Satya Darshan

संपादकीय: चीन होने की महत्ता

अगर चीन में सत्ताधारी पार्टी का राज घरघर में है तो भारत में सत्ताधारी पार्टी अपने धार्मिक क्रियाकलापों के जरिए देशवासियों के मुंह पर ताला लगा रही है.

संपादकीय | जुलाई 13, 2019

वर्ष 1980 तक भारत के बराबर गरीब और दानेदाने को मुहताज चीन आज दुनिया की सब से ज्यादा ताकतवर हस्ती अमेरिका को चुनौती दे रहा है और वह भी बराबरी की हैसियत से. चीन 1960-70 का वियतनाम या 1990-2010 का उत्तरी कोरिया नहीं है कि जो अपने लोगों के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो कर अमेरिका से मुकाबला करने को तैयार हुए. चीन तो रूस की तरह, या यों कहिए कि उस से भी कई कदम आगे चल कर, अमेरिका से मुकाबला कर रहा है. इस के मुकाबले भारत, चाहे गिड़गिड़ा न रहा हो, को मालूम है कि उस का एक पांव चाहे चांद पर पहुंचने को उतावला हो, दूसरा तो गोबर के गड्ढे में धंस ही रहा है.

भारत और चीन की तुलना करना अब बंद कर दी गई है. विश्व के देश चीन की उन्नति से परेशान हैं. भारत के बारे में उन्हें मालूम है कि यह सिर्फ हल्ला मचा सकता है. भारत की विशेषता केवल यह है कि लाखों भारतीय दुनियाभर की कंपनियों में कंप्यूटरों के कर्ताधर्ता बने हैं. पर, चीनी तो मालिक हैं सैकड़ों कंपनियों के.

चीन की अब यह हैसियत है कि वह अपने नागरिकों को अमेरिका का वीजा न लेने की सलाह दे रहा है. चीन अमेरिका व्यापार युद्ध के मौजूदा दौर में अमेरिका खीझ कर चीनियों पर बंदिश लगा सकता है जो मैक्सिकनों या अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों के नागरिकों पर लगा रहा है. फर्क यह है कि उन देशों से केवल मजदूर अमेरिका आ रहे हैं. चीन से मजदूर तो वहां न के बराबर आ रहे हैं. वहां से तो समझदार, होशियार और बहुत पैसे वाले अमेरिका आ रहे हैं.

चीन का बंद माहौल वहां हर सफल व्यक्ति को डराता है. विदेशियों के लिए अमेरिका में स्वतंत्रता की एक अजीब खुशबू है. यह पहले भारत में गरीबी के बावजूद थी लेकिन अब खत्म हो रही है. अगर चीन में सत्ताधारी पार्टी का राज घरघर में है तो भारत में सत्ताधारी पार्टी अपने धार्मिक क्रियाकलापों के जरिए देशवासियों के मुंह पर ताला लगा रही है. अमेरिका आज जो बंदिशें लगा रहा है उन का वहीं अमेरिका में ही जम कर विरोध भी हो रहा है.

भारत और चीन की तुलना हमेशा होती रहेगी. हमारी सरकार पाकिस्तान को आगे कर इस तुलना को रोकने की कोशिश कर रही है. कोई आश्चर्य नहीं कि चीन से ज्यादा उपजाऊ जमीन पर बसे भारत देश की 130 करोड़ जनता चीन की 140 करोड़ जनता से सभी मोरचों पर पीछे रह जाए. इस का जवाब देश की सरकार को देना होगा, आम आदमी को नहीं, क्योंकि आज सरकार ही तय करती है कि हम भारतवासी क्या पढ़ें, क्या खेलें, कैसे काम करें, कहां रहें और यहां तक कि क्या खाएं.

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