Satya Darshan

जानिए धर्म का मूल तत्व

धर्म-अध्यात्म | जुलाई 13, 2019

धर्म के सम्बन्ध में बड़ी मत विभिन्नता देखने में आती है । संसार के विभिन्न दूरवर्ती देशों की बात तो जाने दीजिये, अपने ही देश और अपनी हो जाति के लोगों के धार्मिक विचारों और आचरण में जमीन आसमान का अन्तर दिखलाई पड़ता है। 

अधिकांश लोगों ने तो धर्म को जीवन से अलग एक बाहरी क्रियाकाण्ड की चीज समझ लिया है। अनेक लोग धर्माचरण करना इसलिये जरूरी समझते हैं कि उसने एक सामाजिक रीति रिवाज का सा रूप ग्रहण कर लिया है। पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम है जिन्होंने अपनी बुद्धि से धर्म के वास्तविक मर्म पर ध्यान दिया है और जो सोच समझ कर उस पर आचरण कर रहे हैं।

सृष्टि का निर्माण होने पर जीवों में जब चेतना शक्ति उत्पन्न हुई और वे कुछ कर्तव्य अकर्तव्य के सम्बन्ध में सोचने विचारने लगे तो उनके सामने धर्म-अधर्म का प्रश्न उपस्थित हुआ। उस समय भाषा और लिपि का सुव्यवस्थित प्रचलन नहीं था और न कोई धर्म पुस्तक ही मौजूद थी। शिक्षा देने वाले धर्म गुरु भी दृष्टि गोचर न होते थे। ऐसी दशा में अपने अन्दर से, पथ प्रदर्शन करने वाली जो आध्यात्मिक प्रेरणा जागृत होती थी मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते थे।

'वेद अनादि ईश्वर कृत हैं ।' इसका अर्थ ग्रह है कि धर्म का आदि स्त्रोत मनुष्यों द्वारा निर्मित नहीं है वरन् सृष्टि के साथ ही अन्तरात्मा द्वारा ईश्वर ने उसे मानव जाति के निमित्त भेजा था। वेद की भाषा या मन्त्र रचना ईश्वर द्वारा निर्मित है यह मान्यता ठीक नहीं, वास्तविकता यह है कि प्रबुद्ध आत्माओं वाले ऋषियों के अन्तःकरण में ईश्वरीय संदेश आये और उन्होंने उन संदेशों को मन्त्रों की तरह रच दिया। प्राय: सभी धर्मों की मान्यता यही है कि ''उनका धर्म अनादि है, पैगम्बरों और अवतारों ने तो उनका पुनरुद्धार मात्र किया है''।

तत्वत्: सभी धर्म अनादि है अर्थात् एक ही अनादि धर्म की शाखायें हैं। उनका पोषण जिस वस्तु से होता है वह जड़ तत्व है। वही धर्म सच्चे ठहर सकते हैं जो सत् पर अवलम्बित हैं। असत् तो वंचना मात्र है। वह अल्प स्थाई होता है और बहुत शीघ्र नष्ट हो जाता है। कोई भी सम्प्रदाय यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि हमारा धर्म 'सत्' पर अवलम्बित नहीं है। इसलिये यह स्वीकार करना हो होगा कि एक ही अनादि सत्य का आश्रय लेकर धर्म सम्प्रदाय उत्पन्न हुए है। यह आदि सत्य हमारी अन्तरात्मा में ईश्वर द्वारा भली प्रकार पिरो दिया गया है। 

न्याय बुद्धि का आश्रय लेकर जब हम कर्तव्य अकर्तव्य का निर्णय करना चाहते हैं तो अन्तरात्मा उसका सही-सही निर्णय कर देती है । विभिन्न सम्प्रदायों के ''अपने-अपने स्वतन्त्र धर्म ग्रंथ हैं। वेद, कुरान, बाइबिल, जिन्दावस्ता, धम्मपद आदि असंख्य धर्म शास्त्रों में उसी महान 'सत' की व्याख्या की गयी है। अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार इन महान शास्त्रों ने सत् की व्याख्या की है। फिर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और अपने कथन की अपूर्णता को स्वीकार करते हुए 'नेति नेति' ही कहते रहे। 

