Satya Darshan

अस्वस्थता निवारण के अचूक उपाय

स्वास्थ्य | जुलाई 2, 2019

प्राकृतिक चिकित्सा के साधन 

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली रोग को दबाने या केवल ऊपरी उपचार या क्षणिक स्वास्थ्य में विश्वास नहीं करती। वह रोग के जड़ तक पहुँचती है और रोग का वास्तविक कारण दूर करती है। यह रोग की जड़ पर कुठाराघात करती है, अर्थात् वह यह प्रयत्न करती है कि शरीर में जो विष संचित हो गये हैं या जो विजातीय पदार्थ रोग का कारण बने हैं, उन आंतरिक विषों को दूर किया जाय और भविष्य में उत्पन्न न होने दिया जाये। प्राकृतिक चिकित्सा में जिन प्रयोगों को कार्य में लाया जाता है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं- (1) एनिमा द्वारा संचित मल और विषों को दूर करना (2) उपवास द्वारा शरीर में आकाश-तत्व की वृद्धि करना (3) फलाहार और शाकाहार द्वारा शरीर में आवश्यक लवण एवं विटामिनों की कमी पूर्ति करना (4) मिट्टी के प्रयोग (5) सेंक (6) शास्त्रीय मालिश (7) जल चिकित्सा (8) सूर्य किरण चिकित्सा (9) आसन और प्राणायाम (10) विचार शक्ति से रोग दूर करना (11) दुग्धकल्प (12) विश्राम। संक्षेप में हम इन सभी तत्वों पर विचार करेंगे।

प्राकृतिक चिकित्सा के तत्वों का विश्लेषण -

(1) एनिमा का प्रयोग- नब्बे फीसदी रोग आन्तरिक अस्वच्छता या कब्ज से होते हैं। मल कड़ा पड़ जाता है, आँतें सूख सी जाती हैं। भोजन में रुचि नहीं रहती, जीवन शुष्क सा रहता है, कोई भी स्वाद अच्छा नहीं लगता। ये सब लक्षण मौजूद हों तो आप समझ लीजिए कि आपको अंदरूनी सफाई की आवश्यकता है। सफाई के लिए दो अच्छे उपाय आपके पास हैं।

(1) यौगिक क्रियाएँ (2) एनिमा।

एनिमा से बिना किसी प्रकार की उत्तेजना तथा जलन के आँत की सफाई हो जाती है किन्तु केवल आँत का नीचे का हिस्सा ही साफ हो पाता है। इसमें जल के प्रयोग से स्नायु शक्ति बढ़ती है और बदन में स्फूर्ति एवं नई कार्य शक्ति का संचार होता है। अनेक बार देखा गया है कि एनिमा के सफल प्रयोग से सिर दर्द, बवासीर, साधारण बुखार, मियादी बुखार, आँव, डायरिया, अनिद्रा, आलस्य, उदासीनता, पायरिया, पेट का दर्द, अपेडिसाइटिस आदि रोगों का ठीक हो जाना साधारण सी बात है। जहाँ आँत में सड़ता हुआ संचित मल निकला और आँत साफ हुई, वहीं ये रोग ठीक हो गये। कब्ज के लिए तो एनिमा रामबाण है।

प्राकृतिक चिकित्सकों का मत है कि उपवास एवं एनिमा से जीर्ण, कब्ज आसानी से दूर किया जा सकता है। कब्ज सभी रोगों के मूल में रहता है। इसे दूर करने पर अनेक रोग अपने आप अच्छे हो जाते हैं।

एनिमा का प्रचार यूरोप में काफी हुआ है। हमारे यहाँ के वैद्यक के पाँच कर्षों (स्नेहपान, स्वेदन, वमन, विरेचन और वस्ति) में इसका उल्लेख है। हठयोग के छः कर्मों में वस्तिक्रिया भी है। वस्तिक्रिया के लाभ देखिये -

