Satya Darshan

जब महान वैज्ञानिक डॉ.जयन्त विष्णु नार्लीकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से कहा..

जन्म दिवस विशेष | जुलाई 19, 2019

स्वतन्त्रता पूर्व भारत के जगदीशचन्द्र बोस, प्रफुल्लचन्द्र राय, वेंकट रामन, सत्येन्द्रनाथ बोस, मेघनाथ साहा, नीलरत्न धर आदि वैज्ञानिकों की सशक्त श्रंखला ने आधुनिक विश्व में भारतीय विज्ञान का परचम लहराया था। विज्ञान क्षेत्र में स्वतन्त्र भारत का नाम रोशन करने वालों में एक प्रमुख नाम विश्व प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक जयन्त विष्णु नार्लीकर है। 

जयन्त नार्लीकर ने फ्रैड हॉयल के निर्देशन में सृष्टि की उत्पति के बिग-बैंग सिद्धान्त में कमियां बताते हुए वैकल्पिक सिद्धान्त प्रस्तुत कर प्रसिद्धि पाई है। वैज्ञानिक द्वय का मानना है कि पृथ्वी पर प्रथम जीवन किसी घूमकेतु से आया था। अभी भी पृथ्वी पर बाह्य अन्तरिक्ष से सूक्ष्म जीवों की बौछार होती रहती है। नार्लीकर इस विषय में नए प्रमाण जुटाने की परियोनाओं पर कार्य करते रहे।

प्रारम्भिक जीवन

जयन्त विष्णु नार्लीकर का जन्म महाराष्ट्र प्रान्त के कोल्हापुर शहर में 19 जुलाई 1938 को हुआ था। इनके पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर थे। बाद में राजस्थान लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष भी रहे। जयन्त की माता सुमती नार्लीकर संस्कृत की विद्वान थी। प्रारंभिक शिक्षा कोल्हापुर में करने बाद हाई स्कूल व स्नातक तक की इनकी शिक्षा बनारस में हुई। बी.एससी. करने बाद जयन्त केम्ब्रिज चले गए। वहाँ परीक्षा में उच्च अंक पाने के कई कीर्तिमान बनाते हुए गणित में बी.ए. तथा बाद में खगोलीय भौतिकी में एम.ए. उपाधि प्राप्त की। इस दौरान कई पुरस्कार इन्हे प्रदान किए गए। 

केम्ब्रिज में फ्रैड हॉयल के निर्देशन में अनुसंधान कार्य प्रारम्भ किया। पी.एचडी हेतु प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में बताया कि गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक स्थिरांक का मान स्थिर नहीं होकर सृष्टि में उपस्थित पदार्थ की मात्रा पर निर्भर करता है। उनके इस सिद्धान्त ने सृष्टि की उत्पत्ति के बिगबैग सिद्धान्त में संशोधन कर विश्व विज्ञान को एक नई सोच दी। नार्लीकर के कार्य को हॉयल-नार्लीकर सिद्धान्त के नाम से जाना है। इस कार्य पर इन्हें केम्ब्रिज का सर्वाधिक सम्मानित एडम पुरस्कार प्रदान किया गया। 

30 वर्ष की छोटी उम्र में उस बड़ी उपलब्धि को प्राप्तकर नार्लीकर विश्व प्रसिद्ध होगए। भारत का नाम भी विज्ञान के नवीनतम क्षेत्र खगोलीय भौतिकी में विश्व पटल पर आगया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नार्लीकर के पूर्व भारत के डॉ.होमी भाभा, डॉ.चन्द्रशेखर व डॉ.बी.एस.हजूरबाजार भी एडम पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। डॉ.बी.एस.हजूरबाजार रिश्ते में नार्लीकर के मामा लगते हैं। अध्ययन पूरा होने के बाद भी नार्लीकर बहुत समय तक ब्रिटेन में ही रहे। फ्रैड हॉयल के केम्ब्रिज में सैद्धान्तिक खगोलशास्त्र संस्थान की स्थापना करने पर नार्लीकर उसके संस्थापक सदस्य बनकर अनुसंधान करने लगे थे। 

लगभग 15 वर्ष विदेश में पढ़ने, पढ़ाने व अनुसंधान करने के बाद 1972 में डॉ.जयन्त विष्णु नार्लीकर भारत आकर टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान में सैद्धान्तिक खगोलशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य करने लगे थे। लगभग 16 वर्ष यहाँ कार्य करने के बाद नार्लीकर पूना आगए। जयन्त विष्णु नार्लीकर का विवाह गणित की अनुसंधानकर्ता प्रोफेसर मंगला रजवाडे से हुआ। उनसे तीन पुत्रियां गीता, गिरिजा व लीलावती है।

भारतीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पूना में खगोलशास्त्र एवं खगोल-भौतिकी अन्तरविश्वविद्यालय केन्द्र की स्थापना की गई तो नार्लीकर को उसका संस्थापक निदेशक बनाया गया। इस संस्थान में रहते हुए ही नार्लीकर ने यूनेस्को द्वारा प्रायोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय अनुंसधान दल का नेतृत्व किया था। दल ने चार वर्ष तक पृथ्वी की सतह से 41 किलोमीटर उँचाई तक से वायु के नमूने एकत्रित कर उनमें उपस्थित सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया था। दल ने निष्कर्ष निकाला कि पाएं गए सूक्ष्म जीवों में से कुछ पृथ्वी जनित होसकते हैं मगर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अभी भी बाह्य अन्तरीक्ष से सूक्ष्म जीवों की बौछार होती रहती है। 

यहाँ यह जानना भी उचित होगा कि प्रोफेसर फ्रैड हॉयल का मानना है कि धूमकेतुओं में वाइरस जैसे सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती रहती है। धूमकेतू जब पृथ्वी के समीप आते हैं तो इन सूक्ष्म जीवों को पृथ्वी के वायुमण्डल में छोड़ देते है। प्रोफेसर फ्रैड हॉयल ने प्रमाण सहित बताया कि ये सूक्ष्मजीव कई विश्वस्तरीय महामारी का कारण बनते रहे हैं। हॉयल ने यह भी प्रतिपादित करने का भी प्रयास किया है कि पृथ्वी पर प्रथम जीव भी इसी प्रकार आया होगा। पृथ्वी पर पहला जीव कैसे पैदा हुआ, इस प्रश्न का सर्वमान्य उत्तर अभी आना है। ऐसे में नार्लीकर के ये प्रयास बहुत महत्व रखते हैं।

उच्च कोटी के लेखक

वैज्ञानिक होने के साथ डॉ. जयन्त विष्णु नार्लीकर उच्च कोटी के लेखक भी हैं। नार्लीकर ने विज्ञान के विद्यार्थियों के साथ ही आम आदमी के लिए भी बहुत साहित्य रचा है। नार्लीकर के साहित्य का अनुवाद भी हुआ है। नार्लीकर स्वयं भी अंग्रेजी, हिन्दी व मराठी तीनों भाषाओं में अधिकार पूर्वक लिखते हैं। खगोलीय भौतिकशास्त्र के विश्व स्तरीय प्रवक्ता होने के कारण इनका अधिकांश साहित्य इस विषय पर ही है। सृष्टि की संरचना व सृष्टि की कार्य प्रणाली को लेकर आपकी कई पुस्तकें तथा शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं। इसी विषय पर सामान्य लोगों के लिए पुस्तक व लेख आदि रचनाएं विश्व स्तर पर भी प्रकाशित होती रही हैं। 

कहते है कि इनका पहला लेख ब्रिटेन की प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘डिस्कवरी’ में प्रकाशित हुआ था तो लेख को ब्रिटेन  के लोगों ने बहुत सराहा। अन्य प्रसिद्ध पत्रिका ‘न्यू साइन्टिस्ट’ ने अनुमति लेकर उस लेख को पुनः प्रकाशित किया तथा आगे भी रचनाएं भेजने का अनुरोध किया था।

डॉ. जयन्त विष्णु नार्लीकर का एक प्रबल बिन्दु उनका लोकप्रिय विज्ञान कथाकार होना है। विज्ञानकथा साहित्य की एक विधा है जिसमें साहित्यकार कहानी के माध्यम विज्ञान की प्रगति व उसके मानव जीवन पर प्रभाव को प्रस्तुत करता है। इनकी रचनाओं के पात्र सामान्यतः भारतीय होते हैं इस कारण भारतीय समाज में वैज्ञानिक जागृति लाने में बहुत मदद मिलती है। 

डॉ. नार्लीकर ने अंग्रेजी, हिन्दी व मराठी तीनों भाषाओं में बहुत मनोरजंक तथा ज्ञानवर्द्धक विज्ञानकथाएं लिखकर ख्याति अर्जित की है। नार्लीकर की विज्ञान कहानिया हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इसी विधा में लिखा उपन्यास ‘धूमकेतु’ राजपाल एण्ड सन्स से प्रकाशित हुआ है। इनका एक अन्य विज्ञान उपन्यास साप्ताहिक हिन्दुस्तान में धाराविक रूप से प्रकाशित हुआ था। बाल फिल्म सोसाइटी ने इनके उपन्यास पर धूमकेतु नाम से एक 2 घन्टे की फीचर फिल्म बनाई है। 