सभी, धर्मों में नये सुधारक होते रहे और उन्होंने पुरानी व्याख्या को दोष पूर्ण बता कर, अपनी रुचि के अनुसार सुधार किये। इन सुधारकों का कथन था कि उन्हें ईश्वर ने ऐसे ही सुधार करने के निमित्त भेजा है। इन सुधारकों में भी सुधार करने वाले होते आये है और वे सब भी धर्माचार्य ही थे। सत्य एक है तो भी उसका प्रयोग करने को विधियाँ बदलती रहती हैं। ''शरीर को ऋतु प्रभावों से रक्षा करनी चाहिए" यह एक सच्चाई है पर इसका व्यवहारिक रूप समय-समय पर बदलता रहता है। जाड़े के दिन में जिन कपड़ों की आवश्यकता थी उनका गर्मी के दिनों में कोई उपयोग नहीं है। इसलिये पोशाक में परिवर्तन करना जरूरी है। 

यह आक्षेप करना उचित न होगा कि पैगम्बरों ने अपनी बात को ईश्वर की वाणी क्यों कहा? यदि उनके संदेश ही ईश्वर की वाणी थे तो अनेक धर्मों के पैगम्बर मतभेद क्यों रखते है? इन में से एक को सच्चा माना जाय तो बाकी सब झूठे ठहरते है। तथ्य बात यह है कि सभी पैगम्बरों की वाणी में ईश्वरीय संदेश था। उन्होंने जो कुछ कहा अन्तरात्मा की पुकार के आधार पर, ईश्वर की आकाशवाणी के संकेत पर कहा। 

समयानुसार प्रथायें बदलती हैं जैसे कि ऋतुओं के अनुसार पोषाक बदलती हैं। एक व्यक्ति दिसम्बर के महीने में यह शिक्षा देता है कि ऊनी कोट और स्वेटर पहनो तो उसकी शिक्षा सत्य से तब से परिपूर्ण है किन्तु यदि दूसरा व्यक्ति जून के महीने में यह कहता है कि अब ऊनी कोट की या रुई के लिहाफ की कोई जरूरत नहीं है बल्कि पतले कपड़े पहनने चाहिए तो वह भी झूठा नहीं है।

कई बार साम्प्रदायिक और सामाजिक रीति रिवाजों और मान्यताओं के सम्बन्ध में आपके सामने बड़ी पेचीदा गुत्थी उपस्थित हो सकती है। विभिन्न धर्मों के पूज्यनीय अवतार और धर्मग्रंथ एक दूसरे से विपरीत उपदेश देते हैं। ऐसी दशा में बड़ा मतिभ्रम होता है कि किसे मानें और किसे न मानें। इस गुत्थी को सुलझाने के लिये आपको यह बात हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि अवतारों का आगमन और धर्मग्रंथों का निर्माण समय की आवश्यकता को पूरी करने के लिये होता रहा है। कोई पुराने नियम जब समय से पीछे के हो जाने के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं, तो उनमें सुधार करने के लिये नये-नये सुधारक, नये अवतार प्रकट होते है। देशकाल और व्यक्तियों की विभिन्नता के कारण उनके उपदेश भी अलग-अलग होते हैं । देश, काल और पात्र के अनुसार वेद एक से चार हुए, कुरान में संशोधन हुआ बाइबिल तो अनेक अवतारों की उक्तियों का संग्रह है। 

जब वैदिक ब्रह्मोपासना आवश्यकता से अधिक बढी़ तो भौतिक वादी वाम मार्ग की आवश्यकता हुई। जब वाम मार्गी हिंसा की अति हुई तो भगवान बुद्ध ने अहिंसा का मार्ग चलाया। जब अहिंसा का रोड़ा मानव जीवन के मार्ग में बाधा देने लगा तो शंकराचार्य ने उसका खण्डन करके वेदान्त का प्रतिपादन किया। इसी प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक और सामाजिक अन्तर होते रहते है। साम्प्रदायिक नियम और व्यवस्थाओं का अस्तित्व समयानुसार परिवर्तन की धुरी पर धूम रहा है। देश, काल और पात्र के भेद से इनमें परिवर्तन होता है और होना चाहिए। एक नियम एक समय के लिये उत्तम है तो वही कालान्तर में हानिप्रद हो सकता है। गर्मी की रातों में लोग नंगे बदन सोते हैं पर वही नियम सर्दी कीं रातों में लागू किया जायगा तो उसका बड़ा घातक प्रभाव होगा।