हठयोग प्रदीपिका में लिखा है “वस्तिकर्म के प्रभाव से गुल्म, प्लीहा, उदर (जलोदर) और वात, कफ, चित्त (इनके द्वन्द्व वा एक) के दोष से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं।”

“इससे सात धातुएँ, दश इंद्रियां और अन्तःकरण प्रसन्न होता है। मुख पर सात्विक कान्ति छा जाती है, जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है। वात, पित्त, कफ आदि दोषों की न्यूनता या अधिकता दूर होकर समता उत्पन्न हो जाती है।”

वास्तव में एनिमा के द्वारा शरीर की सफाई जितनी जल्दी हो सकती है, उतनी किसी दवाई से संभव नहीं है। जिसे ओज और बल चाहिए, कमजोर, दुर्बल, बड़े पेट वाले आदमियों के लिए यह अत्यन्त लाभप्रद है।

एनिमा के सम्बन्ध में कुछ बातें याद रखिये। कमजोर व्यक्ति लेटकर या पीठ के बल लेटकर एनिमा लें, एनिमा की नलिका को खोल कर पहले देख लें कि प्रवाह ठीक है या नहीं, नली को गुदाद्वार में प्रविष्ट कर कुछ इधर उधर घुमाएँ जिससे पानी अन्दर पहुँच जाय। एनिमा का जल साधारण गर्मी (शरीर के तापक्रम) का हो, उसमें साबुन घुली हो या ग्लिसरीन, रेडीं का तेल या और कोई चिकना पदार्थ घुला हुआ हो। पानी का परिमाण इस प्रकार बढ़ाना चाहिए-

1 वर्ष से 6 वर्ष तक पावभर पानी।

6 वर्ष से 12 वर्ष तक आध सेर से एक सेर तक

12 वर्ष से 20 वर्ष तक एक सेर से डेढ़ सेर तक

20 वर्ष से ऊपर ढाई सेर तक।

एनिमा की सावधानियाँ-

कभी-2 देखा गया है कि लोग एनिमा के आदी बनने लगते हैं। यह हानिकर है। आवश्यकता के समय, विशेषतः उपवास काल में, जब आप फलाहार या रसाहार कर रहे हों, तभी इसका प्रयोग करें। पूर्ण उपवास में तीन चार दिनों तक एनिमा का प्रयोग कर सकते हैं। तीव्र और जीर्ण (Chronic & Acute) रोगों में एनिमा का प्रयोग आवश्यक है। जिस रोगी की आँत बहुत सूख गई हो और मल पदार्थ सूख गये हों, उन्हें एनिमा को छोड़कर कोई लघु रेचन का प्रयोग करना चाहिए।

एनिमा लेने के आध घन्टे तक लेटकर आराम करना चाहिए, जल को पेट में रोकना चाहिये या पेट को मलना चाहिये। इधर-उधर करवट बदलने से जल आँतों की अच्छी सफाई करता है। भोजन बहुत हल्का लें, दूध का प्रयोग सर्वोत्तम है। एनिमा लेने के बाद कम से कम आधे घन्टे तक कुछ भी न खायें।

श्री विश्वम्भरनाथ जी द्विवेदी की राय में, स्वास्थ्य और यौवन को बनाये रखने के लिए या उन्नत करने के लिए प्रति वर्ष या छः मास बाद तीन दिन का उपवास और एनिमा का प्रयोग बहुत लाभदायक है। इन दिनों के बाद चार पाँच दिन तक केवल फल या पत्तीदार भाजियों का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने वाले बहुत दिनों तक सुखी रहकर जीवन व्यतीत कर सकेंगे।”

