Satya Darshan

सुलभ नहीं सरकारी इलाज

शैलेंद्र सिंह | जुलाई 18, 2019

हमारे देश में बीमारियों की भरमार है. सरकारी हों या प्राइवेट अस्पताल सब रोगियों से भरे पड़े हैं. तमाम दावों और योजनाओं के बाद भी सरकार मरीजों को सुव्यवस्थित और सस्ता इलाज नहीं दे पा रही है. पैसे वाले तो निजी अस्पतालों  में अपना इलाज करा लेते हैं, पर गरीब जनता सरकारी अस्पतालों में एक अदद बिस्तर के लिए तरस जाती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का बहुत ही मशहूर अस्पताल लखनऊ मैडिकल कालेज के नाम से जाना जाता है. केवल लखनऊ ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश से मरीज यहां आते हैं. मरीज को बेहतर इलाज मिले, इस के लिए यहां पर ट्रौमा सैंटर भी है. यहां इमरजैंसी में मरीजों को भरती कराने के लिए लाया जाता है. कुशीनगर के रहने वाले प्रभु राजभर अपने बेटे बडे़लाल को ले कर आए थे. प्रभु राजभर पिछड़ी जाति के किसान थे. बेटे के इलाज में काफी पैसा पहले ही खर्च हो चुका था.

बडे़लाल का 3 महीने पहले ऐक्सिडैंट हुआ था. उसे ट्रौमा सैंटर में भरती कराया गया था. न्यूरो सर्जरी विभाग में उस का इलाज चला. 3 महीने से वह कोमा में है. ट्रौमा सैंटर में औपरेशन करने के बाद डाक्टरों ने उस की छुट्टी कर दी. डाक्टरों ने कहा कि धीरेधीरे उस को होश आएगा. घरवाले उसे ले कर वापस चले गए. घर पहुंचने के बाद बडे़लाल की तबीयत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी. तब घरवाले उसे वापस ले कर मैडिकल कालेज के ट्रौमा सैंटर में आ गए.

रविवार, 16 जून की दोपहर करीब 2 बजे का समय था. प्रभु राजभर अपने बेटे को कंधे का सहारा दे कर भरीदोपहरी में किसी तरह से ट्रौमासैंटर के गेट तक पहुंचे. गेट पर उन को रोक दिया गया. वहां मौजूद जूनियर डाक्टर ने कहा, ‘‘यहां आज मरीज नहीं देखे जा रहे. कल ओपीडी खुलेगी, उस में दिखाना.’’ प्रभु राजभर डाक्टर के सामने हाथ जोड़ कर रोनेगिड़गिड़ाने लगे.

प्रभु राजभर से अपने बेटे के शरीर को संभाला नहीं जा रहा था. उन्होंने बेटे को ट्रौमा सैंटर में ही गाडि़यों की पार्किंग के पास खाली पड़ी थोड़ी सी जगह में खुले में ही लिटा दिया. इस के बाद वे जूनियर डाक्टर से हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘डाक्टर साहब, एक बार मेरे बेटे को देख लीजिए, कल हम इस को ओपीडी में दिखा लेंगे. आप की बहुत मेहरबानी होगी.’’ जूनियर डाक्टर ने प्रभु राजभर की बात नहीं सुनी और वह दूसरे तीमारदार को भी बताने लगा कि आज मरीज यहां नहीं देखे जाएंगे.

ट्रौमा सैंटर की स्थापना इस कारण हुई थी कि यहां पर हर वक्त मरीज को इलाज मिल सके. आज यहां प्रभु राजभर जैसे तमाम लोग अपने मरीजों को ले कर भटक रहे थे. ये लोग हर डाक्टर से गुहार लगा चुके थे. प्रभु राजभर के सामने सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि वे अकेले ही थे, इन्हें ही अपने बेटे की देखभाल करनी थी और डाक्टर से भी संपर्क करना था. कुछ ही दिनों पहले उन्होंने यहां बेटे के इलाज में लंबा समय गुजारा था. ऐसे में उन्हें यहां के रंगढंग समझ में आ चुके थे.

प्रभु राजभर के बेटे को हर 2-2 घंटे में नाक के जरिए पानी देना पड़ता था और 4-4 घंटे में उस को दाल, फल और सब्जियों का सूप देना पड़ता था. अस्पताल में भरती हो जाता तो कुछ राहत मिल जाती. कम से कम कमरे में छांव, पंखे की हवा और बिस्तर मिल जाता. सड़क पर यह सबकुछ नहीं था.

