Satya Darshan

अदालती झंझट से बचने के लिए व्यापक शिक्षा नीति बनाना जरूरी

शिक्षा | जुलाई 6, 2019

यह वह समय है, जब युवा पेशेवर कॉलेजों में प्रवेश के लिए कड़ी भागदौड़ करते हैं। इससे यह एक तरह का अकादमिक दंगल बन जाता है। जल्द ही यह दंगल शैक्षणिक संस्थानों की जगह अदालतों में पहुंच जाएगा। यह स्थिति तीन दशकों से अधिक समय से बनी हुई है।

वर्ष 1989 में उच्चतम न्यायालय ने लिखा, 'भारतीय सभ्यता में शिक्षा को मानव समाज के पवित्र कर्तव्यों में से एक माना गया है। शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन को धार्मिक एवं परोपकारिता का काम माना जाता है। भारत में शिक्षा कभी बिक्री की वस्तु नहीं रही।' यह बात तब कही गई, जब बेंगलूरु के एक निजी मेडिकल कॉलेज ने एक छात्रा से कैपिटेशन फीस के रूप में 60,000 रुपये मांगे थे। 

अब समय इतना बदल गया है कि शिक्षा बड़ा कारोबार बन गई है। उच्चतम न्यायालय ने भी धीरे-धीरे यह हकीकत स्वीकार कर ली है। हाल के फैसलों में उच्च शिक्षा को परोपकारिता नहीं बल्कि व्यापार एवं कारोबार करने के अधिकार का हिस्सा माना गया है। राजनेता और उद्यमी अपने पेशेवर कॉलेजों को अपनी प्रतिष्ठा के तमगे के रूप में पेश करते हैं।

ऐसी बहुत सी वेबसाइट हैं, जो आपको सलाह देती हैं कि कैसे 10 कदम उठाकर 10 लाख डॉलर का शिक्षा कारोबार शुरू किया जा सकता है। इसके नतीजतन अदालत विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं से अटी पड़ी हैं। हाल में उच्चतम न्यायालय के अवकाश पीठों ने दो फैसले दिए हैं। ये इस बात की चेतावनी देते हैं कि प्रवेश सीजन खत्म होने और अदालतों के गर्मियों की छुट्टियों के बाद फिर से खुलने के बाद याचिकाएं बड़ी तादाद में आएंगी। 

अदालतों के सामने सबसे गंभीर मुद्दा मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की गुणवत्ता है। नियामक स्तरहीन या नाम मात्र के कॉलेजों को मान्यता दे देते हैं। प्रबंधन पूरे पाठ्यक्रम के लिए 1 करोड़ रुपये तक वसूल लेते हैं। वे छात्रों की स्वीकृत संख्या से अधिक को प्रवेश दे देते हैं। इससे भ्रष्टाचार पैदा होता है।

पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था कि अपात्र मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को हटाया जाए। हालांकि पेशेवर कॉलजों को लेकर बड़ी तादाद में फैसले आते हैं, लेकिन इनमें एकरूपता नहीं है। ये आदेश केवल तदर्थ हैं, जो केवल उस सीजन में किसी विशेष संस्थान की समस्या को सुलझाते हैं। 

इसलिए पहले के आदेशों का हवाला देते हुए और अधिक याचिकाएं दायर की जाती हैं और पुरानी याचिकाओं पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। स्पष्टीकरण आदेशों में दशकों पहले के आदेशों को देखा जाता है, इसलिए यह वकीलों के लिए कमाई का अच्छा जरिया होता है। जो छात्र निचले ग्रेड के कॉलेजों में प्रवेश लेते हैं, वे आम तौर पर एक नपा-तुला जोखिम लेते हैं। उनका पाठ्यक्रम में बने रहना संयोग की बात है। उच्चतम न्यायालय ने कुछ मामलों में उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करने की मंजूरी दी है, लेकिन कुछ अन्य में प्रबंधन को हर्जाने के रूप में भारी राशि लौटाने को कहा गया। 

पिछले दिनों फाउंडेशन फॉर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट बनाम एआईसीटीई मामले के फैसले में कहा गया कि इस शैक्षणिक संस्थान ने ज्यादा सीटों की मांग की थी, लेकिन इसकी मंजूरी नहीं दी गई। इसके बावजूद कॉलेज ने स्वीकृत सीटों से अधिक तादाद में छात्रों को प्रवेश दिया। इसके बाद प्रबंधन अतिरिक्त सीटों की मंजूरी हासिल करने के लिए अदालत गया और उसने किए जा चुके निवेश और डॉक्टरों की कमी का हवाला दिया। अदालत ने शुरुआत में कॉलेज को 4 करोड़ रुपये जमा कराने का निर्देश दिया। एआईसीटीई ने अपने स्तर पर नियमों के उल्लंघन के लिए कॉलेज पर 23 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

अदालत ने बढ़ी सीटों को यह कहते हुए मंजूरी दी कि कॉलेज ने अवैध रूप से अतिरिक्त छात्रों को प्रवेश कर उनके करियर को जोखिम में डाल दिया है। असल में कॉलेज को हल्की सजा देकर छोड़ दिया गया, जबकि ज्यादा कड़ी सजाएं देने का विकल्प मौजूद था। प्रभावित छात्रों के प्रति उदारता दिखाते हुए उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करने और डिग्री हासिल करने की मंजूरी दी गई। 

एजुकेशन प्रमोशन सोसाइटी बनाम भारत संघ के दूसरे मामले में पेशवर कॉलेजों की शीर्ष संस्था ने खाली सीटों का हवाला देते हुए काउंसिलिंग के लिए ज्यादा समय मांगा। अदालत ने पाया कि प्रवेश के लिए समय सीमा तय करने में कोई निरंतरता नहीं है और ऐसी अनियमितताओं का बहुत से निजी प्रबंधन फायदा उठा रहे हैं। वे अपात्र छात्रों को प्रवेश देते हैं और भारी फीस वसूलते हैं।

अदालत ने कहा कि अगर कुछ सीट खाली रह जाती हैं तो उसे मदद नहीं दी जा सकती है।  उच्च पेशेवर शिक्षा को व्यवस्थित बनाने के लिए नई सरकार में दृढ़ इच्छाशक्ति होना जरूरी है। उसे अत्यधिक दबाव का सामना करना पड़ेगा क्योंकि शिक्षा कारोबार से बनाया जाने वाला दागी पैसा उस सहायक नदी के समान है, जो राजनीति और चुनावी प्रक्रिया रूपी मुख्य नदी में जाकर गिरता है। अदालत प्रवेश और संस्थानों की मान्यता से संबंधित विवादों में फैसले देती हैं, लेकिन एक व्यापक नीति बनाना और उसे लागू करना सरकार का काम है। 

 

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