Satya Darshan

गुरु दत्त: जिस बेचैनी ने बनाया सितारा उसी ने उनकी जान ले ली

आकाश वर्मा | जुलाई 9, 2019

✍️जयंती विशेष

भारतीय हिंदी सिनेमा ने गुरु दत्त के समय अपना स्वर्णिम युग देखा. उनकी फिल्मों में एक बात थी.

वो आज की फिल्मों की तरह नहीं थीं, उनमें कलात्मकता थी, कहानी में एक गहराई थी, सच्चाई थी. और उन फिल्मों के लिरिक्स आपको अपना दीवाना बनाने के लिए काफी थे.

फूल और कांटे को अगर छोड़ दिया जाए, तो उनकी लगभग हर एक फिल्म अपने आप में सुपरहिट रही.

आज भी उनकी फिल्मों की दीवानगी देखी जा सकती है, जब उन्हें फ्रांस, जापान, जर्मनी जैसे देशों में दोबारा से रिलीज किया गया.

इनकी कुछ फिल्में कितनी बड़ी हिट रही होंगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म 'प्यासा' को टाइम पत्रिका की 100 फिल्मों की सूची 'बेस्ट फिल्म्स ऑफ आल टाइम' में शामिल किया गया था.

एक एक्टर के साथ-साथ फिल्म निर्माता, प्रोड्यूसर भी रहे गुरु दत्त साहब का 9 जुलाई को जन्मदिन है.

ऐसे में आइए उनके जीवन से जुड़ी कुछ और रोचक जानकारियों पर नजर डाल लेते हैं –

डांस सीखा, लेकिन एक्टिंग नहीं

9 जुलाई, 1925 को मैसूर में पैदा हुए गुरु दत्त या वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण अपने समय से आगे के व्यक्ति माने जाते थे. इनके पिता एक हेड मास्टर थे, वहीं, माता एक पार्ट टाइम लेखिका थीं.

जाहिरतौर पर कला और शिक्षा से इन्हें गहरा लगाव था, जिसकी प्रेरणा इन्हें अपने मां-बाप से ही मिली होगी.

इनकी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में हुई. और अपनी कला में रुचि के कारण ही इन्होंने उदय शंकर इंडिया कल्चर सेंटर से नृत्य कला की शिक्षा ली.

बचपन में घटी एक दुर्घटना के बाद वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण का नाम बदलकर गुरु दत्त रख दिया गया. बाद में, जब वह मुंबई चले गए, तो उन्होंने अपना पुराना नाम छोड़कर नया नाम गुरु दत्त हमेशा के लिए अपना लिया.

इसके कुछ साल बाद तक इन्होंने एक टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में काम किया. लेकिन कला को अपने अंदर संजोए रखा और एक मौके का इंतजार करते रहे.

और फिर 1944 में इन्हें वो मौका भी मिला, जब दत्त ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया. ये सबसे पहले प्रभात स्टूडियो में कोरियोग्राफर बने.

यहीं इनकी मुलाकात देव आनंद से हुई, जिसके बाद दोनों गहरे दोस्त बन गए.

मजे की बात ये है कि जिस तरह से इन्होंने डांस सीखा उस तरह से कभी एक्टिंग की क्लास नहीं ली.

गुरु दत्त ने 1950-1960 के दशक में सर्वोत्कृष्ट क्लासिक फिल्में दीं, जैसे कागाज़ के फूल, प्यासा, साहिब बीबी और गुलाम और चौदवी का चांद आदि.

कोठे पर क्यों गए थे गुरु दत्त साहब

गुरु दत्त ‘प्यासा’ फिल्म को कोठे की कहानी के आधार पर फिल्माना चाहते थे. लेकिन उन्हें वो कहानी मिल ही नहीं रही थी, न हीं वो कभी कोठे पर गए.

ऐसे में गुरु दत्त ने हिम्मत जुटाई और नोटों की एक गड्डी दबाए कोठे पर जाकर बैठ गए.

इन्होंने यहां देखा कि एक लड़की, जो कम से कम 7 महीनों की प्रेग्नेंट थी, लोगों के सामने अपना नाच दिखा रही थी. लोग थे कि उसे नचाए जा रहे थे और वो थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी.

ऐसे में गुरु दत्त से रहा न गया और वो नोटों की गड्डी अपनी जगह रखकर बाहर आ गए.

इसके बाद उनकी ये फिल्म तो कोठे पर आधारित नहीं रही, लेकिन इसका एक गाना जरूर कोठे के सीन पर फिल्माया गया था. जिसके बोल थे, "जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं..."

