Satya Darshan

6 जुलाई, विश्व जूनोसिस दिवस : जागरूकता है आज की जरुरत

दिवस विशेष | जुलाई 6, 2019

आज छह जुलाई को विश्व भर में जूनोसिस दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का उद्देश्य पशुजन्य रोगों की विकराल समस्या के प्रति विश्व भर में जागरूकता फेैेलाना है।

आज से 140 वर्ष पूर्व छह जुलाई 1885 को फ्रांंस में लुई पाश्चर ने पहला टीका नौ वर्ष की आयु के एक बच्चे जोसेफ मीस्टर को लगाया था जिसे एक रेबीज़ग्रस्त कुंत्ते ने काट लिया था। उसी टीके से उस बच्चे की जान बची और लुई पाश्चर का नाम चिकित्सा के इतिहास में अमर हो गया। इसी परिप्रेक्ष्य में छह जुलाई को जूनोसिस दिवस मनाया जाता है।

रोगों का पशु-पक्षियों से मनुष्यों में संक्रमण या तो सीधे सम्पर्क से होता है (जैसे कुत्ते के काटने से रेबीज़), या सान्निध्य से (जैसे पशुपालन या अन्य ऐसे कार्यों सें) या संक्रमित माॅस खाने या जल पीने आदि से। मांंसाहारी भोजन तो इन रोगों के संक्रमण का मुख्य श्रोत है ही।

चिकित्सकीय अनुसंधान के आंकड़ों के आधार पर माना जाता है कि अब तक जितने भी रोग मनुष्यों में पाये गये हैं, उनमें लगभग 61 प्रतिशत पशुजनित हैं। साधारण रोग जैसे जुखाम, बुखार, फ्लू, चर्मरोग जैसे दाद खुजली आदि से लेकर प्राणघातक रोग जैसे प्लेग, टीबी, आदि और विनाशकारी महामारियांं जैसे प्लेग, एवियन फ्लू आदि सभी पशुजनित रोग ही हैं। यहां तक कि एड्स रोग भी मूलतः पशुजनित रोग ही है ।

जिन पशुओं को पालनपोषण किया जाता है जैसे पालतू कुत्ते, मवेशी आदि उन्हें तो टीके इत्यादि लगाकर कुछ विशिष्ट बीमारियों के संक्रमण से बचाया जा सकता है, किन्तु स्वछंद विचरण करने वाले सभी पशुंपक्षी और सभी वन्यजीव अनेक रोगों के वाहक होते हैं। 

वन्यजीवों को तो पशुजनित रोगों के जीवाश्मों का भण्डार माना जाता है। अफ्रीकीय महाद्वीप में वन्यजीवों के मांस का व्यवसाय, जिसे बुशमीट कहा जाता है, के प्रचलन के कारण ही अनेक महामारियां फैेली हैं।

जब से पशुजनित रोगों के विषय में जानकारी होती गयी, समय-समय पर इनके संक्रमण को रोकने के लिए कदम उठाये गये । 19वीं सदी में और 20वी सदी के प्रारम्भ में जब मोटर गाड़ियों का प्रचलन नहीं हुआ था, और घोड़ों का प्रयोग यातायात में बहुत अधिक होता था, घोड़ों में कुछ अत्यधिक संक्रामक रोग जैसे ग्लैण्डर्स, फार्सी, ड्यूरीन आदि होते थे जिनकी रोकथाम के लिए ब्रिटिश सरकार ने ग्लैण्डर्स एण्ड फार्सी अधिनियम, 1899 और तत्पश्चात ड्यूरीन अधिनियम, 1910 पारित किया जिसमें संक्रमित घोडों को नष्ट करने और उनके स्वामियों को उचित धनराशि देने का प्राविधान था। 

वर्ष 2009 में भारतीय संसद ने पशु संक्रामक और संसर्गजन्य रोग निवारण एवम् रोकथाम अधिनियम, 2009 पारित किया जो अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन के लिए और विशेषकर भारत से पशुओं से सम्बन्धित निर्यातों को बनाये रखने के लिए आवश्यक हो गया था।

