Satya Darshan

राहुल गांधी का राजनीतिक दाव, इस्तीफा !

कांग्रेस में यही इंटरव्यू और प्रति परीक्षण का खेल चल रहा है. अब यह तो तय है कि राहुल और प्रियंका दोनों ही राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहना चाहते. और देश का माहौल ऐसा बन गया है कि राहुल और प्रियंका हाशिए पर चले गए हैं।

सुरेश चंद्र | जुलाई 3, 2019

सत्रहवीं लोकसभा समर में, सत्ता की चाहत के साथ 19 माह से राहुल गांधी बड़ी बेताबी से प्रयासशील थे. यह सच है कि राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं जिस कांग्रेस का प्राचीन और 134 साल का समृद्ध इतिहास है. और जिस पर महात्मा गांधी का सर्वाधिक प्रभाव और छाया है. महात्मा जी साध्य और साधन के शुचिता की बात करते थे और जीवन में उसे उतारा भी,  इस एक मात्र सूत्र का मर्म अगर राहुल गांधी समझते तो कांग्रेस का उद्धार हो जाता. आज यह हालात नही होते.

मगर ऐसा प्रतीत होता है राहुल गांधी स्वयं और हर एक कांग्रेस मैन यह मानता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसे, इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा मानी जाती थी “राहुल ही कांग्रेस हैं, कांग्रेस का मतलब ही सिर्फ राहुल है ! ”

मगर ऐसा है नहीं, यह 17 वीं लोकसभा चुनाव परिणाम से आईने की भांति स्पष्ट हो गया है. अब हताश निराश राहुल गांधी ने इस्तीफा देने की पेशकश की है यह मामला देश दुनिया में चर्चा का बयास बना हुआ है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इस “नौटंकी” को कांग्रेस और देश हित में आपको समझना होगा. दरअसल कांग्रेस आजकल यह मानकर चलती है कि वह गांधी परिवार के बगैर शून्य है और सत्ता का स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकती. और चाहती है उसके नेता गांधी परिवार की कोई विभूती हो, मगर अब वह जादुई नेतृत्व, व्यक्तित्व कांग्रेस के पास नहीं है. परिणाम स्वरूप कांग्रेस ‘रूग्ढ’ हो चली है, यह बूढी कांग्रेस अब धीरे-धीरे चल रही है, ठिठक रही है, गिर रही है. और इसे भरपूर आक्सीजन चाहिए .

दूसरी तरफ “कांग्रेस” को राहुल गांधी और उनका परिवार अपने  पंजे से मुक्त  नहीं करना चाहता. राहुल गांधी का इस्तीफा, एक माह का समय और एक माह से कांग्रेस की निरंतर समीक्षा, प्रदेश अध्यक्षों पर बिजली का गिरना. यह संकेत देता है कि राहुल गांधी व श्रीमती सोनिया गांधी भरे मन से राजनीतिक परिदृश्य से बाहर  जा रहे हैं. यह नियति हो गई है. हालांकि चाहत नहीं है. आइए, कांग्रेस की इस नियति और आगामी राष्ट्रीय अध्यक्ष की खोज के मायने का विश्लेक्षण करें .

 क्या कांग्रेस एक पिट्ठू चाहती है !

आप वैष्णो देवी दर्शनार्थ कभी जाते हो तो  देखेंगे, आपको  पिट्ठू मिलते हैं वहां. यह शब्द सुनकर प्रतीत होता है जैसे घोड़े होते है, वैसे पिट्ठू होते होंगे. मगर ऐसा नहीं है. एक व्यक्ति होता है जो आपको अपनी पीठ पर बिठाकर के मां वैष्णो देवी का दर्शन कराने पैदल चल पड़ता है यह दृश्य देख हृदय काप जाता है. आदमी पर सवार आदमी.

