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छत्तीसगढ़: 7 जनवरी, राजिम भक्तिन माता जयंती आज

राजिम भक्तिन माता जयंती 7 जनवरी को राजिम भक्तिन माता की याद में मनायी जाती है। राजिम भक्तिन माता जयंती विशेष रूप से छत्तीसगढ़ राज्य में मनायी जाती है। छत्तीसगढ़ राज्य का राजिम क्षेत्र राजिम माता के त्याग की गाथा से सराबोर है। कहावत है भगवान कुलेश्वर महादेव का आशीर्वाद राजिम क्षेत्र को मिला है।

राजिम का प्राचीन नाम पद्मावतीपुरी धाम था। बताया जाता है कि राजा रत्नाकर ने 100 सोमयज्ञ करवाया था। जिसमें से शुरू के 99 सोमयज्ञ विफल होने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वे 100वां सोमयज्ञ करवाएंगे। राजा रत्नाकर के दृढ़ निश्चय के फलस्वरूप ही उनका 100वां सोमयज्ञ सफल हुआ। 

जिस मानसरोवर में गजगृह के महासंग्राम के दौरान 100वें यज्ञ में सफलता मिली, उसी काल में भगवान राजीव लोचन ने गज और गृह का उद्घार कर राजा रत्नाकर को दर्शन दिया। 

राजा रत्नाकर ने भगवान से प्रार्थना की कि वे उन्हें इसी रूप में दर्शन दिया करें। उस समय से राजा रत्नाकर द्वारा भगवान की पूजा पाठ पूरी श्रद्घा-भक्ति के साथ किया जाने लगा। 

बताया गया है कि भगवान राजीव लोचन को इसी वजह से गजेन्द्र मोक्ष हरि अवतार भी कहा जाता है। 

इसी काल में राजा जगतपाल दुर्ग से भगवान राजीवलोचन के दर्शन-लाभ लेने प्रतिदिन राजिम आया करते थे।

उस समय राजिम तेलिन भगवान राजीव लोचन के ऊपर अपार श्रद्घा-भाव रखकर पूजा-पाठ करती थी। समय के साथ-साथ भगवान राजीव लोचन के ऊपर राजिम तेलिन की श्रद्घा-भक्ति बढ़ती गई। वह मंदिर में रहकर ही भगवान की सेवा करने लगी थी। 

भगवान राजीव लोचन के ऊपर सच्ची निष्ठा रखने व उनके पुण्य-प्रताप के कारण तेल के व्यवसाय में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती गई। भगवान के प्रति अपार सेवाभाव रखने व पुण्य-प्रताप के कारण ही आज पूरे देश में राजिम भक्तिन माता की अलग पहचान है। 

राजिम भक्तिन माता जयंती अवसर पर छत्तीसगढ़ के लाखों श्रद्धालु राजिम में एकत्र होते हैं। यह परंपरा सन 1992-93 से निरंतर जारी है और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 

बुजुर्गों के अनुसार पूर्व काल में भी बसंत पंचमी या रथ अष्टमी के दिन समाज के प्रमुख लोग पितईबंद के अमरैया में एकत्र होकर भक्तिन माता की शोभा यात्रा निकालते थे। उस परंपरा को पुनः 1993 में में 7 जनवरी को प्रारंभ किया गया था। 

हांलाकि यह कोई शास्त्रीय तिथि नहीं है। शास्त्रों में राजिम भक्तिन माता का कोई उल्लेख भी नहीं है लेकिन इतिहासकारों ने जनश्रुतियों का संकलन कर राजिमलोचन मंदिर में लगे कलचुरी राजा जगपाल देव (जो वास्तव में रतनपुर के कलचुरी राजा के सामंत थे) के शिलालेख के साथ भक्तिन माता की कहानी को जोड़ा था। 

जिसमें 3 जनवरी ईसवी सन 1945 को शिलालेख उकीर्ण कराया जाना उल्लेखित है।

साहू समाज पिछले कई वर्षों से राजिम भक्तिन तेलिन माता की जयंती पर भव्य आयोजन भी करता आ रहा है।

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