Satya Darshan

क्या हिटलर 'गे' था? जानिए क्यों इस तानाशाह से बचाकर ब्रिटेन भेजे गए थे 10000 यहूदी बच्चे

विश्व दर्शन | जुलाई 13, 2019

अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने अपनी एक रिपोर्ट में  कुख्यात तानाशाह एडोल्फ हिटलर की सेक्स लाइफ के बारे में एेसा खुलासा किया है, जिसे जानकर दुनिया हैरान है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तैयार की गई इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हिटलर समलैंगिक था और उसने कई साल ऑस्ट्रिया के एक गे हॉस्टल में गुजारे थे. 1943 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट के लिए तैयार की गई इस रिपोर्ट में हिटलर के बारे में कहा गया कि वह होमोसेक्शुअल और हेट्रोसेक्शुअल  यानी बाइसेक्शुअल था.

70 पेज के इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हिटलर अपने सहयोगी (डिप्टी) रुडोल्फ हेस के प्रति सेक्शुअली आकर्षित था. यह रिपोर्ट एन्थ्रोपॉलोजिस्ट हेनरी फील्ड ने तैयार की थी. फील्ड व्हाइट हाउस के स्पेशल इंटेलिजेंस यूनिट के सदस्य थे. उनसे हिटलर समेत जर्मनी के शीर्ष स्तर के नेताओं के बारे में खुफिया जानकारी एकत्र करने को कहा गया था. हेनरी फील्ड की ओर से तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि हिटलर 1910 से 1913 के बीच ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना के एक पुरुषों के हॉस्टल में रह रहा था.

हिटलर उस वक्त बेरोजगार था और एक पेंटर के रूप में अपनी पहचान बनाने में जुटा था, लेकिन पिता की विरासत मिलने के बाद वह जर्मनी वापस लौटा. फील्ड ने हिटलर के बचपन से लेकर शिक्षा, पसंदीदा संगीत और भाषण शैली को लेकर अध्ययन किया. ऑफिस ऑफ स्ट्रैटेजिक सर्विसेस फाइल्स ने तब दावा किया था कि हिटलर जिस हॉस्टल में रहता था, वहां बुजुर्ग अपनी समलैंगिक सेक्स इच्छा की पूर्ति के लिए युवकों की तलाश में रहते थे. हिटलर के समलैंगिक रुझान की जानकारी 1920-30 के दशक में उसके दोस्त रहे अर्नेस्ट सेजविक ने दी थी.

हालांकि, बाद में इस जर्मन-अमेरिकी ने हिटलर का साथ छोड़ दिया था और नाजी नेतृत्व से बचते हुए ब्रिटेन भाग गए. वह अमेरिका चले गए थे और अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट के लिए काम करना शुरू कर दिया था. उन्होंने अमेरिका को जर्मनी के करीब 100 बड़े अधिकारियों के बारे में जानकारी मुहैया कराई. रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा माना गया कि 'हेस' उपनाम होमोसेक्शुअल सदस्यों का था. हिटलर से जुड़े चैप्टर का अंत करते हुए फील्ड लिखते हैं कि राजनीतिक आउटलुक के कारण उनके जीवन में कई चीजें दोहरी थीं. वो दोनों होमोसेक्शुअल  और हेट्रोसेक्शुअल थे, समाजवादी और धुर राष्ट्रवादी.

वहीं दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने से पहले करीब 10,000 यहूदी बच्चों को जर्मनी से ब्रिटेन पहुंचाया गया था. आज आठ दशक बाद ये यहूदी अपनी यादें लिए फिर जर्मनी आ रहे हैं.

राल्फ मोलेरिक को दिसंबर 1938 की वह रात कभी नहीं भूलती. उस रात उन्होंने अपनी बहन के साथ जर्मनी के हैम्बर्ग से एक ट्रेन पकड़ी थी. यह ट्रेन उन्हें ब्रिटेन ले जाने वाली थी. साथ में थोड़ा सा ही सामान था लेकिन सवाल बहुत सारे थे. "ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है. ट्रेन में चढ़ते ही मैंने अपनी बहन से पहला सवाल किया था कि हमारे माता पिता कहां हैं."

राल्फ की उम्र तब महज आठ साल थी. 17 साल की बहन उन्हें संभालने की कोशिश कर रही थी. बहन ने बताया कि माता पिता तीन महीने बाद उन्हें ब्रिटेन में ही मिलेंगे और फिर वहां से वे सब एक साथ समुद्र के रास्ते अमेरिका जाएंगे, जहां वे एक नई जिंदगी शुरू कर पाएंगे. राल्फ अमेरिका तो पहुंचे लेकिन अपने माता पिता के बिना.