श्री आनन्दवर्धन की राय है कि “कब्ज के अलावा बुखार, खाँसी, दमा, सिर दर्द, पीड़ा की रक्षा में एनिमा लिया जा सकता है। मियादी बुखार या किसी भी तेज बुखार में ज्वर को एक सीमा में रखने के लिए एनिमा बहुत सहायता देता है। पीलिया या कामला रोग में गर्म जल के एनिमा के पश्चात् ठंडे पानी का एनिमा बहुत लाभदायक होता है। खाज-खुजली के रोगों में एनिमा विशेष उपयोगी है। इसके प्रयोग से त्वचा और गुर्दे क्रियाशील हो जाते हैं। गठिया के रोगी कुछ दिनों लगातार एनिमा लेकर महीनों की चिकित्सा का काम सप्ताहों में निकाल सकते हैं।”

(2) उपवास का जादू

उपवास मानव शरीर में आकाश तत्व की वृद्धि का एक सहज एवं स्वाभाविक साधन है, यह मन और शरीर दोनों को निर्मल बनाता है, रोग निक्षारण के साथ-2 इसमें शरीर को शक्ति सम्पन्न बनाने की अलौकिक क्षमता है। अतः प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत इसे बड़ा महत्व दिया जाता है।

उपवास के लाभ असंख्य हैं किन्तु प्रधान लाभ है पाचन क्रिया को ठीक करना तथा पेट की मशीन को कुछ आराम देना। रोगी जब आहार छोड़ उसके रोगों का शमन करने में लग जाता है, वह शीघ्र निरोग हो जाता है। प्राचीन शास्त्रों में लिखा है- “अग्नि आहार को पचाती है और जब पेट में आहार नहीं रहता, तब वह दोषों को पचाती है, यानी नष्ट करती है। सुश्रुत के अनुसार उपवास से ज्वर का नाश होता है अग्नि का दीपन होता है, शरीर हल्का हो जाता है। जिस प्रकार उपवास रोगों को नष्ट करता है, उसी प्रकार यह हमारी वासनाओं को दबाता है, विकारों को नष्ट कर देता है, आन्तरिक शान्ति और संयम सिखाता है। मोटे, बादी से भरे व्यक्तियों के लिए उपवास से बढ़कर दूसरा कोई अच्छा उपाय नहीं।

जिन्हें गर्मी, नासूर, बवासीर, गठिया, सिर दर्द, मूत्राशय की सूजन, मधुमेह, उपदंश, दमा या श्वास रोग, मेद रोग, मस्तिष्क में रक्त जम जाना, यकृत में रक्त का जमाव, पीप पड़ना, मोतीझरा, अर्बुद और ग्रन्थि अर्बुद इत्यादि हो, उन्हें उपवास से अवश्य लाभ होता है- कफ आना, कब्ज, अतिसार, शूल, शिर दर्द, चर्म रोग, न्यूरिहिस, दाँतों के रोग जैसे पायरिया, कृमि तथा जुकाम।

उपवास किन रोगों में लाभ नहीं पहुँचाता उन्हें भी याद कर लीजिए- हिस्टीरिया या अपतंत्र, वायु विकार, मानसिक वायु रोग नामक बीमारियों में उपवास लाभ न करेगा। पागलपन या यकृत या फेफड़े का जो हिस्सा नष्ट हो गया हो, उसमें भी उपवास से कोई लाभ नहीं होता। कमजोर और रक्त-हीनता के रोगियों को उपवास नहीं करना चाहिए।

शरीर शोधन का सबसे प्रभावशाली और सीधा रास्ता उपवास ही है। उपवास के प्रयोग के लिए कुछ अच्छा साहित्य अवश्य पढ़ लें। ऐसी कुछ पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं- डॉ0 विट्ठलदास “उपवास से लाभ”, डॉ. रामचन्द्र महेन्द्र “उपवास के चमत्कार”, रामचन्द्र वर्मा “उपवास चिकित्सा”। जहाँ तक संभव हो उपवास-विशेषज्ञों की देख−रेख में ही उपवास द्वारा पाचन प्रणाली को विश्राम दें। कुदरत आपको हमेशा भूख बन्द होने की हालत में विश्राम करने की सलाह देती है। प्रकृति के बताये हुए मार्ग पर चलने से ही उपवास द्वारा हम पाचन प्रणाली को विश्राम दे सकते हैं।

