Satya Darshan

संसद से सड़क तक जै श्रीराम

राम के हिन्द में जिस तरह की शर्मनाक, हिंसक, अमानवीय और वीभत्स घटनाएं घट रही हैं, वह न तो सभ्य समाज के लिए ठीक हैं और न ही लोकतन्त्र के लिए. कहना गलत नहीं होगा कि लोकतन्त्र पर धीरे-धीरे भीड़तन्त्र हावी होता जा रहा है।

संपादकीय | जुलाई 5, 2019

तुलसीदास ने लिखा था- सिया राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी, अर्थात संसार के हर प्राणि में राम बसते हैं, इसलिए हर प्राणी को हाथ जोड़ कर प्रणाम करना चाहिए…. प्राणिमात्र के लिए कितना सम्मान, कितनी करुणा, कितनी विनम्रता कि हर बन्दे में राम ही नजर आये. तुलसी ने सपने में भी न सोचा होगा कि हर जीव में दिखने वाले उनके राम इस भारत-भूमि पर एक दिन सत्ता, साम्प्रदायिकता और नफरत के हथियार के तौर पर नजर आएंगे.

संसद से सड़क तक उन्माद पैदा करने के लिए उनका इस्तेमाल होगा. संसद भवन के अन्दर विपक्षी पार्टी के नेताओं को चिढ़ाने, उकसाने और गुस्सा दिलाने की कोशिश में ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष गूंजेगा, तो सड़क पर दूसरे धर्म-जाति के लोगों को घेर कर उनकी हत्या करने के लिए भी श्रीराम को ही हथियार बनाया जाएगा! इस भारत-भूमि पर डर, तनाव और नफरत का वातावरण कायम करने के लिए श्रीराम का नाम लिया जाएगा!

उर्दू के ख्यात शायर अल्लामा इक़बाल अपने राम की तारीफ में लिख गये –  ‘इस देश में हुए हैं हजारों मलक-सरिश्त, मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द है, राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज, अहले-नजर समझते हैं उसको इमामे-हिंद…’ यानि दुनियाभर में जिसके नाम से हिन्दोस्तां का नाम है, जिसके नाम पर हिन्दोस्तां को नाज है, वह सिर्फ और सिर्फ श्रीराम हैं.

श्रीराम के प्रति श्रद्धा और भक्ति सिर्फ एक मज़हब या जाति तक सीमित नहीं थी, मगर आज यह सिर्फ एक धर्म की बपौती बन कर रह गयी है. इससे भी खतरनाक बात यह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम, जो एक योद्धा होते हुए भी सौम्यता की मूर्ति हैं, उनको एक गहरी साजिश के तहत हिंसा का आधार बना दिया गया है. आज ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष कानों में पड़ता है तो भक्ति और श्रद्धा जागृत नहीं होती, बल्कि रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ जाती है. राम का नाम आज भय का पर्यायवाची हो गया है. राम का नाम उबाल और गुस्से का कारण बन गया है.

राम का नाम प्राणिमात्र के बीच नफरत और साम्प्रदायिकता फैलाने की वजह बन गया है. राम के नाम को कटाक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्तमान संदर्भ में ‘जय श्रीराम’ उद्घोष के अर्थ ही बदल चुके हैं. तुलसी के मर्यादा पुरुषोत्तम, सौम्यता की मूर्ति आज के रामभक्तों की करतूतों से शर्मसार है. सांसदों की शपथ के समय लोकसभा में जय श्रीराम का नारा गूंजता है तो, झारखंड में सड़क पर तबरेज अंसारी को घेर कर उसकी हत्या पर आमादा भीड़ जय श्रीराम का नारा बुलंद करती है. सड़क से संसद तक ‘जय श्रीराम’ गुंजायमान है, मगर इस गूंज में भक्ति नहीं, बल्कि शक्ति का दम्भ सुनायी देता है. खुली धमकी कि जय श्रीराम बोलो, वरना दुनिया से विदा हो जाओ.

श्रीराम को हथियार बना कर भीड़शाही आज लोकशाही की हत्या पर उतारू है. संविधान के पुर्जे-पुर्जे बिखर चुके हैं. कानून की धज्जियां उड़ रही हैं. आरोप लगाने और सजा देने का हक भीड़ के हाथ में है. खादी और खाकी तमाशबीन बने हुए हैं.

