Satya Darshan

बीना राय: एक शानदार अदाकारा

दिवस विशेष | जुलाई 13, 2019

बीना राय ने अपने छोटे से फिल्मी करियर में इंडस्ट्री में अपने सौंदर्य और अभिनय के बल पर लाखों दिलों पर राज किया। पर्दे पर गीत ये जिंदगी उसी की है, जो किसी का हो गया, प्यार ही में खो गया. गाती हुई फिल्म अनारकली की अनारकली ऐसी लगती थीं, मानो दर्शक उन्हें फिल्मी पर्दे पर नहीं, साक्षात देख रहे हों। गीत में उनकी अदायगी ही ऐसी थी। 

ठीक इसी तरह फिल्म ताजमहल का गीत जो वादा किया वो निभाना पडे़गा.. में बादलों में छिपती मुमताज को देखकर जरा भी नहीं लगता कि दर्शक कोई फिल्म देख रहे हैं। वे मुग्ध हो शाहजहां की मुमताज को देखते थे। पर्दे पर इन दो सदाबहार गीतों में लोगों ने अभिनेत्री बीना राय को देखा। उनके अभिनय में शोखी तो थी ही, सुंदरता भी उनके अभिनय में चार चांद लगाती थी। 

‘कृष्णा सरीन’ (बीना राय) की पैदाइश लाहौर (अब पाकिस्तान ) में हुई थी ,13 जुलाई 1931 को। बॅटवारे के समय ‘कृष्णा सरीन’ का परिवार कानपुर आ गया ।

‘कृष्णा सरीन को पढाई के लिए कानपुर से लखनऊ आना पड़ा और यहाँ इनका दाखिला हुआ था इजाबेला थॉबर्न कॉलेज में। जहाँ वे डे स्कॉलर नहीं थी हॉस्टलर थीं। लखनऊ के इजाबेला थॉबर्न कॉलेज में कृष्णा सरीन’और उनकी सहेलियों आशा माथुर (असल नाम सोहन सिंह ) और इन्दिरा पांचाल पर हीरोइन बनने का भूत सवार था। कृष्णा कॉलेज के नाटकों में काम किया करती थी। 

एक विज्ञापन देख कर कृष्णा और उसकी तीनों सहेलियों ने फिल्म कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया था, जिसके बाद तीनों अभिनेत्री बनीं। कुछ का कहना है कि फिल्म निर्माता- निर्देशक और अभिनेता किशोर साहू ने कृष्णा को एक नाटक में देखा था। वह उससे प्रभावित हुए और दोनों सहेलियों के साथ उन्हें बम्बई अब मुम्बई लेकर चले आये। किशोर साहू ने कृष्णा को बीना राय नाम दिया। 

बीना राय की बतौर हीरोइन पहली फिल्म ‘काली घटा’ थी। यह फिल्म 1951 में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के नायक और निर्देशक किशोर साहू थे। फिल्म नहीं चली। अलबत्ता, अपने गजब के हुस्न के कारण बीना राय का जादू फिल्म निर्माताओं के सिर चढ़ कर बोलने लगा। फिल्मों में बीना राय का करियर बहुत लम्बा नहीं रहा। अपने 15 साल के करियर में उन्होंने 19 फिल्में कीं। इन सभी में तत्कालीन बड़े अभिनेता उनके नायक थे। 

उन्होंने अशोक कुमार के साथ शोले, सरदार, तलाश, बन्दी और दादी मां, भारत भूषण के साथ मेरा सलाम, अजित के साथ मरीन ड्राइव, दिलीप कुमार और देव आनंद के साथ ‘इंसानियत’ और प्रेमनाथ के साथ शगुफ्ता, औरत, प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा, हमारा वतन, समंदर और चगेंज खान सरीखी फिल्में कीं। प्रेमनाथ के साथ उनकी कोई भी फिल्म हिट नहीं हो सकी। 

फिल्मों में उनकी सबसे सफल जोड़ी प्रदीप कुमार के साथ बनी, जो अपनी ऐतिहासिक फिल्मों में भूमिका के कारण प्रिंस अभिनेता के रूप में मशहूर थे। बीना राय की प्रदीप कुमार के साथ हिट फिल्मों में अनारकली, ताजमहल और घूंघट फिल्में थीं। ‘घूंघट’ के लिए बीना राय को फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला।

मधुबाला और प्रेमनाथ पहली फिल्म बादल (1951) थी। शूटिंग के पहले दिन मधुबाला ने प्रेमनाथ के मेकअप रूम में प्रवेश किया और ही उन्हें लाल गुलाब और एक नोट सौंप दिया। प्रेमनाथ ने नोट पढ़ा जो कहा कि यदि आप मुझसे प्यार करते हैं, तो कृपया गुलाब को स्वीकार करें, अन्यथा इसे वापस कर दें। प्रेमनाथ चकित हो गये। बिना किसी हिचकिचाहट के, प्रेमनाथ ने गुलाब को स्वीकार कर लिया और उसे अपने कोट  में और कहा मधुबाला से कुबूल है, कुबूल है। बाद में उसी प्रेमनाथ ने औरत (1953) के सेट पर बीना राय के साथ प्यार किया और उनसे शादी कर ली।

