Satya Darshan

बच्चों की नाराजगी, पेरेंट्स की दुविधा

एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक युवा बच्चे आजकल बहुत ज्यादा संख्या में साइकोलौजिस्ट के पास जाने लगे हैं. इसे तनाव व दुश्चिंता की महामारी के रूप में देखा जा सकता है. आलम यह है कि ये युवा खुद को हानि पहुंचाने से भी बाज नहीं आते।

गरिमा पंकज | जुलाई 8, 2019

इस 4 जुलाई को राजधानी दिल्ली के वसंत विहार इलाके में 11वीं क्लास के एक बच्चे साहिल को पिता की डांट इतनी बुरी लगी कि उस ने आत्महत्या कर ली. उस के कमरे से एक पर्ची मिली है जिस पर लिखा है , सौरी मोम डैड. अपने इकलौते बेटे द्वारा आत्महत्या किये जाने से पूरा परिवार सदमे में है.

हुआ कुछ यों कि साहिल ने दो दिन पहले आनलाइन शापिंग साइट से ब्लूटूथ बुक करवाया था. बीते बुधवार को उस के पिता के फोन पर इस डिवाइस की डिलिवरी के लिए मेसेज आया तब उन्हें इस बुकिंग के बारे में पता चला. इस के बाद उन्होंने फोन पर ही अपने बेटे को डांट लगाई. उन्होंने साहिल से कहा कि अभी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. इतना महंगा ब्लूटूथ मंगवाने की क्या जरूरत थी.

इस बात से 16 वर्षीय साहिल इतना आहत हो गया कि उस ने अपने कमरे में खुद को फांसी लगा ली. घटना के समय साहिल की मां और बहन घर पर ही थे जब कि पिता अपने कालेज गए थे. पिता को जब आत्महत्या का पता चला तो वे उसे ले कर अस्पताल गए लेकिन वहां पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

इस तरह की घटनाएं आज के युवा और किशोर बच्चों के मन में चल रहे झंझावातों और पेरेंट्स के प्रति विद्रोह के भावों का खुलासा करती हैं.

ऐसा नहीं है कि साहिल ने खुदकुशी का फैसला पिता की केवल एक डांट के आधार पर ले लिया होगा. बल्कि उस के मन में काफी समय से कशमकश चल रही होगी. पिता के रवैयों के प्रति लम्बे समय से नाराजगी के भाव रहे होंगे. नतीजा यह हुआ कि उस डांट ने विद्रोह की चिंगारी को हवा दे दी और वह खुद को उस आग में झोंकने से रोक नहीं पाया.

देखा जाए तो यहां दोष न पिता का है और न ही बच्चे का है. दोष तो समझ में अंतर का है. एक पिता जब तक यह स्वीकार नहीं करेगा कि मेरे बच्चे की जिंदगी उस की अपनी है, उस के भविष्य की जिम्मेदारी भी उस की खुद की है , तब तक यह समस्या सुलझ नहीं सकती. पेरेंट्स होने के नाते पिता या मां बच्चे को सही दिशा दिख सकते हैं, उसे समझा सकते हैं मगर उस की जिंदगी पर अपना कंट्रोल नहीं जमा सकते.

बच्चे को अपनी जिंदगी खुद जीने दें. उसे एक पैरेंट के रूप में अपने हिसाब से चलाने का प्रयास न करें. बल्कि खुद फैसले लेने दें. उस पर कठोर अनुशाशन न रखें बल्कि कभीकभी ठोकर भी खाने दें ताकि वह अपनी गलतियों से खुद सबक ले.

कभीकभी उस के जज्बातों को समझने का भी प्रयास करें. वह आज के समय का है. उस की सोच को सिरे से नकारें नहीं बल्कि समय के साथ आगे बढ़ने दें. सही गलत का बेसिक अंतर जरूर बताएं मगर उसे अपने तरीके से जीने से न रोकें वर्ना एक असंतुष्टि के भाव मन में गहराते जाएंगे.

अमेरिका में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 11 से 12 वर्ष के बच्चों के पेरेंट्स सब से ज्यादा अकेले और परेशान पाए जाते हैं. इस उम्र में यानी टीनएज की शुरुआत में मां को बच्चों की वजह से सब से अधिक तनाव से गुजरना पड़ता है. एक मां को उस वक्त ज्यादा दुख नहीं होता जब बच्चे अपना अलग घर बना लेते हैं बल्कि दुख तब होता है जब वे मानसिक और भावनात्मक दूरी का एहसास कराते हैं.

किशोरावस्था के दौरान बच्चे और मातापिता के बीच का रिश्ता बड़े ही नाजुक दौर से गुजर रहा होता है. इस समय जहाँ बच्चे का साक्षात्कार नए अनुभवों से हो रहा होता है वहीँ भावनात्मक उथलपुथल भी हावी रहती है. इस उम्र में न केवल बच्चे के अंदर हजारों हार्मोनल चेंज होते हैं बल्कि वे उग्र और अपनी मर्जी चलाने वाले बन जाते हैं. वे खुद को साबित करने और अपना व्यक्तित्व निखारने की जद्दोजहद में लगे होते है. विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी बढ़ रहा होता है.

ऐसे में अगर आप जान लें कि आप के बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है तो इस स्थिति से निपटना शायद आप के लिए आसान हो जाएगा .जब भी समय मिले तो बच्चे के साथ समय बिताएं. उस से बातचीत करें. उस की भावनाओं को समझें उस की समस्याएं सुलझाने में अपना सहयोग दें.  तानाशाही रवैये के बजाय दोस्ताना व्यवहार रखें.

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