प्रभु राजभर इधरउधर से खाने का इंतजाम कर के बेटे की सेवा कर रहे थे. धूप और जून माह की गरमीपसीने में डूबे बापबेटे सही माने में मौत का इंतजार करते नजर आ रहे थे कि मौत आए और इस नर्क से छुटकारा दिलाए.

शाम के 4 बज चुके थे. प्रभु राजभर डाक्टरों से गिड़गिड़ा कर हार चुके थे. अब वे थक कर बेटे के पास ही बैठ गए. अब तक धूप थोड़ी दूर जा चुकी थी. टीनशेड की छांव अब राहत देने लगी थी. प्रभु राजभर बेटे को पानी पिलाने के बाद खुद भी वहीं बैठ कर सोमवार को ओपीडी खुलने का इंतजार करने लगे.

ऐसे हालात को देखने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं होती है. लखनऊ के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ओपीडी का समय 8 बजे सुबह से होता है. दूरदूर से आने वाले लोग सुबह 4 से 5 बजे ही आ कर परचा बनवाने की लाइन में लग जाते हैं. परचा बनवाने का काउंटर खुलते ही लंबी लाइन लगती दिख जाती है.

कईकई बार तो भीड़ में परचा बनवाते समय ही मरीज दम तोड़ देता है. मरीज को अस्पताल दिखाने लाने के लिए कम से कम 2 लोगों का साथ होना जरूरी होता है. आज के समय में मरीज के साथ तीमारदारों की कमी होती है. इस वजह से ज्यादातर लोग प्राइवेट अस्पताल ज्यादा पसंद करते हैं.

लखनऊ के ही गोमतीनगर स्थित मेयो अस्पताल में सोमवार की सुबह 9 बजे गोरखपुर के रहने वाले प्रवीण अपनी मां के साथ आए. मां को पेट में दर्द था. प्रवीण को लोगों ने गोरखपुर के अस्पताल में मां को दिखाने के लिए कहा. प्रवीण को गोरखपुर के अस्पताल का हाल पता था. वे बोले, ‘‘मैं अपनी मां का दर्द नहीं देख सकता. मैं अकेला मां की देखभाल करने वाला हूं, ऐसे में मैं सरकारी अस्पताल में डाक्टरों के चक्कर नहीं लगा सकता हूं. मैं लखनऊ के किसी प्राइवेट अस्पताल में मां का इलाज कराऊंगा.’’ प्रवीण गोरखपुर से ही एंबुलैंस ले कर लखनऊ आए और सीधे मेयो अस्पताल पहुंचे.

एंबुलैंस के रुकते ही अस्पताल के गेट पर ही उन को एक व्हीलचेयर और एक अटेंडैंट मिल गया. 10 मिनट से भी कम समय में उन का परचा बन गया और फीस जमा हो गई. प्रवीण की मां का रजिस्ट्रेशन हो गया. प्रवीण मां को ले कर डाक्टर के पास गए तो उन्होंने 10 मिनट में ही उन को देख कर उन का अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कहा.

अब प्रवीण बस थोड़ाबहुत काम देख रहे थे. जांच से ले कर औपरेशन तक का सारा काम प्रवीण ने अकेले मैनेज कर लिया. यहां प्रवीण को जांच, कमरे और दवाओं के लिए पैसा भले ही जमा कराना पड़ा हो पर वे मां के चेहरे पर मुसकान लाने में सफल रहे. प्रवीण को यह नहीं लगा कि इलाज कितना कठिन है. उन के पैसे भले ही खर्च हुए पर उस को सुकून था कि मां का अच्छा इलाज वे करा सके.

मेयो जैसे प्राइवेट अस्पताल हर शहर में मरीजों को इलाज देने में सफल हैं. इलाज के साथ ही साथ वे मरीज को खुशी भी देते हैं. यही वजह है कि ये अस्पताल तेजी से हर शहर में बढ़ते जा रहे हैं. सरकार किसी भी शहर में सरकारी अस्पतालों की दशा नहीं बदल पा रही है. अस्पताल मरीज के लिए सजा बन गए हैं. जिन लोगों के पास पैसा और भागदौड़ करने वाले लोग नहीं हैं उन की हालत और भी अधिक बदहाल है.

