न ही सड़कों और खेतों में घूमने वाली गायों की संख्या में.

पिछले हफ्ते प्रयागराज की गोशाला में बड़ी संख्या में हुई गायों की मौत के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई कड़े फैसले लिए. प्रयागराज समेत जिन जगहों पर गोशालाओं में गायों की मौत हुई थी, वहां के कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, कुछ को चेतावनी दी गई, गोशाला में गायों के मरने पर सीधे जिलाधिकारी और मुख्य पशु चिकित्साधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई, बावजदू इसके कई जगहों से गायों के मरने की खबरें लगातार आ रही हैं.

प्रयागराज के बहादुरपुर ब्लॉक के कांदी गांव की एक अस्थाई गोशाला में पिछले दिनों तीन दर्जन से ज्यादा गायों की मौत हो गई. मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने इसकी वजह बिजली गिरना बताया जबकि गांव वालों का कहना था कि वहां बिजली गिरने जैसी कोई घटना हुई ही नहीं, बल्कि गायों की मौत भूख से और दलदल में फंसकर हुई. ये अलग बात है कि बाद में आई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी गायों के मरने की वजह बिजली गिरने से ही बताई गई लेकिन घटना के बाद मुख्यमंत्री के आदेश पर वहां पहुंचे गोसेवा आयोग के सदस्यों को भी इस पर विश्वास नहीं हुआ.

लेकिन कांदी गांव के निवासी सुरेश तिवारी का कहना था, "गोशाला जल्दबाजी में एक तालाब को पाटकर बनाई गई थी. कई दिन लगातार बारिश होने से तालाब में पानी भर गया. बारिश की वजह से आस-पास की जमीन दलदली हो गई. बारिश में खुद को बचाने के लिए गायें जब इधर-उधर भागीं तो उसी दलदल में फंस गईं. कुछ निकल गईं और कुछ वहीं रह गईं. कोई देखना वाला तो था नहीं.” सुरेश तिवारी की बातों की पुष्टि गांव के कई अन्य लोग भी करते हैं. कई लोगों का ये भी दावा है कि मरने वाली गायों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी और ज्यादातर गायों को जेसीबी मशीन मंगाकर वहीं दफना दिया गया.

यही नहीं, प्रयागराज में ही जिस वक्त इस घटना पर हंगामा मचा हुआ था और जांच चल रही थी, दो और गोशालाओं में कई गायों के मरने की खबर आ गई. स्थानीय लोगों की मानें तो इस गोशाला में सिर्फ पचास गायों को रखने की जगह थी जबकि यहां साढ़े तीन सौ से ज्यादा गायें रह रही थीं और भूख-प्यास से तड़प रही थीं. प्रयागराज के बाद अयोध्‍या में भी 30 गायों की मौत की खबर आई. आरोप हैं कि मृत गायों के शवों को पोस्टमार्टम के बिना गोशाला में ही जेसीबी मशीन की मदद से दफना दिया. इसके अलावा मिर्जापुर, चंदौली, कन्नौज, बांदा, महोबा, बलरामपुर में भी गोशालाओं में गायों के मरने की खबरें मीडिया में तैरती रहीं.

लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग की और चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होने पर दोषी लोगों के खिलाफ गोवध निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी. मुख्यमंत्री ने गो-आश्रय स्थलों के संचालन की संयुक्त जिम्मेदारी जिलाधिकारी और मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को सौंपते हुए उन्हें चारा, टीकाकरण और शेड निर्माण का समुचित बंदोबस्त करने को कहा है.

उत्तर प्रदेश में पिछले दो हफ्ते में ही अलग-अलग जगहों पर सैकड़ों गायों की मौत हो चुकी है. ज्यादातर मौतें या तो भूख से हुई हैं या फिर गोशालाओं में हो रही अव्यवस्थाओं के चलते हुई हैं. मौसम की वजह से भी गायों की मौत हुई है क्योंकि बरसात और उसके बाद होने वाले जलभराव से बचने का इन गोशालाओं में समुचित इंतजाम नहीं है. ऐसा तब हो रहा है जबकि राज्य सरकार ने ना सिर्फ बजट में करीब ढाई सौ करोड़ रुपये का प्रबंध गोशालाओं के निर्माण और गायों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए किया है बल्कि गायों के नाम पर शराब और टोल पर अतिरिक्त कर भी लगाए गए हैं.

