Satya Darshan

इंदिरा जैसा जज्बा दिखा पायेंगी उनकी पुत्रवधू?

अदिति फडनिस | जुलाई 13, 2019

भारत के छठे आम चुनाव 16 मार्च,1977 को संपन्न हुए। स्वर्गीय आर के धवन का कहना था कि उन्होंने ही इंदिरा गांधी को यह खबर दी कि खुद इंदिरा और कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गए हैं। उस समय इंदिरा रात का खाना खा रही थीं। धवन के मुताबिक, इतना सुनते ही इंदिरा के चेहरे पर सुकून के भाव दिखे थे। उन्होंने कहा था, 'अब मेरे पास खुद के लिए और परिवार के लिए वक्त होगा।' 

अगली सुबह होने तक जब सारे परिणाम आ गए तो उन्होंने राष्ट्रपति से आपातकाल खत्म करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध किया और फिर अपना इस्तीफा सौंप दिया था। शायद उनकी जिंदगी में यह पहली बार था जब उनके पास न तो कोई काम था, न कोई आमदनी थी और न ही कोई घर था। 

उस समय मेरे एक अंग्रेज दोस्त ने लिखा था कि 'क्या इंदिरा अब अपना वक्त पक्षियों को देखने या हिमालय या कश्मीर में बिताएंगी?' लेकिन उन्होंने कहा था, 'हमें भारत से आने वाली खबरों पर नजर रखनी होगी और आज से पांच साल बाद शायद आप एक बार फिर से विशाल बहुमत से सत्ता में लौटेंगी। लोकतंत्र ऐसा ही है।' 

इंदिरा के पास लंदन में रहने का विकल्प था और प्रधानमंत्री बनने के पहले वह ऐसा चाहती भी थीं। लेकिन उन्हें यह अहसास भी हो चुका था कि वह भारत छोड़कर नहीं रह सकती हैं। एक पारिवारिक दोस्त ने उनके लिए अपना बंगला खाली कर दिया और वह अपने परिवार के साथ उसमें रहने लगीं।
 
सोची-समझी रणनीति के तहत केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अधिकारी 3 अक्टूबर, 1977 को इंदिरा की गिरफ्तारी के लिए उनके आवास के बाहर जा पहुंचे। यह शाम 4.45 बजे का वक्त था। अटॉर्नी जनरल और सोलिसिटर जनरल को सरकार के इस कदम के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इंडिया टुडे पत्रिका में उस घटना से संबंधित दिलचस्प विवरण दिए गए हैं। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह को इस गिरफ्तारी के लिए हरी झंडी देने के साथ एक हिदायत भी दी थी। 

उन्होंने कहा था कि किसी भी कीमत पर इंदिरा गांधी को हथकड़ी नहीं लगानी है। सीबीआई की टीम 12, विलिंग्डन क्रीसेंट के दरवाजे की तरफ बढ़ चली। अधिकारियों ने इंदिरा के सहयोगी से कहा कि उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री को हिरासत में लेने को कहा गया है और इसके लिए उन्होंने भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं का हवाला भी दिया। 

उस समय उन्हें शायद ही मालूम था कि गृह मंत्रालय द्वारा बनाई एफआईआर गलत थी। उन अफसरों को करीब दो घंटे तक इंतजार करना पड़ा और उस दौरान इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी और पुत्रवधू मेनका ने दिल्ली में मौजूद सभी विदेशी मीडिया प्रतिनिधियों को टेलीफोन पर इसकी सूचना दे दी।
 
शाम छह बजे इंदिरा गांधी बाहर निकलीं। उनके वकील फ्रैंक एंथनी ने सीबीआई अफसरों से एफआईआर की प्रति की मांग की तो कहा गया कि उन्हें यह प्रति देना जरूरी नहीं है और इंदिरा गांधी को इन आरोपों के बारे में पढ़कर बताया जा चुका है। 

इंदिरा ने जब खुद पर लगाए गए आरोपों के बारे में सुना तो उन्होंने कहा, 'हथकड़ी कहां है? मैं तब तक नहीं जाऊंगी जब तक मुझे हथकड़ी नहीं लगाई जाती है।' हथकड़ी को लेकर करीब एक घंटे तक वाद-विवाद होता रहा। इस दौरान घर के आसपास कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग चुका था और वे लगातार नारे लगा रहे थे। 

ब्रह्मानंद रेड्डी, कमलापति त्रिपाठी और मोहसिना किदवई जैसे शीर्ष पार्टी नेताओं के चेहरे पीले पड़ चुके थे। आखिरकार इंदिरा एक कार में बैठीं और वह कार उन्हें लेकर चली गई। उसके पीछे राजीव गांधी और संजय गांधी भी अपनी कारों में रवाना हो गए। 

सुबह होते ही एफआईआर में खामी को लेकर चरण सिंह की चिंता सही साबित हो गई। गिरफ्तारी के अगले दिन अदालत में पेश किए जाने पर उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में दम नहीं था। जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी को जेल भेजने का अपना मकसद पूरा करने के लिए संसद के विशेषाधिकार हनन प्रावधान का सहारा लिया जब दिसंबर 1978 में उन्हें एक हफ्ते के लिए तिहाड़ जेल में डाला गया था। 

इंदिरा गांधी ने अपनी गिरफ्तारी के बाद जारी बयान में कहा था, 'मैंने अपनी पूरी क्षमता से इस देश और यहां की जनता की सेवा करने की कोशिश की है। मेरे खिलाफ लगाए गए आरोप चाहे जो भी हों लेकिन यह गिरफ्तारी विशुद्ध राजनीतिक है। मुझे लोगों के पास जाने से रोकने और उनकी नजर में मुझे गिराने की यह एक कोशिश है। हमने जनकल्याण के लिए शुरू किसी भी कार्यक्रम में सरकार को अपना सहयोग देने की बात कही हुई है लेकिन अन्याय और गड़बड़ी देखने के बाद भी हम मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते हैं।'

जिस दिन उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया था तो युवा कांग्रेस के सदस्य होने का दावा करने वाले दो लोगों ने इंडियन एयरलाइंस के एक विमान को अगवा कर लिया। वह विमान लखनऊ से दिल्ली जा रहा था और उसमें 126 यात्रियों एवं चालक दल के छह सदस्य सवार थे। अपहर्ताओं ने उसे वाराणसी में ही उतरने के लिए बाध्य कर दिया। उनके चंगुल से बच निकले एक विमानयात्री ने बताया था कि वे इंदिरा गांधी की रिहाई की मांग कर रहे हैं। उस दिन देश भर में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के दौरान करीब 18,000 कांग्रेस कार्यकर्ता हिरासत में लिए गए थे।  

ऐसे में नैशनल हेरल्ड को लेकर चल रहे मामले में अदालत में पेश होने के मुद्दे पर सोनिया गांधी की प्रतिक्रिया सुनकर अचरज नहीं होना चाहिए। सोनिया ने कहा, 'मैं इंदिरा गांधी की पुत्रवधू हूं। मैं किसी से नहीं डरती।' पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपनी किताब में लिखा है कि शाह आयोग के समक्ष पेश हुए अधिकारियों ने आपातकाल लगाने और मौलिक अधिकारों के स्थगन के लिए इंदिरा गांधी को ही जिम्मेदार बताया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने किसी और को नहीं बल्कि खुद को ही जिम्मेदार बताया था।

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