Satya Darshan

महात्मा गांधी के 'आरोग्य की कुंजी' : अध्याय 'शरीर'

स्वास्थ्य | जुलाई 10, 2019

शरीर

शरीर के परिचय से पहले आरोग्य किसे कहते हैं, यह समझ लेना ठीक होगा। आरोग्यके मानी हैं तन्दुरुस्त शरीर। जिसका शरीर व्याधि-रहित है, जिसका शरीर सामान्य काम कर सकता है, अर्थात् जो मनुष्य बगैर थकानके रोज दस-बारह मील चल सकता है, जो बगैर थकान के सामान्य मेहनत-म़जदूरी कर सकता है, सामान्य खुराक पचा सकता है, जिसकी इन्द्रियां और मन स्वस्थ हैं, ऐसे मनुष्यका शरीर तन्दुरुस्त कहा जा सकता है। इसमें पहलवानों या अतिशय दौड़ने-कूदने वालों का समावेश नहीं है। ऐसे असाधारण बल वाले व्यक्ति का शरीर रोगी हो सकता है। ऐसे शरीर का विकास एकांगी कहा जायगा।

इस आरोग्य की साधना जिस शरीर को करनी है, उस शरीर का कुछ परिचय आवश्यक है......

प्राचीन काल में कैसी तालीम दी जाती होगी, यह तो विधाता ही जाने या शोध करने वाले लोग कुछ जानते होंगे। आधुनिक तालीम का थोडा-बहुत परिचय हम सबको है ही। इस तालीम का हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। शरीर से हमें सदा ही काम पड़ता है, मगर फिर भी आधुनिक तालीम से हमें शरीरका ज्ञान नहीं-सा होता है। 

अपने गांव और खेतों के बारे में भी हमारे ज्ञान के यही हाल हैं। अपने गांव और खेतों के बारे में तो हम कुंछ भी नहीं जानते, मगर भूगोल और खगोल को तोते की तरह रट लेते हैं। यहाँ कहने का अर्थ यह नहीं है कि भूगोल और खगोल का कोई उपयोग नहीं है, मगर हरएक च़ीज अपने स्थान पर ही अच्छी लगती है। 

शरीर के, घर के, गांव के, गांव के चारों ओर के, प्रदेश के, गांव के खेतों में पैदा होने वाली वनस्पतियों के और गांव के इतिहास के ज्ञान का पहला स्थान होना चाहिये। इस ज्ञान के पाये पर खड़ा दूसरा ज्ञान जीवन में उपयोगी हो सकता है।

शरीर पंचभूत का पुतला है। इसी से कवि ने गाया है :

पवन, पानी, पृथ्वी, प्रकाश और आकाश,
पंचभूतके खलसे बना जगतका पाश।।

इस शरीर का व्यवहार दस इन्द्रियों और मन के द्वारा चलता है। दस इन्द्रियों में पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं, अर्थात् हाथ, पैर, मुंह, जननेन्द्रिय और गुदा। ज्ञानेन्द्रियाँ भी पांच हैं- स्पर्श करने वाली त्वचा, देखने वाली आंख, सुनने वाला कान, सूंघने वाली नाक और स्वाद रस को पहचानने वाली जीभ। मन के द्वारा हम विचार करते हैं। कोई कोई मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहते हैं। इन सब इन्द्रियों का व्यवहार जब सम्पूर्ण रीति से चलता है, तब शरीर पूर्ण स्वस्थ कहा जा सकता है। ऐसा आरोग्य बहुत ही कम देखनेमें आता है।

शरीर के अन्दर के विभाग हमें चकित कर देते हैं। शरीर जगत का एक छोटा सा मगर सम्पूर्ण नमूना है। जो शरीर में नहीं है, वह जगत में भी नहीं है। और जो जगत में है, वह शरीरमें है। इसी से ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे' यह महत्त्वपूर्ण कथन निकला है। इसलिए अगर हम शरीरको पूर्णतया पहचान सकें, तो जगत को पहचान सकते हैं। 

मगर जब बड़े-बड़े डॉक्टर, वैद्य और हकीम भी इसे पूरी तरह नहीं पहचान पाये, तो हमारे जैसे सामान्य प्राणी भला किस गिनतीमें हैं? आज तक ऐसे किसी यन्त्र की शोध नहीं हो पाई, जो मन को पहचान सके। शरीर के अन्दर और बाहर चलने वाली क्रियाओं का विशेषज्ञ लोक आकर्षक वर्णन दे सके हैं। मगर ये क्रियायें कैसे चलती हैं, यह कोई बता सका है? मौत क्यों आती है, वह कब आयेगी, यह कौन कह सका है? अर्थात् मनुष्य ने बहुत पढ़ा, विचार किया और अनुभव लिया, मगर परिणाम में उसको अपनी अल्पज्ञताका ही अधिक भान हुआ है।

शरीर के अन्दर चलने वाली अद्भुत क्रियाओं पर इन्द्रियों का स्वस्थ रहना निर्भर करता है। शरीर के सब अंग नियमानुसार चलें, तो शरीर का व्यवहार अच्छी तहर से चलता है। एक भी अंग अटक जाय, तो गाड़ी चल नहीं सकती। उसमें भी पेट अपना काम ठीक तरह से न करे, तो शरीर ढीला पड़ जाता है। इसलिए अपच या कब्जियत की जो लोग अवगणना करते हैं, वे शरीरके धर्म को जानते ही नहीं। इन दो रोगों से अनेक रोग उत्पन्न होते है।

अब हमें सह विचार करना है कि शरीर का उपयोग क्या है?

हर एक च़ीज का सदुपयोग और दुरुपयोग हो सकता है । शरीर का उपयोग स्वार्थ के लिए, स्वेच्छाचार के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचने के लिए किया जाय, तो वह उसका दुरुपयोग होगा। किन्तु यदि उसी शरीर का उपयोग सारे जगत की सेवा के लिए किया जाय और इस हेतु से संयम का पालन किया जाय, तो वह उसका सदुपयोग होगा। आत्मा परमात्मा का अंश है। उस आत्मा को पहचानने के लिए अगर हम इस शरीर का उपयोग करते हैं, तो शरीर आत्मा के रहने का मन्दिर बन जाता है।

शरीर को मल-मूत्र की खान कहा गया है। एक तरह से इस उपमा में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है। परन्तु यदि शरीर केवल मल-मूत्र की खान ही हो, तो उसकी संभाल के लिए इतने प्रयत्न करना कोई अर्थ नहीं रखता। परन्तु इसी ‘नरक की खान' का सदुपयोग हो, तो उसे साफ-सुथरा रखकर उसकी संभाल करना हमारा धर्म हो जाता है। 

हीरे और सोने की खान भी ऊपर से देखने पर तो मिट्टी की खान ही लगती है पर उसमें हीरा और सोना है, इसलिए मनुष्य उस पर करोड़ों रुपये खर्च करता है और उसके पीछे अनेक शास्त्रज्ञ अपनी बुध्दिका उपयोग करते हैं तब आत्मा के मन्दिर-रूपी शरीर के लिए तो हम जितना भी करे उतना कम है।

हम इस जगत मे जन्म लेते हैं जगत के प्रति अपना "प्रण चुकाने के लिए, अर्थात् उसकी सेवा के लिए। इस दृष्टिबिन्दु को सामने रखकर मनुष्य अपने शरीर का संरक्षक बनता है। इसलिए शरीर की रक्षा के लिए हमें ऐसा यत्न करना चाहिये, जिससे वह सेवाधर्म का पालन पूरी तरहसे कर सके।

क्रमशः

पहला भाग, अध्याय : हवा

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