जिह्वा के स्वाद के वशीभूत न हूजिये। आपकी पाक प्रणाली पर अत्याचार न कीजिए, अल्पाहार ही दीर्घायु का मूल है। अपने दाँतों से कब्र न खोदिये।

(3) फलाहार और शाकाहार - ईश्वरीय उपहार -

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली भोजन को विशेष महत्व प्रदान करती है। जीवन का अस्तित्व भोजन पर अवलम्बित है। हम खाते हैं जीने के लिए न कि जीते हैं खाने के लिए। यदि कुछ धनी पेटू भोजन मट्टों का भोजन देखा जाय तो यह स्पष्ट होता है। कि वे खाने के लिए जीते हैं। “खूब खाओ, अच्छी अच्छी सुस्वादु चटपटी मसालेदार चटनियाँ और तरबतर मिठाइयाँ खाओ, ठूँस-2 कर खाओ, जिह्वा का आनन्द लूटो” यह दृष्टिकोण हमारे समस्त शारीरिक और मानसिक संतापों की जड़ समझिए।

प्राकृतिक अवस्था में जो भोजन लिया जायेगा, वह उतना ही विटामिन-युक्त तथा बलवर्द्धक होगा। कृत्रिम भोजन असंतुलित और अप्राकृतिक होता है। हम उसे अनियमित रूप से ग्रहण करते हैं। आज का भोजन शरीर-संरक्षण की दृष्टि से नहीं होता।

प्रकृति हमें आदेश करती है कि हम आधुनिक कृत्रिम प्रणालियों द्वारा उसे न बिगाड़ें प्राकृतिक अवस्था में ही कम से कम विकृत कर उसका उपयोग करें। हम भोजन “जीवन धारण के लिए” ग्रहण करें।

भोजन के तीन रासायनिक तत्वों को याद रखिए- प्रोटीन, चर्बी और विटामिन का भी प्रमुख स्थान है। प्रोटीन और चर्बी के भी मुख्य दो भेद होते हैं-

(1) प्राणी जन्य- प्राणियों के माँस में पाये जाने वाले।

(2) वनस्पति जन्य- फल, फूल, कन्द शाक तरकारियों में उपलब्ध।

ईश्वर ने वनस्पतियों के प्रोटीन और चर्बी को अद्भुत शक्ति दी है। पशुओं के प्रोटीन में वह प्राकृत तत्व नहीं होते, जो वनस्पतियों में विद्यमान हैं। प्राणी जन्य चर्बी सात्विक नहीं है। दाल और दूध का प्रोटीन, सर्वश्रेष्ठ है। दूध, दही, मट्ठा, पनीर, धान के अंकुर, हरे पत्ते वाले शाकों तथा फलों का प्रोटीन स्वच्छ होता है। बिना छना आटा, जौ, बाजरा और मशीन से न साफ किया गया चावल, चना, मटर, लोबिया, आलू, गाजर, शलजम में यह साधारण होता है।

भोजन में शाक भाजी का स्थान 

भोजन में शाक तरकारियाँ अमृत का कार्य करती हैं। शाक तरकारियाँ, दूध और फल रक्षात्मक भोजन बनाते हैं। इन्हीं का हमारे शरीर को उचित अवस्था में रखने में प्रमुख हाथ रहता है। शाक तरकारियों में लवण व क्षार की मात्रा अधिक रहती है। फल हमारे शरीर में क्षार की मात्रा की अभिवृद्धि करते और अम्लता कम करते हैं। कविराज महेन्द्रनाथ जी की सम्मति में “शरीर में क्षार की मात्रा बढ़ाना और अम्ल का कम होना यही स्वास्थ्य रखने का रहस्य है।”