संसार के अनेक धर्मों के आदेशों को सामने रखें उनके सिद्धान्त और आदेशों पर दृष्टिपात करें तो वे बहुत बातों में एक दूसरे से विपरीत जाते हुए प्रतीत होते है उनमें विरोधाभास भी दिखाई देता है परंतु वास्तव में भ्रम में पड़ने की कोई बात नहीं है। दृष्टि हीनों ने एक बार एक हाथी को छूकर देखा और वे उसका वर्णन करने लगे। जिसने पैर छुआ था उसने हाथी को खम्भा जैसा, जिसने पूंछ छुई थी उसने बाँस जैसा, जिसने कान छुआ था उसने पंखे जैसा, जिसने पेट छुआ था उसने चबूतरे जैसा बताया। वास्तव में वे सभी सत्य वक्ता हैं क्यों कि अपने ज्ञान के अनुसार सभी ठीक कह रहे हैं। उनका कहना उनकी परिस्थिति के अनुसार ठीक ही है। परन्तु उसे पूरा नहीं माना जा सकता। 

देश, काल और पात्र की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अवतारी आत्माओं ने विभिन्न समयों पर विभिन्न धर्मों का उपदेश दिया है। भगवान महावीर को एक मांस भोजी निशाद मिला। उन्होंने उसे मांस भोजन त्याग देने के लिये बहुत समझाया पर कुछ भी असर न हुआ। तब उन्होंने सोचा कि इसकी मनोभूमि इतनी निर्मल नहीं है जो अपने चिरकाल के संस्कारों को एक दम त्याग दे। इसलिये उन्होंने धीरे-धीरे बढ़ने का उपदेश देना उचित समझा। सोच विचार के बाद भगवान महावीर ने उस निषाद से क़हा-अच्छा भाई? कौए का मांस खाना तो छोड़ दोगे यह भी बड़ा धर्म है। निषाद इसके लिये तैयार हो गया क्योंकि कौए का मांस खाने का उसे अवसर ही न आता था। जब त्याग का संकल्प कर लिया तो उसके मन में धर्म भावना जाग्रत हुई और धीरे-धीरे अन्य त्यागों को अपनाता हुआ कुछ दिन बाद बड़ा भारी धर्मात्मा, अहिंसा का पुजारी और महावीर का प्रधान शिष्य बन गया। 

अवतारी महापुरुष जिस जमाने में हुए हैं उन्होंने उस समय की परिस्थितियों का देश, काल, पात्र का बहुत ध्यान रखा हैं। अरब में जिस समय हजरत मुहम्मद साहब हुए थे उस समय वहाँ के निवासी अनेक स्त्रियाँ रखते थे उन्हें चाहे जब रखते चाहे जब निकाल देते थे, जब सन्तान बढ़ती और उसका पालन पोषण न कर पाते तो निर्दयता पूर्वक बच्चों को मार-मार कर फेंक देते, उपयोगी और अनुपयोगी पशुओं की अंधाधुंध हत्या कर देते थे। उन्हें धीरे-धीरे सुधारने के लिये हजरत ने चार स्त्रियाँ रखने की बालकों को न मारने की, जीव हत्या एक नियत संख्या में करने को शिक्षा दी। समय बीत जाने पर अब एक व्यक्ति को चार स्त्रियाँ रखने की आवश्यकता नहीं। देखने में वह शिक्षा अनावश्यक हो गयी पर उसके मूल में छुपा हुआ सत्य ज्यों का त्यों आवश्यक है। "अपनी आवश्यकताओं को घटाओ, भोगों को कम करो" यह सन्देश उस शिक्षा के मूल में था वह उद्देश्य करोड़ों वर्षो में भी परिवर्तित न होगा।