बावजूद इसके राज्य का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो जहां से आए दिन गायों-बछड़ों के मरने की खबर ना आती हो, वो भी भूख से मरने की. राज्य सरकार ने इसी साल सभी गांवों में गोशाला और शहरी इलाकों में पक्के आश्रय स्थल बनवाने के निर्देश दिए थे लेकिन ज्यादातर आश्रय स्थलों में गायें चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ दे रही हैं या फिर उन्हें बाहर ही घूमने के लिए छोड़ दिया जा रहा है.

बुंदेलखंड इलाके में अन्ना पशु वहां के किसानों के लिए पहले सी गंभीर समस्या बने हुए थे, अब ये स्थिति और बिगड़ गई है. गोवंश आश्रय स्थलों के निर्माण की शुरुआत सबसे पहले इसी इलाके से हुई लेकिन स्थिति ये है कि आश्रय स्थलों ने गायें नदारद हैं क्योंकि वहां चारे-पानी की व्यवस्था नहीं है. उत्तर प्रदेश में 516 पंजीकृत और करीब चार हजार अस्थायी गोशाला हैं. पशुपालन विभाग के मुताबिक राज्य भर में करीब साढ़े सात लाख अन्ना यानी छुट्टा पशु थे जिनमें से आधे पशुओं को आश्रय स्थलों में पहुंचा दिया गया है.

पशुपालन विभाग के एक बड़े अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "कुछ जगहों पर प्रशासनिक सख़्ती के बाद आश्रय स्थलों में पशु तो पहुंचा दिए गए लेकिन भीषण गर्मी में चारे-पानी की जब कोई व्यवस्था नहीं है तो गोशाला संचालक भी सोचते हैं कि गर्मी में मरने की बजाय इन्हें खुला ही छोड़ दिया जाए.”

इस साल जनवरी में यूपी सरकार ने बजट में गोशालाओं के निर्माण और रखरखाव के लिए 248 करोड़ आवंटित किए थे. इससे पहले, 16 नगर निगमों को दस-दस करोड़ रुपये गायों के रहने के लिए कान्हा उपवन बनाने और चारे के लिए दिया गया था.

पिछले साल भी 69 शहरी निकायों में गोशालाओं के निर्माण के लिए 10 लाख से 30 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई थी लेकिन ज्यादातर जगहों पर इस धनराशि का इस्तेमाल ही नहीं हुआ. सरकार ने गोरक्षा के लिए शराब पर सेस लगाकर 165 करोड़ रुपये वसूलने की भी व्यवस्था की है लेकिन गोशालाओं में बदइंतजामी के चलते गायें लगातार दम तोड़ रही हैं.

राज्य के पशुधन विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी कहते हैं, "अभी तक गोवंश की रक्षा और उनके संरक्षण के लिए कोई काम नहीं हुआ था. अब हम लोग कर रहे हैं. थोड़ी बहुत शिकायतें तो शुरुआत में मिलती ही हैं लेकिन आगे सब ठीक हो जाएगा. जहां पशुओं की मौत ज्यादा हुई है उसकी जांच कराई जा रही है. लेकिन किसी भी गोशाला में चारे और पानी की कमी नहीं होने दी जाएगी.”

दरअसल, गोशालाओं के संचालन के लिए सरकार प्रति पशु तीस रुपये प्रति दिन के हिसाब से देती है. एक गोशाला संचालक कहते हैं कि तीस रुपये में एक गाय को एक टाइम का भी चारा नहीं दिया जा सकता. उनके मुताबिक, "सरकार को लगता है कि वो बहुत दे रही है लेकिन सच्चाई ये है कि इतने पैसे में किसी गाय का पेट कैसे भरा जा सकता है.”

वहीं राज्य सरकार के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि इसकी कोई सम्यक योजना नहीं बनाई गई और बिना योजना के ही लागू कर दिया गया. उनके मुताबिक, गांवों और स्थानीय निकायों को गोशाला बनाने और उसका संचालन करने का काम तो दे दिया गया लेकिन फंड की कमी तो है ही, समय से पैसा भी नहीं पहुंचता है, तो ऐसे में दिक्कत आएगी ही.

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