मुद्दा नहीं बनतीं स्वास्थ्य सेवाएं

किसी भी चुनाव में खराब स्वास्थ्य व्यवस्था, नकली अस्पताल, सरकारी अस्पतालों में मरते मरीज चुनाव का मुद्दा नहीं बनते. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने वालों की संख्या बेहद कम है और इन स्वास्थ्य सेवाओं के लाभ लेने का तरीका बेहद उलझाने वाला है. इस का खमियाजा मरीज को जान दे कर चुकाना पड़ता है.

केंद्रीय स्वास्थ्य अन्वेषण ब्यूरो के 2016 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में जनता कुपोषण, स्वच्छता और संक्रामक रोगों की शिकार हो रही है. पर्यावरण, प्रदूषण, खराब जीवनशैली, शराब का सेवन, धूम्रपान, फैट बढ़ाने वाले भोजन और ऐक्सरसाइज न करने से मधुमेह, हृदयसंबंधी दिक्कतों एवं कैंसर जैसी बीमारियों की तादाद बढ़ी है. शहरी और संपन्न घरों की बीमारियां अब गांव में भी फैल गई हैं. भारत में संक्रामक बीमारियां जैसे तपेदिक, मलेरिया, डेंगू बुखार, चिकनगुनिया, हैजा और डायरिया बढ़ गए हैं.

भारत में बीमारियों से होने वाली कुल मौतों में एकचौथाई मौतें डायरिया, सांस संबंधी दिक्कत, तपेदिक और मलेरिया के कारण होती हैं. इस के अतिरिक्त कई नई बीमारियों, जैसे एड्स आदि के होने का खतरा हमेशा बना रहता है. ग्रामीण और शहरी लोगों की समस्या अलग है.

जहां शहरों में खराब जीवनशैली के चलते हृदय, यकृत व गुरदा रोग असमय ही युवावर्ग को भी बेहद तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियों का प्रभाव कायम है.

भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा बीमारियों से जूझता है. अस्पतालों में लंबी कतारों के साथ सुविधाओं का अभाव है. देश में अस्पतालों और डाक्टरों की उपलब्धता जनसंख्या के हिसाब से कम है और सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं, चिकित्सकों, कमरों, दवाइयों, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ व दूसरी सुविधाओं की कमी है.

नहीं हैं जरूरी सुविधाएं

अस्पतालों की संख्या बढ़ने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. 65 फीसदी जनता को अपनी बीमारी का खर्च खुद उठाना पड़ता है. इस की वजह से भी गरीबी बढ़ रही है. अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं न होने से बीमारी से मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है.

भारत में 7,54,724 बिस्तरों वाले कुल 19,653 सरकारी अस्पताल हैं. इन में ग्रामीण क्षेत्र में 15,818 और शहरी क्षेत्र में 3,835 अस्पताल हैं. यहां डाक्टर, दूसरे स्टाफ  और सुविधाओं का अभाव है.

गांवों में 1,53,655 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 25,308 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 5,396 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. इस के बाद भी गांव के लोगों को छोटी से छोटी बीमारी के इलाज के लिए शहर के अस्पतालों में जाना पड़ता है.

यहां भी सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था के कारण निजी अस्पताल में लोगों को महंगी स्वास्थ्य सेवाओं को लेना पड़ता है.

सरकारी योजनाओं में उन लोगों को ही सुविधाएं दी जा रही हैं जो बीपीएल श्रेणी में आते हैं यानी जिन की आय 72 हजार रुपए सालाना से ज्यादा नहीं होगी यानी करीब 6 हजार रुपए प्रतिमाह. जबकि 10 हजार रुपए प्रति महीने कमाने वाला भी अपनी बीमारी का इलाज कराने में पूरी तरह से असमर्थ है.

भारत सरकार अपनी आयुष्मान योजना का जोरशोर से प्रचार कर रही है. इस के बाद भी अस्पतालों में भटक रहे गरीब बताते हैं कि इस तरह की योजनाओं का लाभ बहुत कम लोगों तक ही पहुंचा है. ऐसे में जरूरी है कि सभी को बेहतर सरकारी इलाज मिले और इस दिशा में काम हो. यह तभी संभव है जब सरकारी अस्पताल पूरी तरह से अपनी क्षमता के हिसाब से काम करें. केवल अस्पताल खोलने और दिखावे के लिए स्वास्थ्य योजनाओं की शुरुआत करने भर से जनता का सही इलाज संभव नहीं हो सकता.

अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ और मशीनों का होना जरूरी होता है. सरकारी अस्पतालों में मशीनें तो खरीद भी ली जाती हैं क्योंकि खरीद में ऊपरी कमाई होती है पर पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ  न होने से ये मशीनें धूल खा रही होती हैं और जांच के लिए मरीज इधरउधर धक्के खा रहे होते हैं. 2 वर्षों पहले ही उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के अस्पताल में औक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत का मामला सुर्खियों में था.

अभी भी ऐसे हालात हर सरकारी अस्पताल में बने हुए हैं. सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की बुरी हालत का लाभ प्राइवेट अस्पताल उठा रहे हैं जो प्रशिक्षित न होने के बाद भी विशेषज्ञ होने का दावा कर मरीजों की जान जोखिम में डाल रहे हैं. सब से मजेदार बात यह है कि चुनावों में खराब इलाज की व्यवस्था कभी मुद्दा नहीं बनती है. चुनावों में धर्म, जाति और देशभक्ति के मामले छाए रहते हैं.

सुलभ नहीं सरकारी इलाज

कमोबेश देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के हालात सब से अधिक खराब हैं. सरकार जनता को खुश करने के लिए बडे़बडे़ अस्पताल खोलने के नाम पर बड़ीबड़ी बिल्डिंग्स बना रही है. एम्स और पीजीआई जैसे अस्पताल खोलने की होड़ सी लगी है. ये बडे़ अस्पताल मरीजों को जरूरी सुविधाएं नहीं दे पा रहे जिन की वजह से मरीज प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर होते हैं. प्राइवेट में भी 2 तरह के अस्पताल हो गए हैं. अच्छे प्राइवेट अस्पताल बहुत मंहगे हैं वहां इलाज कराना सामान्य मरीज के बस का नहीं होता है. प्राइवेट अस्पताल के नाम पर कुछ ऐसे अस्पताल भी खुले हैं जो स्पैशलिटी का लेबल लगा कर 2 कमरों के अस्पताल में हर इलाज का दावा करते हैं. ऐसे अस्पताल मरीजों की जान से खेल रहे हैं.

प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को लाने के लिए भी कमीशन लैवल पर काम किया जाता है. सरकारी अस्पतालों में ऐसे तमाम दलाल घूमते रहते हैं जो वहां आए मरीज को यह बताते हैं कि किस अस्पताल में अच्छा इलाज हो सकता है. इन में सरकारी एंबुलैंस चालकों की मिलीभगत रहती है.

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मल्लांवा के रहने वाले 26 साल के शमीम का इलाज वहां चल रहा था. उस की तबीयत खराब हुई तो डाक्टरों ने लखनऊ के सरकारी अस्पताल ले जाने के लिए कहा. शमीम के घरवाले उसे एंबुलैंस से ले कर चले तो एंबुलैंस चालक ने उन को समझाबुझा कर मलिहाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करा दिया.

वहां 5 दिनों में इलाज के नाम पर 30 हजार रुपए लिए गए. इस के बाद मरीज को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल भेज दिया गया. समय पर सही इलाज न मिलने से मरीज की मौत हो गई.

निजी अस्पतालों का बढ़ता दायरा

भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बंगलादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है. भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है. भारत की गणना स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को सब से कम खर्च करने वाले देशों में की जाती है.

भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है. दक्षेस देशों में अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है. भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है. यहां शायद सरकार पूजापाठ और भभूत को ही इलाज मान कर चलती है.

2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 48 प्रतिशत रहा.

परिवार नियोजन का बजट वर्ष 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा.

सरकार की इसी कमी का फायदा निजी चिकित्सा संस्थान उठा रहे हैं. भारत में बड़ी तेज गति से स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हुआ है. आजादी के समय देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़ कर 93 प्रतिशत हो गई है. वहीं, स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है.

इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मात्र मुनाफा बटोरना है. दवा निर्माता कंपनियों के साथ सांठगांठ कर के महंगी से महंगी व कम लाभकारी दवा दे कर मरीजों से पैसे ऐंठना इन का रोज का काम है.