आप गंभीरता पूर्वक धर्मतत्व पर दृष्टिपात कीजिए और धर्म की उन नियम व्यवस्थाओं में कौन सी पवित्र और शाश्वत भावना काम कर रही है उसे ढूंढ निकालिए। सत्य शाश्वत है और कायदे, कानून, विचार व्यवस्था परिवर्तनशील है। इस ध्रुव सत्य को हृदयंगम करते ही धर्मों का आपसी विरोध-वैमनस्य दूर हो जाता है और सभी धर्म सत्य हैं एवं एक ही नींव पर रखे हुए हैं यह दृष्टिगोचर होने लगता है।

आप जिस सम्प्रदाय से निकट सम्पर्क रखते हैं उसका सूक्ष्म दृष्टि से, निष्पक्ष दृष्टि से, निष्पक्ष परीक्षक की भांति, खरे आलोचक की भांति निरीक्षण कीजिये। निस्सन्देह उसमें बहुत-सी बातें बहुत ही उत्तम होंगी क्योंकि हर सम्प्रदाय धर्म का सहारा लेकर खड़ा हुआ है। उसमें कुछ अच्छाई अवश्य ही होनी चाहिए। किन्तु यह भी निश्चय है कि समय की प्रगति के साथ उसमें कुछ न कुछ, निरुपयोगिता भी अवश्य आई होगी। यदि उस निरुपयोगिता को मोह वश छाती से लगाये फिरेगें तो आप, अपना बहुत बड़ा अहित करेंगे। दो दिन पूर्व जो भोजन तैयार किया था वह बहुत ही पवित्र उत्तम, स्वास्थ्य कारक था पर दो दिन पुराना हो जाने के कारण आज तो वह बासी हो गया। उसमें बदबू आने लगीं, स्वाद रहित एवं हानि कर हो गया। उस बासी भोजन को मोह वश यदि ग्रहण करेंगे तो अपने को रोगी बना लेगें। 

साम्प्रदायिक अनुपयोगी रीति- रिवाजों की परीक्षा कीजिये और उनका वैसे ही परित्याग कर दीजिये जैसे मरे हुए कुत्ते की लाश को घर से विदा कर देते हैं। पिछला कल बीत गया। अपनी बहुत सी आवश्यकता अनावश्यकताओं को वह अपने साथ समेट ले गया। आज तो आज की समस्याओं पर विचार करना है। आज के लिये उपयोगी नयी व्यवस्था का निर्माण करना है। एक समय में एक रिवाज उत्तम थी केवल इसीलिये वह सदा उत्तम रहेगी यह कोई तर्क नहीं है । हो सकता है कि ''एक समय नरमेध यज्ञ" होते हो परन्तु आज उनकी पुनरावृत्ति कौन करेगा? 

आदिम युग में मनुष्य के पूर्वज दिगम्बर रहते थे पर आज तो सभी को कपड़ों की आवश्यकता होती है। पहले लोहे और पत्थर से आग पैदा की जाती थी इसीलिये कोई दिया सलाई का बहिष्कार नहीं कर देता। अमुक नगर से अमुक नगर को पहिले पक्की सड़क न थी पर आज बन गयी है तो उस पर चलना पाप थोड़े ही कहा जायगा। आप बुद्धि बेच कर पिछले कल की हर बात के अन्ध विश्वासी मत बन जाइए अन्यथा अपने जीवन को दारुण दुःखों में फँसा लेगें। बन्द गड्ढे का पानी सड़ जाता है। कहीं ऐसा न हो कि रुढ़ियों के पोंगा पन्थी के गड्ढे में बन्द पड़ी हुई आपकी बुद्धि सड़ जाय और उसकी दुर्गन्ध से पास पडौ़सियों का सिर फटने लगे। 