किन्तु बढ़ती जानकारी और जागरूकता के बावजूद पशुजन्य रोग बढ़ते ही जा रहे हैं । इसके पीछे बढ़ता पर्यारण प्रदूषण और पारिस्थितिकी प्रणालियों (इकोसिस्ट्म्स) का विनाश प्रमुख कारण है। आबादी बढ़ने और वनों के कम होने की वजह से जंगली पशु, मच्छर और कीट भी इन्सानी सभ्यता के और भी निकट आते जा रहे हैं। आये दिन सुनने में आता है कि शेर, भेड़िये, तेन्दुए आदि गांव में घुस गये और लोगों को मार दिया या घायल कर दिया। नतीजतन, पशु रोगों के प्रसार की सम्भावनाएंं बढ़ती जा रही हैं।

वैश्वीकरण भी पशुजन्य रोगों के संक्रमण का एक बड़ा कारण है। पहले किसी एक देश या महाद्वीप की अपनी बीमारियाॅं और अपनी औषधियाॅं होती थीं जो वहीं की सभ्यता तक सीमित रहती थीं। आज वैश्वीकरण की वजह से लोगों की यात्राएंं व स्थान परिवर्तन इतने बढ़ गये हैं कि वे अपने साथ अपनी सभ्यता, संस्कार व ज्ञान ही नहीं, रोग संक्रामक जीवाश्म भी ले जाते हैं।

समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि पशुजन्य रोग भारी मात्रा में मौत और सामाजिक कष्ट का कारण बन रहे हैं। माना जाता है कि रेबीज जो कि टीका निवारणीय रोग है से अभी भी विश्व भर में लगभग 160 लोग प्रतिदिन मरते हैं। इन बीमारियों से विकसित और विकासशील दोनों ही अर्थव्यवस्थाओं पर भयानक दुष्प्रभाव पड़ रहा है। 2014-15 में बर्ड फलू की वजह से अमरीका में 48 मिलियन पक्षियों को मारा गया था और 3.3 बिलियन यूएस डालर का नुकसान हुआ था।

कृषि-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में पशुजन्य रोगों से अत्यधिक आर्थिक क्षति होती है क्योकि पशुधन आय का मुख्य श्रोत होता है। हमारा देश भारत कृषिप्रधान देश है और हमारी 80 प्रतिशत ग्रामीण जनता पशुओं के सान्निध्य में रहती है। विश्व स्वास्थय संगठन के अनुसार भारत में 60 प्रतिशत नई बीमारियां पशुजन्य हैं।

चिन्ता का विषय यह है कि कई जूनोटिक बीमारियाॅं जो लुप्तप्रायः हो चुकी थीं, वो भी अब पुनः लौट कर आ रही हैं जिनके लिए नये टीकों का विकास आवश्यक हो गया है। चिकित्सकों का मानना है कि भारत की जनता अभी कुछ विशिष्ट पशुजन्य रोग जैसे रेबीज आदि के प्रति ही जागरूक है किन्तु अन्य पशुजन्य रोगों के विषय में अभी भी जागरूकता का अभाव है जिसके कारण पशुजन्य रोगों के संक्रमण का निवारण नहीं हो पा रहा है।

पशुओं से संक्रमित होने वाले कुछ प्रमुख रोग हैं 

हाथी - टयूबरक्युलोसिस

चमगादड़ - रेबीज़ वाहक, वायरल संक्रमण

बिल्ली - कौजेटिव प्लेग, एन्थ्रैक्स, काउपाक्स, टेपवर्म, बैक्टीरियल संक्रमण

कुत्ते - प्लेग, टेपवर्म, रेबीज़, लाइम रोग

घोडें - एन्थ्रैक्स, रेबीज़, साल्मोनेला

सुअर - टेपवर्म, एन्थ्रैक्स, इन्फलूयेन्ज़ा, रेबीज़

बकरी/भेड़ - रेबीज़, बैक्टीरियल व वायरल इन्फेक्शन

खरगोश - क्यू फीवर

पक्षी - एवियन फ्लू

इस रोगों की रोकथाम के लिए आवश्यक है कि हम सब इन रोगों के संक्रमण के प्रति जागरूक हो जायें और अपनी जीवनशैली में आवश्यक सुधार करें। अपने घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों, आदि को स्वच्छ और प्रदूषण रहित रखें, मांसाहारी भोजन को अच्छे से पकायें, पेयजल की स्वच्छता का ध्यान रखें, भोजन और जल को सदैव ढक कर रखें, और विशेषकर मांसाहार करने के लिए सभी आवश्यक सावधानियां बरतें, पालतू पशुओं को आवश्यक टीके लगवायें और उनसे अनावश्यक सान्निध्य से बचें।

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