विज्ञान प्रसार हेतु उल्लेखनीय कार्य करने के कारण डॉ. जयन्त विष्णु नार्लीकर को भारतीय विज्ञान अकादमी ने इंदिरा गांधी व यूनेस्को ने कलिंगा पुरस्कार देकर सम्मानित किया है। रेडियों व दूरदर्शन पर भी डॉ.नार्लीकर की वार्ताएं तथा बच्चों के लिए विज्ञान रुचिकर कार्यक्रम प्रसारित होते रहे हैं। दूरदर्शन पर बहुत लोकप्रिय हुए ज्ञानविज्ञान के धाराविक सुरभि में लोगों की विज्ञान जिज्ञासाओं को आपने सहज ढ़ग से शान्त करते दिखाई देते हैं। दूरदर्शन पर भी नार्लीकर अंग्रेजी, हिन्दी व मराठी तीनों भाषाओं का उपयोग करते हैं। कहते हैं कि विश्व प्रसिद्ध विज्ञान लेखक कार्ल सांगा के अंग्रेजी धाराविक ‘दी कॉमेट’ को हिन्दी कोमेन्ट्री के साथ लोगों को दिखाया गया तो उन्हें बहुत पसन्द आया। इससे यह तथ्य सामने आया कि भारत के लोग भी विज्ञान धाराविकों में रुचि रखते हैं। 

डॉ.नार्लीकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से कहा कि आकाश की जानकारी लेकर धारावाहिक बनाया जाये। प्रस्ताव स्वीकार कर उसकी जिम्मेदारी डॉ.नार्लीकर को ही सौंप दी गई। तब ब्रह्माण्ड नाम से बना धारावाहिक 17 कड़ियो में प्रसारित हुआ। धारावाहिक में बच्चों की भूमिका सम्मिलित होने के कारण इसे बहुत पसन्द किया गया और यह देश करोड़ों लोगों तक पहुँचा।

विज्ञान शिक्षण रूचि

विद्यालयों में विज्ञान शिक्षण को प्रभावी बनाने में डॉ. नार्लीकर रुचि लेते रहे हैं। बच्चों से पोस्टकार्ड पर बच्चों द्वारा लिखे प्रश्नों के उत्तर डॉ. नार्लीकर के हस्ताक्षर सहित देने से कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय रहा था। बाद में इन प्रश्नोत्तर को पुस्तक रूप में भी छापा भी गया। एक वक्ता के रूप में भी नार्लीकर बहुत सफल रहे हैं। आज भी  महाराष्ट्र व देश के अन्य भागों से उन्हें वार्ता हेतु निमन्त्रित किया जाता है। कई बार तो इनके श्रोताओं की संख्या हजारों में होती है। वक्ता के रूप में डॉ. जयन्त विष्णु नार्लीकर ब्रिटेन में ही प्रसिद्ध होगए थे। 

ब्रिटेन में इन्हे विभिन्न महाविद्यालयों में बोलने के लिए आमन्त्रित किया जाने लगा था। राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद द्वारा आपकी सेवाएं गणित व विज्ञान की पाठ्यचर्या व पुस्तक लेखन में मार्गदर्शन हेतु ली जाती रही है। अपने विषय के नवीनतम ज्ञान से देशवासियों व अन्य इच्छुक लोगों को परिचित कराते रहने हेतु नार्लीकर के निर्देशन में खगोल पत्रिका का प्रकाशन किया जारहा है।

एक वैज्ञानिक के रूप में डॉ. जयन्त विष्णु नार्लीकर को देश व विदेश में पूर्ण मान्यता प्राप्त हुई है। देश की तीनों ही विज्ञान अकादमियों ने डॉ. नार्लीकर को सदस्यता प्रदान कर रखी है। तीसरी दुनिया की विज्ञान अकादमी के भी आप सदस्य हैं। रॉयल एस्ट्रानॉमिकल सोसाइटी के सदस्य तो नारर्लीकर 21 वर्ष की आयु पूर्ण होने के पूर्व ही बन गए थे। अन्तर्राष्ट्रीय खगोलिकी संघ की कॉस्मोलोजी परिषद के भी डॉ.नार्लीकर अध्यक्ष रहे हैं। 

भारत सरकार ने डॉ.नारर्लीकर को 1995 पद्मभूषण तथा 9 वर्ष बाद पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। महाराष्ट्र सरकार ने 2010 में डॉ. जयन्त नार्लीकर को अपने सर्वोच्च सम्मान महाराष्ट्र भूषण से सम्मानित किया था। डॉ. जयन्त नार्लीकर खगोलविज्ञान के विद्वान हैं।  फलित ज्योतिष्यशास्त्र में विश्वास नहीं करते। उनका स्पष्ट कहना है कि सितारे किसी का भविष्य नहीं बताते। वैज्ञानिक के साथ साथ विज्ञान प्रसारक के रूप में लोकप्रिय होने के डॉ.जयन्त नार्लीकर जैसे व्यक्ति कम ही मिलते हैं। आप भी नार्लीकर की इस बात से सहमत होगें कि उस विज्ञान का कोई महत्व नहीं जो आम लोगों तक नहीं पहुँचे।

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