गीता से शादी और वहीदा से प्यार

1951 में आई फिल्म 'बाजी' के सैट पर गुरु दत्त की मुलाकात उस समय की मशहूर गायिका गीता रॉय से हुई. इस पहली ही मुलाकात में गुरु दत्त उन पर अपना दिल हार बैठे.

बात आगे बढ़ी तो मुलाकातों का दौर शुरू हुआ. अक्सर गुरु दत्त गीता से मिलने और कई बार अपनी लंबी गाड़ी में बैठकर गीता भी गुरु दत्त से मिलने उनके घर आया करती थीं.

दोनों के प्रेम को आगे बढ़ाने में गुरु दत्त की छोटी बहन ललिता लाजमी का बड़ा हाथ था. असल में ललिता गुरु दत्त के प्रेम पत्र उनकी मंजिल पर पहुंचाया करती थीं.

बहरहाल, दोनों प्यार का इकरार कर चुके थे, लिहाजा 1953 में गुरु दत्त और गीता रॉय की शादी हो गई.

1957 में आई इनकी फिल्म 'प्यासा' के सैट पर गुरु दत्त अभिनेत्री वहीदा रहमान पर फिदा हो गए. उनके बीच भी प्यार के अक्स बुने जाने लगे.

हालांकि, 1946 में आई फिल्म 'हम एक हैं' के सैट पर ही गुरु दत्त की मुलाकात रहमान से हो गई थी. लेकिन तब वो हिंदी सिनेमा में इनका शुरूआती दौर था. 

बहरहाल, वहीदा रहमान से बढ़ती इनकी नजदीकी के कारण गीता और उनके प्यार में कमी आने लगी, जिससे दूरियां बढ़ने लगीं.

एक तरफ जैसे-जैसे गुरु दत्त वहीदा के प्यार में गिरते जा रहे थे, वैसे-वैसे उनकी दूरी गीता से बढ़ती जा रही थीं. और फिर एक दिन दोनों में झगड़ा हुआ और उनके बीच बातचीत बंद हो गई.

उसके बाद गीता इनसे हमेशा के लिए दूर हो गईं.

बेटी से मिलने की बेचैनी ने दी मौत!

10 अक्तूबर, 1964 की रात गुरु दत्त को बेचैन कर रही थी.

पत्नी गीता से दूर होने के बाद उन्होंने शराब पीनी शुरू कर दी थी. सो उन्होंने अपने दोस्त अबरार अल्वी के साथ पैग लगाए.

अबरार अक्सर गुरु दत्त से मिलने घर आते थे. इस रात भी उन्होंने फिल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ पर उनसे चर्चा की. रात बढ़ी तो उन्होंने अपनी गीता को फोन लगाया. दरअसल वह अपनी बेटी से बात करना चाहते थे.

काफी समय हो चुका था, वह अपनी बेटी से जो नहीं मिले थे. एक बाप के लिए ये समय एक लंबा अरसा था. उनकी लड़की अब ढाई साल की हो चुकी थी.

गीता ने फोन उठाया कि तुरंत ही बेटी से मिलने को आतुर एक बाप अपनी पूर्व पत्नी के आगे मिन्नतें करने लगा.

हालांकि, गीता पर इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ा. और उन्होंने छूटते ही गुरु दत्त को मना कर दिया. इस पर गुरु दत्त गीता से बोले कि "मेरी बेटी को भेजो, वरना तुम मेरा मृत शरीर देखोगी."

लेकिन इस धमकी के बाद भी गीता का मन नहीं पसीजा और उन्होंने निहायत ही बाप को एक बेटी से मिलने ही नहीं दिया.

उस रात ये फोन उनके बीच लड़ाई का एक मैदान जैसे बन गया था.

बहरहाल, गीता से नाराज गुरु दत्त ने फोन पटक दिया.

गुरु दत्त तो पहले ही नशे में थे, इस जवाब ने उन्हें और नशे के लिए बेचैन कर दिया. वह और शराब पीने लगे. उस रात उन्होंने इतनी शराब पी, जितनी पहले कभी नहीं पी थी.

गुरु दत्त अक्सर अबरार के साथ मरने के तरीकों पर बात किया करते थे. उन्हें क्या पता था कि वो इसे सच में आजमा लेंगे. उन्हें इस बात पर कतई विश्वास नहीं हुआ कि जिस दोस्त के साथ उन्होंने रात को शराब पी थी, वह अगले दिन मौत को गले लगा लेगा.

सच, ये तो गीता ने भी नहीं सोचा होगा, कि गुरु दत्त की धमकी सत्य थी.

बहरहाल, दोस्त के घर से जाने के बाद उस रात वो अकेले घर पर अपनी बेटी और सच्चे प्यार के लिए तरसते रहे.

और फिर 39 साल की उम्र में बहुत सारी नींद की गोलियां खाकर हमेशा के लिए सो गए.

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