ये कौन लोग हैं जो राम के नाम को बदनाम करने में जुटे हैं? ये कौन लोग हैं जो सोशल मीडिया पर झूठ, हिंसा, तनाव और अफवाहों का बाजार लगा कर बैठे हैं? ये कौन लोग हैं जो देश के बेरोजगार, असंतोष से घिरे, निराश और हताश युवाओं को बरगलाने, उकसाने और उनको हत्यारा बनाने की नापाक कोशिशें कर रहे हैं? ये कौन लोग हैं जिनके चेहरे सामने आने के बाद भी कभी पहचाने नहीं जाते? ये कौन लोग हैं जिनके खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं होता?

दरअसल ये सत्ता का वरदहस्त प्राप्त लोग हैं. इन लोगों को सब जानते-पहचानते हैं. ये सत्ता से लेकर सड़क तक मौजूद हैं. ये वे लोग हैं जिनका आचरण मर्यादा पुरुषोत्तम के आचरण से बिल्कुल मेल नहीं खाता है. ये वे लोग हैं जो लोकशाही के दुश्मन हैं. ये वे लोग हैं जो गरीबों के दुश्मन हैं. ये वे लोग हैं जो शान्ति, प्रेम, मर्यादा, सद्भाव, एकता और विकास के दुश्मन हैं. ये वे लोग हैं जो झूठे राष्ट्रवाद की आड़ में इस देश में तानाशाही चाहते हैं. ये वे लोग हैं जो भय का साम्राज्य स्थापित करके सबको अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहते हैं. यह वही लोग हैं जिन्होंने देश की सबसे बड़ी पंचायत में संविधान की गरिमा को रौंदते हुए एमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की शपथ-ग्रहण के दौरान जय श्रीराम के नारे लगाये. यह वही लोग हैं जिन्होंने 18 जून को झारखंड में पच्चीस साल के तबरेज अंसारी पर चोरी का आरोप लगा कर भद्दी गालियां दीं, खम्भे से बांधा और पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया. यह वही लोग हैं जो बीते पांच सालों से कभी गाय के नाम पर तो कभी श्रीराम के नाम पर देश भर में साम्प्रदायिक मूढ़ता से ग्रस्त भीड़ को उत्तेजित करके उन्हें क्रूरता और बर्बरता करने के लिए उकसा रहे हैं. यह वही लोग हैं जो भीड़ के हाथों अल्पसंख्यकों-दलितों-पिछड़ों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों को प्रताड़ित कर रहे हैं, उनकी हत्याएं करवा रहे हैं और अपना भय स्थापित करने के मंसूबों को लगातार परवान चढ़ा रहे हैं. ये वही लोग हैं जो विभिन्न रंगों की छटा और सुन्दरता का नाश करके महज एक रंग में चीजों को रंगा हुआ देखना चाहते हैं. ये वह लोग हैं जिनकी शह पर कानून हर हाथ का खिलौना हो गया है और पुलिस, अदालत और इंसाफ सिर्फ शब्द बन कर रह गये हैं.

साल 2014 से लेकर साल 2019 तक ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष करते हुए उन्मादित भीड़ ने सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया. ‘मौब लिंचिंग’ इस देश में पहले भी कई बार हुई है. कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं कि बलात्कार के आरोपी को भीड़ ने कोर्ट परिसर में ही पीट-पीट कर मार डाला, खाप पंचायतों में कितने लोग भीड़ के हाथों मार डाले गये, मगर उन घटनाओं और वर्तमान समय में हो रही मौब-लिंचिंग में बहुत फर्क है.

पहले जो घटनाएं हुईं, वह न्याय में देरी की वजह से, सामाजिक नियम तोड़े जाने की वजह से उत्पन्न जन-आक्रोश के चलते घटित हुईं, मगर आज जो हो रहा है वह एक धर्म-विशेष से ताल्लुक रखने वाले लोगों द्वारा दूसरे धर्म को डराने के उद्देश्य से किया जा रहा है. आज मौब लिंचिंग के शिकार लोगों में साठ फीसदी मुसलमान हैं, बीस फीसदी लोगों की जाति और धर्म का पता नहीं चला है, वहीं ग्यारह फीसदी दलित हैं, जो अपनी जानें गवां चुके हैं.

गोरक्षक रामभक्तों ने तो सिखों, दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों तक को नहीं छोड़ा है. ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाती उन्मादी और हत्यारी भीड़ सरेआम लोगों को मौत दे देती है मगर उसके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई, सारे अज्ञात हमलावरों में दर्ज हो जाते हैं.