नक्कालों की भरमार

लखनऊ की कुरसी रोड पर डाक्टर संतोष का अस्पताल चलता था. बाबुरिया गांव के रहने वाले विमलेश ने 6 माह पहले यानी जनवरी 2019 में अपनी पत्नी सुमन को अस्पताल में भरती कराया था. अस्पताल के मालिक डाक्टर संतोष ने सिजेरियन औपरेशन से सुमन की डिलीवरी कराई और उस से बेटी का जन्म हुआ.

औपरेशन के बाद से ही सुमन के पेट में दर्द रहता था. विमलेश ने जब सुमन के पेट का अल्ट्रासाउंड कराया तो पता चला कि पेट में कौटन का टुकडा औपरेशन के समय छूट गया था. यह जानकारी होने पर विमलेश ने डाक्टर संतोष से संपर्क किया.

अपने को फंसता देख डाक्टर संतोष ने कहा, ‘‘दोबारा सर्जरी कर के उस टुकड़े को निकाल देंगे. इस औपरेशन की कोई फीस भी नहीं लेंगे.’’

11 अप्रैल, 2019 को सुबह विमलेश ने अपनी पत्नी सुमन को अस्पताल में भरती कराया. 13 अप्रैल की रात को डाक्टर ने बताया कि औपरेशन कर के कौटन को बाहर निकाल दिया गया है. इस के बाद सुमन के लगी कैथेटर से लगातार मल निकल रहा था. इस के बाद जब विमेलश ने डाक्टर से शिकायत की तो कहा गया कि सुमन की आंत फट गई है और इस को मैडिकल कालेज ले जाइए. मरीज की हालत बिगड़ने पर विमलेश के परिजनों ने पुलिस को सूचना दी. लखनऊ के गुडंबा थाने की पुलिस आई.

पुलिस को आता देख डाक्टर संतोष अस्पताल से भाग गए. वहां काम कर रहे नर्स और वार्डबौय को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. गुडंबा थाने के इंस्पैक्टर रवींद्र नाथ राय ने बताया, ‘‘विमलेश की सूचना पर पुलिस ने अपने स्तर से काम किया है. अब सीएमओ की तरफ  से जैसी तहरीर आएगी वैसे ही काम किया जाएगा.’’ दूसरी तरफ लखनऊ के सीएमओ नरेंद्र अग्रवाल ने कहा, ‘‘मामला जानकारी में है. अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा. आगे पुलिस अपना काम करेगी.’’

यह पहली घटना नहीं है. केवल निजी अस्पतालों में ही नहीं, सरकारी अस्पतालों में भी अकसर ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं. सीतापुर जिले के लहरपुर बहरवा के रहने वाले 45 साल के विश्राम को ब्रेन हैम्रेज हुआ. घरवालों ने उन को सीतापुर जिले के जिला अस्पताल में भरती कराया.

अगले दिन हालत नाजुक होने पर जिला अस्पताल के डाक्टरों ने आगे के इलाज के लिए लखनऊ ले जाने को कहा. विश्राम के परिजन लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल और सिविल अस्पताल गए. दोनों ही अस्पतालों में कोई वैंटिलेटर नहीं मिला. आखिरकार विश्राम की मौत हो गई. विश्राम के भाई बद्री ने कहा कि बलरामपुर अस्पताल में वैंटिलेटर खाली था, इस के बाद भी डाक्टरों ने भरती नहीं किया.

अस्पताल के स्टाफ  ने मरीज के साथ गए लोगों से अभद्रता भी की. इस शिकायत को ले कर तीमारदार अस्पताल के अफसरों के पास भी गए, पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई. इस के बाद तीमारदारों ने विश्राम को ले कर लोहिया अस्पताल की ओर रुख किया. लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही विश्राम की सांसें थम गईं.

विश्राम के परिजनों का मानना था कि डाक्टरों की लापरवाही से उन के मरीज की मौत हो गई. इस संबंध में बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डाक्टर राजीव लोचन ने बताया, ‘‘वैंटिलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित टैक्नीशियन और स्टाफ  के पदों की स्वीकृति के लिए शासन को मांग भेजी है. वैंटिलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ  न होने की वजह से मरीज को लौटाया गया होगा.’’

आज देश के सरकारी, गैरसरकारी, छोटेबड़े तमाम अस्पताल रोगियों से भरे पड़े हैं. रोगियों की संख्या इतनी है कि उस के मुकाबले अस्पतालों में पलंग नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं, सुविधाएं नहीं हैं. सरकारी अस्पतालों में गंभीर रोगी जमीनों पर पड़े हैं. गांवों के अस्पतालों की हालत तो इतनी दयनीय है कि वहां गरीब आदमी का इलाज कैसे होता होगा, यह सोचा भी नहीं जा सकता है.