अपनी कहानी सुनाते हुए राल्फ मोलेरिक ने कहा, "मैं हमेशा उन्हें याद करता रहा, सोचता रहा कि वे आएंगे लेकिन वे कभी नहीं आए. वे आ ही नहीं पाए." राल्फ उन 10,000 यहूदी बच्चों में से एक थे जिन्हें दिसंबर 1938 से सितंबर 1939 के बीच नाजी जर्मनी से ब्रिटेन ले जाया गया था. बच्चों को नाजी अत्याचार से बचाने के इस मिशन को "किंडरट्रांसपोर्ट" यानी बच्चों के ट्रांसपोर्ट का नाम दिया गया.

1933 में अडोल्फ हिटलर के सत्ता में आने के बाद ब्रिटेन समेत कई पश्चिमी देशों ने नाजी जर्मनी से लोगों के आने पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि इन सरकारों को अपना फैसला बदलना पड़ा. 9 नवंबर 1938 को कई यहूदी उपासनागृहों और दुकानों पर हमले हुए. इतिहास में इस रात को "क्रिस्टालनाख्ट" यानी टूटे हुए कांच की रात के नाम से जाना जाता है. इससे पहले 30,000 से ज्यादा यहूदी पुरुष गिरफ्तार कर लिए गए थे और 91 लोगों का कत्ल किया जा चुका था.

इसके बाद ब्रिटेन की सरकार ने यहूदियों के लिए वीजा और पासपोर्ट के नियम बदले. 17 साल तक की उम्र के बच्चों को ब्रिटेन जाने की इजाजत मिल गई. लेकिन सरकार ने यह शर्त भी रखी की ब्रिटेन तक आने और वहां रहने का खर्च परिवारों को खुद ही उठाना होगा, सरकार इसमें कोई मदद नहीं देने वाली थी. नियम बदलने के बाद राहत एजेंसियां फौरन सक्रिय हो गईं. क्रिस्टालनाख्ट के तीन हफ्तों के भीतर यहूदी बच्चों को जर्मनी से बाहर निकालने की तैयारी कर ली गई थी.

दिसंबर की शुरुआत से ही बच्चों को ब्रिटेन में भेजा जाने लगा था. राल्फ जैसे बच्चों को कोई अंदाजा नहीं था कि ब्रिटेन पहुंचने के बाद क्या होने वाला है या फिर जर्मनी में उनके माता पिता के साथ क्या होगा. "1942 में मुझे अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस से एक खत आया. उसमें लिखा था - आपके माता पिता होलोकॉस्ट में मारे गए, हमें बहुत खेद है और हम आपको यह बताना चाहते हैं कि उनका कत्ल किया गया था."

आज 80 सालों बाद भी उनके जख्म भरे नहीं हैं. न्यूयॉर्क में रहने वाली मेलिसा हाकर की मां उन बच्चों में से एक थीं जो ट्रेन पर सवार हो कर ब्रिटेन पहुंचीं थीं. आज मेलिसा न्यूयॉर्क में "किंडरट्रांसपोर्ट एसोसिएशन" नाम का एक गैर सरकारी संगठन चलाती हैं जो होलोकॉस्ट पीड़ितों को एक साथ लाने का काम करता है. मेलिसा ने इन लोगों की यादें ताजा करने के लिए इन्हें एक बार फिर यूरोप में इकट्ठा करने का फैसला किया है. आठ दशक बाद ये लोग वियना से बर्लिन और फिर एम्स्टर्डम होते हुए लंदन पहुंचेंगे. राल्फ जैसे लोगों के लिए इस तरह का सफर दर्दनाक यादों से भरा होगा.

मेलिसा के अनुसार यह यात्रा सिर्फ इन बुजुर्गों को अपना अतीत याद कराने के लिए नहीं है, बल्कि आज की पीढ़ी को जागरूक करने के लिए भी है. वे चाहती हैं कि युवा उनके तजुर्बों से सीख लें. वहीं राल्फ का भी मानना है कि आज के जमाने में जहां जर्मनी और यूरोप में एक बार फिर यहूदी विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं, इस यात्रा का महत्त्व और बढ़ जाता है, "किसी भी माता पिता के लिए अपने बच्चे को दूर भेज देना कितना मुश्किल होगा. उन्होंने अपने साथ जो प्यार भेजा था, मैंने आज भी उस अहसास को समेटा हुआ है. और मुझे लगता है कि अब यह मेरी जिम्मेदारी है कि युवाओं को बताऊं कि उस जमाने में हमारा जीवन कैसा हुआ करता था."

(ऑस्टिन चैंडलर डेविस की रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद)

 

 

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