के-आसिफ ने मुगल-ए-आज़म में अनारकली की भूमिका के नर्गिस का चयन किया पर नर्गिस ने इस फिल्म को छोड़ दिया था अब रोल मधुबाला को मिला। मधुबाला ने मुगल-ए-आज़म में अनारकली की भूमिका जान डाल दी थी। उसी समय फिल्मिस्तान ने अनारकली की घोषणा की बीनारॉय ने अनारकली की भूमिका निभाई थी। ये फिल्म 1953 में रिलीज हुई थी और बड़ी सफलता हासिल की थी। जबकि मुगल-ए-आज़म को 7 साल की देरी हुई थी।

मुगल-ए-आज़म 1960 में रिलीज़ हुई थी और उस दौर की बेहद कामयाब फिल्म थी। मधुबाला तो उस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड उनको मिलेगा यह तय माना जा रहा था। पर अवॉर्ड मिला बीना राय को फिल्म घूंघट के लिए। यह हैरान करने वाला फैसला था फिल्मफेयर अवॉर्ड कमेटी की खूब आलोचना हुई थी। 

बीना राय के अनारकली बनने की कहानी भी दिलचस्प है। उन दिनों के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ की जोर-शोर से शुरुआत की थी, पर किसी न किसी कारण से शूटिंग टलती जा रही थी। ऐसे समय में एक छोटे फिल्मकार नन्दलाल जसवंत लाल सामने आये। उन्होंने सलीम अनारकली की कहानी को लेकर ‘अनारकली’ का निर्माण शुरू किया। 

इस फिल्म के सलीम प्रदीप कुमार थे तथा उनकी अनारकली बीना राय बनी थीं। इस श्वेत-श्याम फिल्म ने धूम मचा दी थी। खासतौर पर इस फिल्म में सी. रामचन्द्र का संगीत जबर्दस्त हिट हुआ था। बीना रॉय पर फिल्माया गया मोहब्बत में ऐसे कदम लड़खड़ाए जमाने ने समझा हम पी के आये.. का जादू आम संगीत प्रेमियों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। नशे में झूमती अनारकली के रूप में बीना राय की अदाकारी दिलकश और गजब की थी। लोग इस एक गीत के लिए अनारकली को देखने बार-बार गये। उस समय बीना राय के माथे पर बालों की एक घूमती लट के साथ पोस्टर काफी मशहूर हुआ था। 

उनकी एक अन्य ऐतिहासिक फिल्म ‘ताजमहल’ 1963 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में बीना राय मुमताज महल की भूमिका में थीं। कहते हैं कि जब मधुबाला के दिलीप कुमार से संबंध टूट गये, तब मधुबाला के दीवाने प्रेमनाथ ने मधुबाला के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। मधुबाला ने उसे स्वीकार भी कर लिया था, मगर पता नहीं क्या बात हुई कि प्रेमनाथ ने अपनी फिल्म ‘औरत’ की नायिका बीना राय से शादी कर ली। 

बीना राय और मधुबाला का अंतिम मुकाबला 1960 में हुआ, जब बीना राय को ‘घूंघट’ और मधुबाला को ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की श्रेणी में नामित किया गया। उम्मीद की जा रही थी कि मधुबाला यह पुरस्कार जीतेंगी, पर अंतत: यह पुरस्कार बीना राय को ‘घूंघट’ में अपनी पारिवारिक भूमिका के लिए मिला। बीना राय को ‘नागिन’ और ‘देवदास’ के प्रस्ताव भी मिले थे, मगर बीना राय ने दोनों बड़े प्रस्ताव ठुकरा दिये। बाद में ये दोनों भूमिकाएं वैजयंतीमाला को मिल गयीं। 

सभी जानते हैं कि ‘नागिन’ और ‘देवदास’ ने वैजयंतीमाला को टॉप पर पहुंचा दिया था। कभी लाखों फिल्मी दर्शक के दिल पर राज करने वाली हीरोइन बीना राय अंतिम समय में मुंबई के मालाबार हिल स्थित अनीता भवन में बेटे मोंटी के साथ रहती थीं। उनके बड़े बेटे प्रेम किशन और कैलाश नाथ हैं। प्रेम किशन फिल्म-सीरियल निर्माण से जुड़े हैं। प्रेम किशन की बेटी आकांक्षा भी कई फिल्में में काम कर चुकी हैं। 6 दिसम्बर, 2009 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

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