गांवों में सरकारी अस्पतालों के भवन भूतों के अड्डे नजर आते हैं. जहां मरीजों के साथसाथ कुत्ते, बिल्ली, गाय, भैंस, बकरी, सांड़, सूअर सब आराम फरमाते हैं. टूटेफूटे बिस्तर में खटमल दौड़ते रहते हैं. आसपास खून और घाव के मवाद वाली रुई, प्लास्टर, सीरिंज, नीडल्स और पानी की खाली बोतलें बिखरी रहती हैं. हफ्तों डाक्टर नहीं आते. स्टोर में दवाएं नहीं होतीं.

आज भी कितने गांव हैं जहां लोगों को पता ही नहीं है कि एंबुलैंस सेवा जैसी भी कोई सेवा होती है क्योंकि उन्होंने तो अपने अस्पताल में कभी एंबुलैंस देखी ही नहीं. गांववालों को अपने मरीज को ले कर जाना होता है तो खाट पर उठा कर ले जाते हैं क्योंकि अस्पतालों में स्ट्रैचर नहीं होते. ग्लूकोज चढ़ाने के वास्ते बोतलें लटकाने के लिए स्टैंड नहीं होते.

गांव के सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोज की बोतलें छत या खिड़की की छड़ों से लटकी दिखाई देती हैं या मरीजों के रिश्तेदार हाथों में टांगे खड़े नजर आते हैं. आम जनता टैक्स भरती है कि इस के बदले में उसे थोड़ी सी सुविधाएं मिलेंगी. मगर उसे मिलता क्या है?

दर-दर भटकते मरीज

बड़े से बडे़ सरकारी अस्पतालों में मरीजों का भरती होना सरल काम नहीं रह गया है. बाराबंकी निवासी जगदंबा प्रसाद के सिर में चोट लग गई. घर के लोग उन को ले कर लखनऊ के लोहिया अस्पताल आए. लोहिया में इमरजैंसी विभाग में इलाज उपलब्ध न होने की बात कह कर उन को मैडिकल कालेज ट्रौमा सैंटर में रैफर कर दिया गया. वहां सीटी स्कैन कर के बताया गया कि यह गंभीर चोट नहीं है, वापस लोहिया अस्पताल ले जाओ.

मरीज के साथ तीमारदार अभी ट्रौमा सैंटर में ही थे कि मरीज की हालत फिर खराब होने लगी. तो वे लोग उस को ले कर लोहिया अस्पताल गए. इस बार भी लोहिया में मरीज को भरती नहीं किया गया. उस को बलरामपुर या मैडिकल कालेज ले जाने को कहा गया. इस तरह एक मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दर दर भटकता रहा.

जानकारी के अनुसार, लोहिया अस्पताल के इमरजेंसी में 45 बैड हैं. वार्डों में कुल 500 मरीजों के लिए बैड हैं. कई बार जगह होने के बाद भी मरीज को भरती नहीं किया जाता है जिस से वह दरदर भटकने को मजबूर होता है.

लखनऊ के इंदिरानगर के तकरोही बाजार में रहने वाले 60 साल के जान मोहम्मद को पेट में तकलीफ  थी. घर के लोग उन को ले कर लोहिया अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में आए. डाक्टरों ने उन्हें भरती करने के बजाय दवा दे कर घर भेज दिया.

अगले दिन जान मोहम्मद ओपीडी में दिखाने आए. परिजन परचा बनवा ही रहे थे, तभी जान मोहम्मद की सांसें थम गईं. उन के घरवालों ने आरोप लगाया कि अगर एक दिन पहले इमरजैंसी में भरती कर लिया गया होता तो मरीज की जान बच जाती. इसी तरह शाहाबाद निवासी 70 साल की रामश्री की इमरजेंसी में 3 घंटे तक इलाज न मिलने से मौत हो गई. शिकायत होने पर अस्पताल का प्रशासन जांच करने की बात करता है.

बडे़ अस्पतालों में मरीजों को ज्यादा न जाना पडे़, इस के लिए लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी पीएचसी और 11 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी शुरू किए गए हैं. शहरी क्षेत्रों में सीएचसी 9 और पीएचसी 52 है.