सदैव अपनी चेतना को स्वच्छ रखिये। घर के कूड़े को जैसे रोज-रोज साफ किया जाता है वैसे ही धर्म साधना के लिये अनुपयोगी रीति रिवाजों की सदैव सफाई करते रहा कीजिये। उनके स्थान पर वर्तमान समय के लिए जिन प्रथाओं की आवश्यकता है उनकी आधार शिला आरोपित करने के लिये साहस पूर्वक आगे कदम बढ़ाया कीजिये।

आपको नाना जंजालों से भरे हुए मत-मतान्तरों को ओर मुड़कर देखने की जरूरत नहीं हैं क्योंकि उनमें से बहुत सी वस्तुऐं समय से पीछे हो जाने के कारण निरुपयोगी हो गई हैं, उनसे चिपके रहने का अर्थ यह होगा कि अपने हाथ-पाँव बाँध कर अपने को अन्धेरी कोठरी में पटक लिया जाय। आप किसी भी धर्म ग्रंथ, सम्प्रदाय या अवतार का अनादर मत करिए, भले ही आज उनके कई अंश निरुपयोगी हो गये हैं, पर एक समय उन्होंने सामाजिक सन्तुलन ठीक रखने के लिये सराहनीय कार्य किये थे। 

आप सभी धर्म-ग्रंथों संप्रदायों और अवतारों का आदर करिये और उनमें जो बातें ऐसी प्रतीत हो जिनकी उपयोगिता अब भी बनी हुई है उन्हें ग्रहण करके शेष को अस्वीकार कीजिए। हंस की वृत्ति ग्रहण करके दूध को ले लेना और पानी को छोड़ देना चाहिए।

सत् धर्म का संदेश है, कि हे ईश्वर के प्राण प्रिय राज कुमारो ! हे सच्चिदानन्द आत्माओ ! हे नवीन युग के निष्कलंक अग्रदूतों ! अपने अन्त: करण में ज्योति पैदा करो, अपने हृदयों के कषाय-कल्मषों को मथ कर निरन्तर धोते रहो। अपने अन्दर पवित्रता, निर्मलता और स्वच्छन्दता को प्रतिक्षण स्थान देते रहो इससे तुम्हारे अन्दर ब्रह्मत्व जाग्रत होगा ऋषित्व उदय होगा ईश्वर की वाणी तुम्हारी अन्तरात्मा का स्वयं पथ प्रदर्शन करेगी और बतावेगी कि इस युग का क्या धर्म है? जब आप अनादि सत् धर्म को स्वीकार करते हैं तो इन नाना प्रकार के जंजालों से भरी हुई पुस्तकों की ओर क्यों ताकें? 

सृष्टि के आदि में जब सत् धर्म का उदय हुआ था तो जीवों का पथ-प्रदर्शन उनकी अन्तरात्मा में बैठे हुए परमात्मा ने किया था। आपकी अन्तरात्मा स्वतन्त्र है ज्ञानवान है और प्रकाश स्वरुप है। वह आपको आप को स्थिति के अनुकूल ठीक-ठीक मार्ग बता सकती है। यह मत सोचिये कि आप तुच्छ अल्प और असहाय प्राणी हैं और आपको दृष्टि हीनों की तरह किसी की उंगली पकड़ कर ले चलने वाले की जरूरत है। ऐसा विचार करना आत्मा के ईश्वरीय अंश का तिरस्कार करना होगा।

धर्म अधर्म् का निर्णय करने के लिये सद्बुद्धि आपको प्राप्त है। उस का निष्पक्ष होकर निर्भय उपयोग किया कीजिये। मत कहिऐ कि हमारी बुद्धि अल्प है, हमारा ज्ञान थोड़ा है। हो सकता है कि अक्षर ज्ञान की दृष्टि से आप पीछे हों, परन्तु सद्बुद्धि तो ईश्वर ने सबको दी है। वह आपके पास भी कम नहीं है। दीनता की भावना को आश्रय देकर आत्मा का तिरस्कार मत कीजिये। अपनी सद्बुद्धि पर विश्वास करिये और उसी की सहायता से आजके लिये उपयोगी रीति रिवाजों को स्वीकार कीजिये, यही सच्चा धर्म है।

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