Satya Darshan

राजस्थान: मनगढ़ंत इतिहास अब नहीं पढ़ सकेंगे

इतिहास का अध्ययन किस आधार पर होना चाहिए, उन कहानियों पर जो केवल कल्पना मात्र हैं या उन तथ्यों पर जिन्हें जानने और समझने की आवश्यकता है?

मदन कोथुनिया | July 20, 2019

साल 1987 की बात है. सीकर के देवराला में रूपकंवर नाम की लड़की के पति मालसिंह की मौत हो गई थी. उस की चिता पर राजपूत समाज के लोगों ने मासूम रूपकंवर को बैठा कर जिंदा जला दिया था. उस समय राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबसिंह शेखावत भी राजपूत समाज से थे और उन्होंने बयान दिया था कि मामला धार्मिक है, इसलिए हस्तक्षेप करना उचित नहीं है.

जबकि कानून के मुताबिक मामला धारा 306 का था. बाकायदा गायत्री मंत्र पढ़े गए और पंडितों ने पुष्टि की थी कि रूपकंवर के अंदर ‘सत’ है और वह सती होने के योग्य है. कल्याणसिंह कालवी सहित देशभर के तमाम राजपूत नेता व तकरीबन 5 लाख के करीब लोग देवराला चुनरी की रस्म में पहुंचे और 30 लाख का चंदा इकट्ठा कर के मंदिरनिर्माण शुरू कर दिया.

आज राजपूत समाज के झंडाबरदार सती व जौहर के नाम पर राजस्थान के शिक्षामंत्री को गालियां दे रहे हैं. ये वे ही लोग हैं जो जौहर व सतीप्रथा को अपना गौरवशाली इतिहास बताते हैं. ये वे ही लोग हैं जो 2 दिन पहले सतीप्रथा पर रोक लगवाने में अंगरेजों के मददगार रहे ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति टूटने पर रोनाधोना मचाए हुए थे.

जब साल 1829 में विलियम बेंटिक ने सतीप्रथा पर रोक लगाई थी, तब भी इन का स्वाभिमान हिलोरे मार रहा था, मगर अंगरेजी हुकूमत के आगे इन की एक न चली थी.

इसी तरह साल 1303 में अलाउद्दीन खिलजी से हार के बाद चित्तौड़ के किले में एकसाथ 16 हजार रानियों के जौहर जैसी घटना को स्वाभिमान के साथ जोड़ कर अपना सीना चौड़ा करते हुए घूमते हैं.

मामूली बुद्धि का कोई आदमी इतना तो सोच सकता था कि 16 हजार रानियां वहां हो सकती थीं क्या? अगर आसपास के गांवों की सभी महिलाओं को मिला भी लिया जाए तो एक बौडी को जलाने के लिए कम से कम एक क्विंटल लकड़ी चाहिए थी. क्या इन को पहले से पता था कि 1303 में कोई अलाउद्दीन आएगा और हम हार जाएंगे. इसलिए पेड़ों को काट कर किले में सुखा कर रख लिया जाए? पैट्रोलडीजल तो उस समय थे नहीं.

समाज के स्वयंभू झंडाबरदार जौहर और सती में फर्क कर के कह रहे हैं कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री जौहर का अपमान कर रहे हैं. साल 1829 के बाद चिता पर जलना सती हो गया और जिन के पति युद्ध में मर जाते थे, उन की जिंदा पत्नियों का जलना या जलाना जौहर कहलाता था.

उत्तर प्रदेश के बरेली में बैठे मलिक मोहम्मद जायसी ने एक साहित्य ‘पद्मावत’ लिखा था और उसी को आधार मान लिया गया. इस के अलावा कोई सुबूत नहीं है. गौरतलब है कि इतिहास सुधार का रास्ता खुला रखता है, वह सुबूतों, तथ्यों व तर्कों के आधार पर रचा जाता है. कूपमंडूकता में जितना माथा फोड़ोगे उतनी परतें उघड़ती जाएंगी.