सामान्यतौर पर यहां उलटी, डायरिया, बुखार का इलाज हो जाता है. यहां भी सही और समय पर इलाज नहीं मिलता है जिस की वजह से लोग बडे़ अस्पतालों में जाने को मजबूर होते हैं. इलाज के लिए मुफ्त सरकारी सुविधाओं को लेने के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट लगी होती है. खासकर डायलिसिस जैसे मरीजों को लंबा इंतजार करना होता है जिस से वे प्राइवेट जांच कराने के लिए मजबूर होते हैं. इस वजह से भी मरीजों को मुफ्त सरकारी इलाज की सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता है.

डाक्टरों की कमी

भारत में करीब 10 हजार से भी अधिक लोगों पर मात्र एक सरकारी डाक्टर उपलब्ध है. विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि करीब एक हजार लोगों पर एक सरकारी डाक्टर होना चाहिए. इस तरह से पूरे देश में 6 लाख डाक्टरों की कमी है. इस के साथ ही साथ बीमारी में असल मदद करने वाली नर्सों की भी बहुत कमी है. देश में करीब 20 लाख नर्सों की कमी है. जो उपलब्ध हैं वे सही तरह से प्रशिक्षित नहीं हैं.

अमेरिका के ‘सैंटर फौर डिजीज डाइनौमिक्स इकोनौमिक्स ऐंड पौलिसी’ यानी सीडीडीईपी द्वारा दी गई रिपोर्ट बताती है कि भारत में एंटीबायोटिक उपलब्ध होने के बाद भी बीमारी का 65 फीसदी खर्च मरीज को खुद उठाना पड़ता है. इस से हर साल 5 करोड़ से अधिक लोग गरीबी का शिकार होते जा रहे हैं.

सरकारी अस्पतालों में सही तरह से इलाज न मिलने के कारण लोग महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर होते हैं. गंभीर किस्म के इलाज, जैसे टीबी, कैंसर, हार्ट, लिवर, किडनी की बीमारियों में इलाज और जांच के नाम पर इतना पैसा खर्च हो जाता है कि सामान्य आदमी इलाज का बोझ नहीं उठा पाता. ऐसे में उस को कर्ज लेना पड़ता है. जिसे भरने के लिए उस को अपनी जमीनजायदाद तक बेचनी पड़ती है. जमीन बेचने के बाद भी कई बार मरीज की मौत इलाज के समय ही हो जाती है, जिस से घरपरिवार सब बिखर जाता है.

बीमारी से बचाव

सरकारी डाक्टरी सेवा से रिटायर होने वाले डाक्टर प्रदीप कुमार कहते हैं, ‘‘सरकार को इलाज पर ध्यान देने के साथ ही साथ इस विषय पर भी योजनाएं तैयार करनी चाहिए कि बीमारियों से बचाव किया जा सके. ज्यादातर लोग खराब पानी पीने और मच्छरों के प्रकोप से बीमार होते हैं. मच्छर बहुत सी बीमारियों की जड़ होते हैं. सरकार इस तरफ ध्यान नही देती. शहरों में गंदे नाले और देहात में तालाब जैसे जलभराव के क्षेत्र बीमारी को बढ़ावा देते हैं. अगर इस की रोकथाम की जाए तो बहुत हद तक गरमी और बरसात में होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है.

‘‘बच्चों की बीमारियों में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की होती है जो हाथ की सफाई नहीं करते. ऐसे में बच्चों को इस बारे में जागरूक किया जाए तो इन में होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है.’’

डाक्टरों का कहना है कि भारत में समयसमय पर शरीर की जांच कराने का चलन बेहद कम है. इस कारण शुरुआत में बीमारी का पता ही नहीं चल पाता है. अगर समय पर बीमारी का पता चल जाए तो इलाज सरल और किफायती हो जाएगा. देशभर में ऐसी जागरूकता फैलाने की जरूरत है कि देशवासी स्वस्थ महसूस करते हुए भी समयसमय पर स्वास्थ्य जांच कराते रहें.

बीमारी के इलाज के साथ ही साथ बीमारी से बचाव पर भी बराबर काम करने की जरूरत है, तभी अस्पतालों में बढ़ती भीड़ को रोका जा सकता है. अस्पताल में मरीजों की संख्या कम होने से बेहतर इलाज संभव हो सकता है. सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में बीमारी से बचाओ को ले कर बहुत बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है.

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