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वमान्य नेता कांग्रेस के असीम आक्सीजन के स्रोत माने जाने वाले राहुल गांधी, श्रीमती सोनिया गांधी को भी आज कांग्रेस के लिए स्वयं के लिए एक पिट्ठू की आवश्यकता जान  पड़ती है. जो उन्हें अपने कंधे पर पीठ पर बिठा कर के सत्ता- सुंदरी के दर्शन करा दे.

राहुल गांधी ने 23 मई 2019 के परिणामों के पश्चात बैठक की और पार्टी नेताओं के समक्ष त्यागपत्र की घोषणा कर दी. जैसा कि होता है कांग्रेस की चिरपरिचित ‘कोटरी’ जिसका धंधा कांग्रेस की छत्रछाया में चल रहा है, वह नहीं चाहती. भले दिखावे के लिए ही सही वह गिड़गिड़ा कर कहती है, नहीं नहीं नहीं! आप इस्तीफा मत दीजिए.

कांग्रेस तो रसातल में चली जाएगी. देश का क्या होगा ? नरेंद्र मोदी एंड कंपनी तो यही चाहती है… ऐसे लाखों तर्क देकर, राहुल गांधी के मुंह से 1 माह का समय ले लिया जाता है.

अब राहुल गांधी, एक माह चिंतन करते हैं, उनका स्यापा कमजोर पड़ने लगता है. गम गलत होता है, तो आदमी दु:ख भूल जाता है और फिर घर परिवार की सार संभाल लेने लगता है. अब जो कांग्रेस में नाटक चल रहा है, वह यही सब नौटंकी है… देखिए कैसे राहुल और उनके अंध समर्थक कांग्रेस को राहुल मुक्त करने का छलावा दिखा कांग्रेस को उनकी कांख में दाब रखने की रणनीति बना रहे हैं.

राहुल की कलम से

अब कांग्रेस के सुप्रीम लीडर राहुल गांधी वही सब करेंगे जो श्रीमती सोनिया गांधी ने किया था. सोनिया गांधी जब लंबे समय तक कांग्रेस का नेतृत्व कर अस्वस्थ हो चली, तो उन्होंने अपने युवा पुत्र राहुल को पहले उपाध्यक्ष बनाया फिर अध्यक्ष बना दिया. कांग्रेस पार्टी में खूब तालियां बजी और मान लिया गया कि अब नये खून के उबाल से सत्ता पर हम काबिज हो जाएंगे. सत्ता सिहांसन अब दूर नहीं है.

दरअसल यहां भी कोई लोकतांत्रिक पद्धति का पालन नहीं हुआ. चुनाव तो दूर की बात है. वंशवाद का यह ऐसा नायाब नमूना है जिसे मैडम तुसाद  के अजायबघर में जगह मिलनी चाहिए. राहुल गांधी अब यह समझ गए हैं कि कांग्रेस को सिरे से छोड़ देना उनके लिए घातक होगा. इसलिए अब अपना उत्तराधिकारी खोज रहे हैं और नि:संदेह इसमें उनकी माता जी श्रीमती सोनिया गांधी की बेहतरीन सलाह उन्हें मिल रही है. आखिर राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ना चाहने के बाद भी अध्यक्ष पद का मोह क्यों नहीं छोड़ पा रहे हैं. क्यों चाहते हैं कि कोई रबड़ स्टांप, जो देश की एक गौरवशाली राष्ट्रीय पार्टी को चलाएं.

चुनाव करा दो सारा टंटा खत्म !

राहुल गांधी के इस्तीफे और कांग्रेस की दारुण स्थिति पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जसराज जैन तल्ख टिप्पणी करते हुए कहते हैं- “अगरचे कांग्रेस को प्राणवायु से स्तंभित रखना है तो नीचे से ऊपर तक अर्थात ब्लाक, जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक चुनाव कराने होंगे.”

हम देखें तो श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस को मरणासन्न करने की भूल की हैं. उन्होंने कांग्रेस का संविधान बदलकर दो वर्षों में होने वाले चुनाव को  पांच वर्षों में कराने का नियम बनाया, ताकि वे निष्कंटक अध्यक्ष बनी रहे. हर दो वर्षों का लफड़ा-टंटा खत्म हुआ.