गरमाई सियासत

10वीं जमात की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से वीर सावरकर के अध्याय में बदलाव किया तो उस के बाद विभिन्न कक्षाओं में महाराणा प्रताप के विरोधाभासी अध्याय और अब कक्षा 8वीं की इंग्लिश की पुस्तक के मुख्य पृष्ठ से रानी सती की फोटो को हटा कर चित्तौड़गढ़ के दुर्ग की तसवीर लगाना मनगढ़ंत इतिहास की जगह प्रामाणिक इतिहास लाने के संकेत हैं. पाठ्यक्रम में हुए इन बदलावों के बाद अब जहां राजनीति के गलियारों में एक जंग सी छिड़ गई है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा शिक्षा विभाग द्वारा गठित कमेटी द्वारा किए गए इन बदलावों को सही करार दे रहे हैं. यह बात दूसरी है कि मोदी के दोबारा जीतने पर यह ठीक करने का काम रुक जाए और छद्म इतिहास फिर लिखा जाने लगे.

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के साथ ही भाजपा सरकार द्वारा पाठ्यक्रम में किए बदलाव को फिर से बदलने के संकेत दिए थे और उस के लिए एक 4 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था. कमेटी की सिफारिशों के आधार पर पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिए गए हैं. वहीं, इन बदलावों के बाद शिक्षा के राजनीतिकरण के आरोप भी लगने लगे हैं. शिक्षा मंत्री जहां इन बदलावों को सही करार दे रहे हैं तो वहीं भाजपा इस पूरे बदलाव को राजनीति से प्रेरित बता रही है.

सावरकर के इतिहास में बदलाव को ले कर पूर्व शिक्षा मंत्री व भाजपा नेता वासुदेव देवनानी का कहना है कि वीर सावरकर ऐसे पहले क्रांतिकारी थे जिन्हें 2 बार उम्रकैद की सजा हुई. इस के साथ ही, कई क्रांतिकारियों के आदर्श रहे वीर सावरकर. ऐसे में कांग्रेस सरकार क्रांतिकारियों का अपमान कर रही है. वहीं, वर्तमान शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि इतिहास में दर्ज तथ्यों के आधार पर बदलाव किया गया है. सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के सामने 4 बार दया याचनाएं लगाई थीं और ऐसा ही किताब में भी लिखा गया है.

इस के साथ ही पद्मिनी के इतिहास के साथ नई सरकार ने छेड़छाड़ की है. 8वीं की पुस्तक के मुख्य पृष्ठ से पद्मिनी के जौहर की तसवीर को हटा कर उस की जगह चित्तौड़गढ़ के दुर्ग की फोटो लगाई गई है, जिस पर शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि हमारे समाज में सती होने को गलत माना गया है और बरसों से हम एक गलत मैसेज दे रहे हैं, इसीलिए इस में बदलाव किया गया है, ताकि हमारी बहनबेटियों को सही शिक्षा मिल सके.

बहरहाल, कांग्रेस सरकार ने 6 पुस्तकों में बदलाव के लिए कमेटी बनाई थी और उस की सिफारिशों के बाद बदलाव सामने आए हैं. देखना है ये कितने दिन चलते हैं.

तथाकथित देशभक्त वीर सावरकर को पिछली भाजपा सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया था. अंगरेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आने वाले को हम अपने बच्चों को इतिहास का हीरो बताएंगे, तो लाखों लोग जिन्होंने देश के लिए कुरबानिया दी थीं क्या यह उन का अपमान नहीं होगा? सच तो यह है कि सावरकर उस संगठन के संस्थापकों में से हैं, जिस संगठन को गांधी की हत्या का जिम्मेदार माना जाता है और इस संगठन के किसी एक भी सदस्य ने देश के लिए कुरबानी नहीं दी है.