20 मई 2015, राजस्थान में मीट शॉप चलाने वाले 60 साल के एक मुस्लिम बुजुर्ग को भीड़ ने लोहे की रौड और डंडों से पीट-पीट कर मार डाला. 2 अगस्त 2015 को उत्तर प्रदेश में कुछ गो रक्षकों ने भैंसों को ले जा रहे 3 लोगों को पीट पीटकर मार डाला. 28 सितंबर 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में 52 साल के मोहम्मद अख्लाक को बीफ खाने के शक में भीड़ ने ईंट और डंडों से मार-मार कर खत्म कर दिया. 14 अक्टूबर 2015 को हिमाचल प्रदेश में 22 साल के युवक की गो रक्षकों ने गाय ले जाने के शक में पीट-पीटकर हत्या कर दी. 18 मार्च 2016, लातेहर, झारखंड में मवेशियों को बेचने बाजार ले जा रहे मजलूम अंसारी और इम्तियाज खान को भीड़ ने पेड़ से लटकाकर मार डाला. 5 अप्रैल 2017 को अलवर राजस्थान में 200 लोगों की गोरक्षक फौज ने दूध का व्यापार करने वाले पहलू खान को मार डाला और अब राजस्थान पुलिस ने दिवंगत पहलू खान को ही आरोपी बना कर उसके खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में पेश की है. 20 अप्रैल 2017 को असम में गाय चुराने के इल्जाम में गो रक्षकों ने दो युवकों को पीट पीटकर मार डाला. 1 मई 2017 को असम में ही गाय चुराने के इल्जाम में फिर से गो रक्षकों ने दो युवकों को पीट पीटकर मार डाला. 12 से 18 मई 2017 के बीच झारखंड में चार अलग अलग मामलों में कुल 9 लोगों को मॉब लिंचिंग में मार डाला गया. 29 जून 2017 को झारखंड में बीफ ले जाने के शक में भीड़ ने अलीमुद्दीन उर्फ असगर अंसारी को पीट-पीटकर मार डाला. 10 नवंबर 2017 को अलवर, राजस्थान में गो रक्षकों ने उमर खान को गोली मार दी, जिसमें उसकी मौत हो गयी. 20 जुलाई 2018 को अलवर, राजस्थान में ही गाय की तस्करी करने के शक में भीड़ ने रकबर खान को पीट पीटकर मार डाला.

ये वह चन्द घटनाएं हैं जो मीडिया की सुर्खियां बनीं. कितनों की तो चर्चा ही नहीं हुई. हालिया 18 जून 2019 को झारखंड में चोरी का इल्जाम लगा कर तबरेज अंसारी को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया. पेशे से वेल्डर पच्चीस वर्षीय तबरेज ईद के मौके पर पुणे से अपनी पत्नी के पास घर आया था. दो महीने पहले ही उसका निकाह हुआ था. झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में भीड़ ने तबरेज को घेर कर मार डाला. डंडों से पीटते वक्त उससे ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ बोलने को कहा गया.

तबरेज ने श्रीराम को भी पुकारा और श्री हनुमान को भी, मगर फिर भी उसके जिस्म से जान खींच ली गयी. तबरेज के माता-पिता पहले ही दुनिया से विदा हो चुके थे और अब उसकी मौत के बाद उसकी उन्नीस साल की पत्नी इस दुनिया में बिल्कुल अकेली रह गयी है.

तीन तलाक के मामले पर मुस्लिम महिलाओं के हितों की इतनी ‘फिक्र’ करने वाली केन्द्र सरकार क्या कभी उन सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं की सुध लेगी, जिनके पतियों, भाइयों, पिताओं, बेटों को सत्ता की शह पाकर साम्प्रदायिकता के रंग में रंगी भीड़ ने ‘जय श्रीराम’ के नारों के बीच मौत के घाट उतार दिया?

राम के हिन्द में जिस तरह की शर्मनाक, हिंसक, अमानवीय और वीभत्स घटनाएं घट रही हैं, वह न तो सभ्य समाज के लिए ठीक हैं और न ही लोकतन्त्र के लिए. कहना गलत नहीं होगा कि लोकतन्त्र पर धीरे-धीरे भीड़तन्त्र हावी होता जा रहा है. ऐसी भीड़ जिसका एक हिस्सा आपराधिक मानसिकता, क्रूरता और बर्बरता का प्रदर्शन कर रहा है और दूसरा बड़ा हिस्सा मूक दर्शक और तमाशीन बना हुआ है.

भीड़ बेखौफ है. उसे कानून का डर नहीं है. उसे सजा का डर नहीं है. क्योंकि उसे सत्ता की शह मिल रही है. देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर जवाब देने के बजाय संसद में कहते हैं, ‘सबसे बड़ी लिंचिंग की घटना तो देश में 1984 में हुई थी.’ अपनी साजिश, अपनी नाकामयाबी और अपनी कमजोरियों को छिपाने का कितना सुन्दर तरीका है यह! आह!

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