मगर जब किसी तालाब का पानी रुक जाता है तो वहां संडाध पैदा हो जाती है. कांग्रेस में भी यही हुआ है. नीचे से ऊपर तक अपने चहेतों को लेकर पार्टी संगठन चल रहा है परिणाम स्वरूप यह एक धंधा बन गया है. राजे रजवाड़े और जमीदारी जैसा. यह चेहरे धीरे-धीरे पार्टी के लिए जहर बनते जा रहे हैं. अगर चुनाव हो तो सच्चे मन से कर्मठ और समर्पित कांग्रेसमैन सामने आ सकते हैं और इससे कांग्रेस को ऊर्जा मिलेगी.

फिर रिमोट कंट्रोल

दरअसल जैसा माहौल बन रहा है. उससे स्पष्ट है कि राहुल गांधी और उनका परिवार यह कतई नहीं चाहते कि कोई उनके संरक्षण, सरपरस्ती के बगैर कांग्रेस की कमान बागडोर संभाले. राहुल गांधी इस्तीफा तो देना चाहते हैं मगर चाहते हैं अध्यक्ष उनकी रिमोट से चले और इसी कारण एक- डेढ़ माह से इंटरव्यू का खेल चल रहा है.

यूपीए वन और टू की डा. मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी की रिमोट की सरकार कहा जाता है, यह इतिहास में दर्ज हो गया है. और सेल्यूलाइड पर  “एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री” अदद मूवी मनमोहन सिंह पर संजय बारू की किताब पर आधारित देश देख चुका है.

रिमोट कंट्रोल बुरा नहीं, मगर यह किसी परिवार का नहीं राष्ट्रहित का होना चाहिए. विकास और प्रगति का होना चाहिए. कांग्रेस अध्यक्ष की निष्ठा कांग्रेस के प्रति होनी चाहिए न कि राहुल और सोनिया गांधी के प्रति. अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस का क्षरण तय है और राहुल और सोनिया गांधी जैसा चाहते हैं वह भी शायद उन्हें नहीं मिलेगा. क्योंकि देश की जनता आपको देख रही है, समझ रही है अब देश की आवाम अपढ और गद्दापच्चीसी में नहीं जी रही है भाई.

राहुल सोनिया की चाहत

संभवत राहुल, सोनिया गांधी चाहते हैं ऐसा शख्स कांग्रेस अध्यक्ष बने जो उनके प्रति पूर्ण समर्पित हो, उनके चरण पादुका लेकर  कांग्रेस का राज काज संभाले, क्योंकि कल जब राहुल, सोनिया, प्रियंका चाहे तो भरत की तरह सम्मान उन्हें कांग्रेस का राजपाट सौप दे.

अब कांग्रेस को नया जीवन देने का कार्य अंजाम दिया जा रहा है, और इसके लिए गांधी परिवार के प्रति अंधनिष्ठा को सर्वोपरि गुण मानकर चयन प्रक्रिया जारी है. इसमें अशोक गहलोत के बाद अब पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का नाम सबसे ऊपर है. यह माना जा रहा है की शिंदे पूर्णरूप से श्रीमती सोनिया गांधी के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं .

अभी परिक्षण जारी है. कांग्रेस का भविष्य तय होने जा रहा है. मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास स्वयं को कभी-कभी दोहराता है अगर शिंदे,  सीताराम केसरी सिद्ध नहीं हुए तो कांग्रेस को प्राणवायु देने के लिए समर्थ हाथों की जरूरत है. जो कांग्रेस का वजन थाम सके और उसे मंजिल तक पहुंचाए.

View More

Search

Search by Date

जनमत

वाराणसी से पीएम मोदी लोस चुनाव 2019 जीतेंगे?

Navigation

Follow us

Mailing list

Copyright 2018. All right reserved