शाक भाजी के विषय में ये बातें याद रखिये -

(1) कम से कम पकाइये, छिलकों सहित खाने का अभ्यास कीजिये। छिलकों में शक्ति है, भोजन के तत्व हैं। दाल को भी छिलकों सहित प्रयोग में लाइए। गाजर, खीरा, ककड़ी, आलू, बैंगन इत्यादि को छिलके सहित खाइये।

(2) बार-बार उबालना, और फिर भून लेना हानिकारक है। इससे शाक−भाजी के सभी विटामिन और पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं। यह देर से पचते हैं। शाकों को साधारण ही उबालिए।

(3) उबली हुई तरकारियों का पानी मत फेंकिये। उबले हुए पानी में ही पौष्टिक तत्व आकर विनष्ट हो जाते हैं। धीमे आँच पर केवल इतना उबालें कि उसका शोरबा या रसा बचे। यह रसा ही शक्तिपूर्ण हैं।

(4) पत्तीदार तरकारियाँ, जैसे पालक, मेथी, बथुआ, मूली, सूआ आदि शाक रक्त को साफ करती हैं, इनके प्रयोग से मनुष्य सुर्ख रंग का हो जाता है। इन्हें खूब प्रयोग में लाइये। टमाटर रक्त साफ करने वाला सर्वोत्कृष्ट फल है। इसे प्याज के साथ कच्चा खाने से पहीला, यकृत और उदर संबंधी रोग दूर होते हैं। टमाटर उत्तम, शुद्ध व आरोग्यमय उपहार है।

(5) नींबू का स्थान महत्वपूर्ण है। यकृत आमाशय और आँत के समस्त रोग इस अमृत तुल्य फल से दूर होते हैं। प्रातः काल जल के गिलास में नीबू की बूंदें डालकर पीने से पेट साफ रहता है। संतरा, अनार, अंगूर, मौसमी- ये रसीले फल आरोग्यवर्द्धक और गुणकारी हैं। इन फलों में लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस सब से उत्तम और पचने लायक होते हैं। फलों से दाँत मजबूत होते हैं। रक्त शुद्धि के साथ-साथ हड्डियाँ मजबूत होती हैं, उत्तम चीनी देते हैं।

(6) नट्स- जैसे अखरोट, बदाम, मूँगफली काजू, पिस्ते, खेपरा, चिरौंजी, इत्यादि फल हमें अच्छी चिकनाई देते हैं। यह बड़े ऊँचे दर्जे की होती है। इनमें विटामिन बी और ए अच्छे परिमाण में मिल सकते हैं। अमरूद जाड़ों में खूब खाने की चीज है। केला तब खाना चाहिए जब वह पक जाय। इसके अतिरिक्त ककड़ी, खरबूजा, पपीता, आम, जामुन भी बड़े काम के हैं। आँवला एक ऐसा फल है, जिसकी उपयोगिता विस्मृत नहीं की जा सकती। कटहल पुष्टिकारक है। इमली हमें उत्तम चीनी व खटाई देती है। इसमें विटामिन और खनिज लवण दोनों ही हैं।

(7) भोजन के पश्चात् कोई फल खाया कीजिये। नींबू, संतरा या अंगूर इसके जिए बड़े उपयुक्त हैं। इनसे हाजमा ठीक रहता है। ऋतु फल समयानुकूल सेवन करने से सदैव लाभप्रद हैं। प्रकृति स्वयं हमारे हित की चिंता रखती है और लाभ के अनुसार ही फलों को उत्पन्न करती है।

गन्ने का रस हाजमा सुधारने का एक ईश्वरीय उपहार है। गन्ने को चूसने से उसमें उचित मात्रा में थूक मिल जाता है। इससे पाचन प्रणाली अपनी स्वाभाविक गति से कार्य करती है।