वैज्ञानिक सोच वाली शिक्षा

पाठ्यक्रम में बदलाव के मसले पर सीनियर शिक्षाविद शिवनारायण ईनाणियां का कहना है, ‘‘ये वीर सावरकर व पंडित दीनदयाल कौन हैं? देश की आजादी व देशनिर्माण में इन का क्या योगदान है? एकात्मवाद की रचना की यह अलग बात है. यह धर्म का मसला है. इस को यज्ञशालाओं या गुरुकुलों में पढ़ाओ, कौन मना कर रहा है? यह धर्मनिरपेक्ष देश की शिक्षा पद्धति है और देश का संविधान कहता है कि वैज्ञानिक सोच को पैदा करने वाली शिक्षा दी जाए. जितने भी धार्मिक चैप्टर हों, चाहे किसी भी धर्म के हों, भारतीय शिक्षा पद्धति से बाहर निकाल दिए जाने चाहिए.

‘‘प्राइमरी क्लास में बच्चे पढ़ रहे हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी. अगर जीते

तो इतने साल हमें क्यों पढ़ाया कि, ‘वनबिलावल घास की रोटी ले भाग्यो, नन्हों सो अमरियो चीख पड़यो, राणा रो सोयोडो दुख जाग पड़यो.’

‘‘यह सब पढ़ कर जब बच्चा 12वीं जमात में आएगा तो पढ़ेगा, महाराणा प्रताप हार गए थे. बच्चों को इतिहास पढ़ा रहे हो या उन के साथ खेल खेल रहे हो? सब को पता है हल्दीघाटी का युद्ध मानसिंह व राणा प्रताप के बीच हुआ था और ढाई घंटे की लड़ाई में महाराणा प्रताप को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा था. अगर नहीं भागे और घोड़ा नाले के ऊपर से कूदते हुए घायल हो कर नहीं मरा था तो उस की मूर्ति वहां क्यों बनाई? राणा प्रताप का भाई मानसिंह की तरफ था. राणा प्रताप अगर इतने स्वाभिमान व मानसम्मान वाले थे, तो बाकी राजपूताने के राजाओं ने उन का सहयोग क्यों नहीं किया?’’

शिक्षा महकमे के एक सेवानिवृत्त अफसर का कहना है, ‘‘शाही टुकड़ों पर पलने वाले इतिहासकारों ने इतिहास के साथ बहुत खिलवाड़ किया था, मगर अब सुधार होना चाहिए. कुरीतियों को अस्मिता व स्वाभिमान बता कर देश के बच्चों का भविष्य खराब नहीं करना चाहिए. इतिहास की गलतियों से सबक ले कर आगे बढ़ने का समय है. पिछले ब्राह्मण मंत्री ने आप के लिए अगले 5 वर्षों तक सड़कों पर खड़े करने की नींव रख दी थी. समझना होगा और भूल सुधारते हुए इतिहास दुरुस्त करने में शिक्षा मंत्री का समर्थन करना होगा.

‘‘राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्री की पहल का सभी को सम्मान करना चाहिए जिन्होंने इतिहास सुधार की हिम्मत की है व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है. राजस्थान के जागरूक व बुद्धिजीवी लोगों को शिक्षा मंत्री का समर्थन करना चाहिए.’’

इस मसले पर राज्य के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है, ‘‘पिछली भाजपा सरकार ने संघ की सोच के मद्देनजर इतिहास की पुस्तकों में मनगढ़ंत अध्याय जोड़ दिए थे. ऐसेऐसे अध्याय जोड़े गए, जिन से बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा होने के बजाय उन का कोमल मन अंधविश्वास और पाखंड की ओर जा रहा था. साथ ही, राजीव गांधी पाठशालाओं को बंद करना भी पिछली सरकार की शिक्षा के प्रति बेरुखी को दर्शाता है. लेकिन अब शिक्षा नीतियों की गहन समीक्षा कर बड़े बदलाव किए जाएंगे.’’

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