Satya Darshan

अनवर जलालपुरी: श्रीमद्भागवत गीता को उर्दू श़ायरी में ढालकर पाकिस्तान तक पंहुचाने वाला अज़ीम शायर

जयंती विशेष | जुलाई 6, 2019

“हम काशी काबा के राही, हम क्या जाने झगड़ा बाबा
अपने दिल में सबकी उल्फत, अपना सबसे रिश्ता बाबा

हर इंसां में नूर-ए-ख़ुदा है, सारी किताबों में लिखा है
वेद हो या इंजीले मोक़द्दस, हो कुरान कि गीता बाबा”

– अनवर जलालपुरी

‘यश भारती’ से सम्मानित उर्दू के मशहूर शायर! हिन्दू धार्मिक ग्रंथ ‘श्रीमद्भागवत गीता' का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले, उर्दू दुनिया की नामचीन हस्तियों में शुमार अनवर जलालपुरी मुशायरों की निजामत के बादशाह थे।

अनवर जलालपुरी ने ‘राहरौ से रहनुमा तक’, ‘उर्दू शायरी में गीतांजलि’ तथा भगवत गीता के उर्दू संस्करण ‘उर्दू शायरी में गीता’ पुस्तकें लिखीं, जिन्हें बेहद सराहा गया। उन्होंने ‘अकबर द ग्रेट’ धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे।

अनवर जलालपुरी का जन्म 6 जुलाई सन 1947 को जलालपुर, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ‘अनवर अहमद’ था। उन्होंने 1966 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक किया। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में और अवध विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में भी एम.ए. किया।

अनवर जलालपुरी का अहम काम ‘गीता’ को उर्दू शायरी में ढालने का है। ‘गीता’ के 701 श्लोकों को उन्होंने 1761 उर्दू अशआर में तब्दील किया है। इसकी कुछ बानगियाँ पेश करते हैं –

गीता श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्‌गोऽस्त्वकर्मणि।

उर्दू शायरी अनुवाद
सतो गुन सदा तेरी पहचान हो/कि रूहानियत तेरा ईमान हो
कुआं तू न बन, बल्कि सैलाब बन/जिसे लोग देखें वही ख्वाब बन
तुझे वेद की कोई हाजत न हो/ किसी को तुझ से कोई चाहत ना हो।

गीता श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत्।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मांन सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

उर्दू शायरी अनुवाद
फ़राएज़ से इंसा हो बेज़ार जब,हो माहौल सारा गुनहगार जब,

बुरे लोगों का बोलबाला रहे,

न सच बात को कहने वाला रहे,

कि जब धर्म का दम भी घुटने लगे,

शराफत का सरमाया लुटने लगे,

तो फिर जग में होना है ज़ाहिर मुझे..

जहां भर में रहना है हाज़िर मुझे!

बुरे जो हैं उनका करूँ खात्मा,

जो अच्छे हैं उनका करूँ में भला,

धरम का ज़माने में हो जाए राज,

चले नेक रास्ते पे सारा समाज

इसी वास्ते जन्म लेता हूँ मैं,

नया एक संदेश देता हूँ मैं

अनवर कहते थे ‘आज के दौर में जब इंसान-इंसान के खून का प्यासा हो रहा है, समाज में संवेदनशीलता ख़त्म होती जा रही है तब गीता की शिक्षा बेहद प्रासंगिक है। मुझे लगता था कि अगर शायरी के तौर पर इसे आवाम के सामने पेश करूं तो एक नया पाठक वर्ग इसकी तालीम से फ़ायदा उठा सकेगा।”

उन्होंने पहले 1982 में ‘गीता’ पर पीएचडी का रजिस्ट्रेशन कराया था। जब अध्ययन करना शुरू किया तो उन्हें लगा कि ये विषय बहुत बड़ा है। और शायद वे इसके साथ न्याय नहीं कर सकेंगे। चूंकि वे  कवि थे, इसलिए इसके श्लोकों का उर्दू में पद्य के रूप में अनुवाद करने की कोशिश करने लगे।

पहले इसमें उन्हें बहुत समय लगा, मगर फिर 10 सालों तक लगातार काम करने के बाद अनवर ने इस नामुमकिन से लगने वाले काम को मुमकिन कर दिखाया।

उनका यह भी कहना था कि- “साहित्य, दर्शन और धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करना शुरू से मेरी आदत में शुमार था। ‘गीता’ मुझे इसलिए अच्छी लगी क्योंकि इसमें दार्शनिक रोशनी के साथ साहित्यिक चाशनी भी है। इसकी तर्जुमानी के दौरान मैंने महसूस किया कि दुनिया की तमाम बड़ी किताबों में तकरीबन एक ही जैसा इंसानियत का पैगाम है। पूरी ‘गीता’ पढ़ने के बाद मैंने करीब 100 ऐसी बातें खोज निकालीं, जो क़ुरान और हदीस की हिदायतों से बहुत मिलती-जुलती हैं। मतलब साफ है कि अपने वक्त की आध्यात्मिक ऊंचाई पर रही शख्सियतों की सोच तकरीबन एक जैसी ही है। हम जिस मिले-जुले समाज में रह रहे हैं, उसमें एक-दूसरे को समझने की जरूरत है। मगर दिक्कत ये है कि हम समझाने की कोशिश तो करते हैं, मगर सामने वाले वो बात समझना नहीं चाहते हैं।”

2 जनवरी, 2018 को मस्तिष्क में आघात लगने से 70 वर्ष की आयु में अनवर जलालपुरी की मौत हो गयी। मौत से पहले वे उर्दू में ढली ‘गीता’ की शायरियों की ऑडियो सीडी लगभग बनवा चुके थे, जिसे भजन सम्राट अनूप जलोटा ने अपने सुरों से सजाया और पाकिस्तान जाकर गाया भी!

अनवर जलालपुरी की मौत से जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ, वो ये कि मुशायरे का टीचर चला गया। एक टीचर के तौर पर वे हमेशा यही चाहते थे कि मुशायरे का स्तर ख़राब न होने पाए। मुशायरा सांप्रदायिकता या अश्लीलता की तरफ न जाये। वे एक संचालक के तौर पर नहीं बल्कि एक टीचर की तरह मुशायरे को चलाते थे। कभी किसी ने ख़राब शेर पढ़ा, गलत वाक्य बोला, तो वहीं टोक दिया। पर इतनी सख्ती के बावजूद उर्दू की दुनिया उनसे बच्चो की सी मोहब्बत करती थी। शायद इसलिए क्यूंकि ताउम्र उन्होंने भी प्यार बांटने के अलावा और कुछ नहीं किया!

“तुम प्यार की सौगात लिए घर से तो निकलो
रास्ते में तुम्हें कोई भी दुश्मन न मिलेगा”
– अनवर जलालपुरी

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