दूध में जीवाणु निर्माण के सभी तत्व उचित मात्रा में विद्यमान है। जो व्यक्ति अधिक शारीरिक और मानसिक परिश्रम करते हैं उन्हें जीवाणु निर्माण के लिए उचित मात्रा में दूध लेना चाहिए। दूध सम्पूर्ण भोजन है।

(8) मिट्टी की अद्भुत करामात -

प्रकृति ने मिट्टी में महान् शक्तियाँ भरी हैं। सभी तत्व उसमें विद्यमान हैं। प्रकृति में रहने वाले जानवर प्रायः मिट्टी की कीचड़ में अपने घाव रगड़ कर, मिट्टी में लोटकर या मिट्टी खा कर स्वस्थ रहते है। मिट्टी से ही हमारी उत्पत्ति, रक्षण एवं दीर्घायु है। पेड़, पौधे, कंद, मूल, फल, अनाज इत्यादि मिट्टी से ही उत्पन्न होकर हमें जीवन और आनन्द प्रदान करते हैं, पुष्प भाँति-2 के रंग तथा फल माधुर्य एवं खटास खींचते हैं।

जहाँ लोग मिट्टी से खेलते, बदन पर पहलवानों की भाँति इसकी मालिश करते हैं, वहाँ उनका बदन चमकता रहता है और वे पूर्ण स्वस्थ रहते हैं। साबुन के स्थान पर चिकनी मिट्टी से हाथ धोना कहीं अधिक हितकर है। मिट्टी में मल का शोषण करने की जितनी अद्भुत शक्ति है, इतनी शायद किसी अन्य, वस्तु में नहीं। देहातों के मिट्टी के मकान अधिक स्वास्थ्यप्रद हैं क्योंकि उनमें मनुष्य प्रकृति के अधिक निकट है। भारत में रसोईघर तथा चौका इत्यादि को मिट्टी से पोतने का रिवाज बड़ा स्वास्थ्यकर है। मिट्टी से लीपने से गन्दगी दूर होती है, मक्खी नहीं भिनभिनातीं, स्थान स्वच्छ और सुन्दर रहता है।

मिट्टी के प्रकार -

मिट्टी कई प्रकार की होती है- काली, पीली, लाल, सफेद, चिकनी, रेतीली। गेरू और पीली मिट्टी पुताई के काम आती है और रासायनिक तत्वों से भरीं है। लाल मिट्टी विन्ध्य प्रदेश तथा अन्य पहाड़ी प्रदेशों में उपलब्ध होती है। चिकनी मिट्टी प्रायः कछारों और नदियों में मिलती है। कछार की काली मिट्टी बाल धोने के लिए विशेष गुणकारी होती है। हाथ धोने के लिए रेतीली मिट्टी उत्तम रहती है, इससे गन्दगी हाथों से पूरी तरह निकल आती है। पीली और सफेद मिट्टी खेतों तथा तालाबों में पाई जाती है और क्षय के रोग में इसका सफल उपयोग होता है।

मिट्टी का दैनिक जीवन में उपयोग कैसे करें?

मनुष्य को दैनिक जीवन में पुनः मिट्टी का प्रयोग करना सीखना चाहिये। ज्यों-2 वह शिक्षित और सभ्य होता गया, त्यों-त्यों वह मिट्टी से घृणा करता गया। यह अत्यन्त हानिकर है। निरोग और सुखी रहने के जिए उसे पुनः उसका उपयोग निम्न प्रकार से दैनिक जीवन में करना चाहिए-

(1) नंगे पाँव पृथ्वी पर चलें- आज के बहुत से महापुरुष नंगे पाँव चलते हैं और संसार को इसका महत्व दिखा रहे हैं। नंगे पाँवों का निकट संपर्क पृथ्वी से रहता है और इस प्रकार हमें जीवन शक्ति प्राप्त होती है। पाँव भी मजबूत बनते हैं। मोजा पहनना अहितकर है। इससे वायु एवं पृथ्वी का संपर्क नहीं हो पाता। नेत्र रोगों का नाश होता है।

