Satya Darshan

एनआईए संशोधन बिल से कितना बदलेगा NIA का स्वरूप

ऋषभ कु. शुक्ला | जुलाई 17, 2019

भारत सरकार ने लोकसभा में एनआईए संशोधन बिल 2019 पास करवा लिया है. इस बिल पर बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन औवेसी के बीच तीखी बहस भी हुई. लेकिन इस बिल से एनआईए में क्या बदलाव होगा?

भारत सरकार ने 15 जुलाई 2019 को लोकसभा में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण) संशोधन बिल, 2019 पेश किया गया. इस बिल को सदन के पटल पर रखने के दौरान भारत के गृहमंत्री अमित शाह और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहदुल मुसलमीन के अध्यक्ष असद्दुदीन औवेसी के बीच तीखी बहस हुई. जब बिल पर वोटिंग हुई तो 278 वोट इस संशोधन के पक्ष में आए और 6 वोट इस बिल के विरोध में आए. ऐसे में यह संशोधन बिल लोकसभा से पास हो गया.

क्या है एनआईए

26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने एक आतंकवाद निरोधी संस्था का गठन किया. 31 दिसंबर 2008 को भारत सरकार ने संसद में एनआईए एक्ट बनाने के बाद से एनआईए नाम की एक नई जांच एजेंसी का गठन हो गया. एनआईए को मुख्य रूप से आतंकवाद निरोध के लिए ही बनाया गया था. एनआईए द्वारा की जाने वाली कार्रवाइयों की जल्द सुनवाई के लिए विशेष एनआईए अदालतें भी बनाई गई हैं.

एनआईए की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक अब तक एनआईए ने 244 केस दर्ज किए गए हैं. इनमें से 37 केसों में चार्जशीट दायर करने के बाद ट्रायल हुआ. इन 37 में से 35 मामलों में अभियुक्तों को सजा हो चुकी है. एनआईए की सफलता दर 91.3 प्रतिशत है. एनआईए संशोधन बिल पेश करते हुए गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया कि एनआईए ने 272 मामलों में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की. इनमें 52 मामलों में फैसले आए और 46 में दोष सिद्ध किया जा सका. रेड्डी ने बताया कि 99 मामलों में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है. 

एनआईए एक नई जांच एजेंसी है लेकिन यहां काम करने वाले लोग अधिकतर पुराने ही हैं. पुराने का तात्पर्य है कि वो पहले से किसी दूसरी संस्था में काम कर रहे हैं. एनआईए के अधिकारी अधिकतर पुलिस सेवाओं, राजस्व सेवाओं, राज्य पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से भी आते हैं.

एनआईए बिल के अनुसार इस जांच एजेंसी को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के अलावा देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की कोशिश, बम धमाका करने की साजिश, हवाई जहाज या पानी के जहाज का अपहरण करने की कोशिश, परमाणु संयंत्रों पर हमला करने की कोशिश पर भी कार्रवाई करने का अधिकार है. एनआईए को अपनी कार्रवाई करने के लिए किसी राज्य सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती है. राज्य सरकारें भी किसी मामले में केंद्र सरकार से सिफारिश कर इसकी जांच एनआईए से करवा सकती है.

एनआईए संशोधन बिल मेंं नया क्या है

आरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक एनआईए बिल में तीन मुख्य परिवर्तन किए गए हैं. अभी तक एनआईए  एटोमिक एनर्जी एक्ट 1962, अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट, 1967 के तहत कार्रवाई कर सकती थी. लेकिन अब एनआईए मानव तस्करी, फर्जी मुद्रा बनाने, प्रतिबंधित हथियारों को बनाने और बेचने, साइबर आतंकवाद और विस्फोटक सामग्री अधिनियम 1908 के मामलों में भी कार्रवाई कर सकेगी.

दूसरा बदलाव एनआईए के अधिकार क्षेत्र में किया गया है. अब तक एनआईए अधिकारियों के पास देश के बाहर हुई किसी घटना पर कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था. अब एनआईए अधिकारियों के पास भारत के बाहर हुईं भारतीय नागरिकों या भारत देश के विरुद्ध की गई आपराधिक घटनाओं पर भी पुलिस की तरह कार्रवाई करने का अधिकार होगा. हालांकि यह अधिकार अंतरराष्ट्रीय संधियों और दूसरे देशों के नियमों के मुताबिक ही होगा.

तीसरा बदलाव एनआईए अदालतों को लेकर किया गया है. अब तक एनआईए के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अपराधों या अनुसूचित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष एनआईए अदालतों का गठन किया जाता था. इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार के पास अधिकार होगा कि वो किसी भी सेशन अदालत को एनआईए अदालत में बदल सकेगी.

इस बिल का विरोध क्यों हुआ

इस बिल का विरोध करते हुए कांग्रेस और दूसरे विरोधी दलों ने कहा कि यह भारत को एक पुलिस स्टेट बनाने की कोशिश है. इस कानून का टाडा या पोटा कानून की तरह दुरुपयोग किया जा सकता है. हालांकि गृह मंत्री अमित शाह का कहना था कि टाडा और पोटा को राजनीतिक फायदे के लिए खत्म किया गया. इनका दुरुपयोग नहीं हुआ. हालांकि आंकड़े अमित शाह के बयान की तस्दीक नहीं करते हैं.

इकॉनमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 1985 से 1994 के बीच भारत में 76,166 लोगों पर टाडा कानून के कहत कार्रवाई की गई. लेकिन इनमें से महज 4 प्रतिशत लोगों पर ही इस कानून के अंदर दोष साबित हो सका. पोटा कानून के तहत भी दोषी ठहराए जाने की दर 5 प्रतिशत से कम थी. अमित शाह के गृहराज्य गुजरात में अक्षरधाम आतंकी हमले के आरोप में पोटा के तहत गिरफ्तार छह आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया था. इनमें से दो आरोपियों को निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी.

ऐसे उदाहरणों के चलते विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि एनआईए का भी ऐसा राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सकता है. समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में एनआईए ने 29 जुलाई 2010 से जांच शुरू की. 19 नवंबर 2010 को असीमानंद को हरिद्वार से इस मामले में गिरफ्तार किया गया. 30 दिसंबर को एनआईए ने कहा कि असीमानंद के खिलाफ पक्के सबूत मिले हैं. जून 2011 में एनआईए ने चार्जशीट दाखिल की. अगस्त 2014 में अदालत से असीमानंद को जमानत मिल गई क्योंकि उनके खिलाफ एनआईए पर्याप्त सबूत नहीं दे पाई. 2019 में आए इस मामले के फैसले में असीमानंद को बरी कर दिया गया. एनआईए इस जांच में गलत साबित हुई. एनआईए ने अपनी जांच के खिलाफ आए फैसले के विरोध में ऊपरी अदालत में याचिका दायर नहीं की. ऐसे ही विवादों के चलते इस बिल का विरोध हुआ. लेकिन जब इस पर वोटिंग हुई तो महज छह वोट इस बिल के विरोध में पड़े.

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