(2)पृथ्वी पर सोया करें- प्राकृतिक जीवन के लिए, बजाय पलंग व मोटे गद्दों के पृथ्वी पर सोना स्वास्थ्यकर है। उस कृषक को देखिये जो प्रातःकाल 5 घंटे कठिन परिश्रम कर खेत की मेंड पर ही पृथ्वी का बिछौना बिछा सो जाता है। उसमें कितनी पवित्रता, आनन्द एवं आरोग्य भरा है। प्रत्येक व्यक्ति यथाशक्ति घर में, जंगल में, बाग में जूते खोलकर जमीन या हरी दूब पर टहल सकते हैं, लेट या सो सकते हैं। उन्मुक्त प्राकृतिक वातावरण में सोने से आपको पर्याप्त प्रकाश, वायु, पृथ्वी का संपर्क, स्वाभाविक गर्मी प्राप्त हो सकती है। यदि बालू रेत के टीले हैं या जमीन सख्त है तो चटाई या शीतल पाटी बिछा कर सो सकते हैं।

डॉ. युगलकिशोरी की राय है कि कोई भी व्यक्ति जो मिट्टी की शक्ति को समझेगा, वह कठिनाई भोगकर भी जमीन पर सोना पसन्द करेगा। जिन रोगियों ने इसका प्रयोग किया है, उन्हें पहली पाँच सात रातें कुछ कष्टमय बीती हैं, कुछ बदन अकड़ा हुआ प्रतीत हुआ है किन्तु मिट्टी की आश्चर्यजनक शक्तियाँ जान लेने पर उन्होंने वर्षा ऋतु तक में पृथ्वी पर पड़े रहना पसन्द किया है।

मिट्टी-सूजन या फोड़ों पर -

क्षत रोगों में मिट्टी का प्रयोग बहुत सफल होता है। सूजन या फोड़ों पर चिकनी मिट्टी की गीली पट्टी रखकर बाँधने और प्रतिदिन बदलने से वे पककर फूट जाते हैं।

दुखती हुई आँखों-पर रात्रि में सोने से पूर्व गीली मिट्टी की पट्टी से बहुत जल्दी लालिमा दूर हो जाती है, सूजन उतर जाती है। खुले हुए घावों पर बहुत साफ मिट्टी का प्रयोग करना चाहिए। प्रतिदिन वह बदली जाय और रक्त संचार होता रहे, ऐसा प्रयत्न करना चाहिये।

कब्ज में गीली मिट्टी की पट्टी या थोड़ी गीली मिट्टी की पुल्टिस बाँधने से बहुत लाभ होता है। अन्दर का जमा हुआ मल टूट जाता है और कोष्ठबद्धता दूर होती है। इसी प्रकार कई दिन तक मिट्टी की पुल्टिस का प्रयोग करने से अनेक बीमारियाँ जैसे आँव का पड़ना, स्वप्न दोष, धातु का गिरना, प्रमेह, तिल्ली का बढ़ना भी ठीक हो जाता है। जीर्ण (chronic) रोगों पर मिट्टी, धूप, हवा, पानी, भोजन, उपवास, मालिश आदि का बड़ा अद्भुत प्रभाव पड़ता है पर जहाँ मिट्टी का प्रयोग होता है, वहाँ रोग जड़ से चला जाता है।

कुछ अनुभव

श्री आनन्दवर्धन ने लिखा है, “मैंने बहुत अवसरों पर खालिस मिट्टी का उपयोग करके बड़ा लाभ पाया है। कब्ज पर, सूजन पर, दर्द पर, किसी जीव के डंक मारने पर, फोड़े, फुन्सी पर।” आपने एक बच्ची के बिच्छु काटने पर मिट्टी के जादू भरे सफल प्रयोग पर अपना अनुभव लिखा है।

श्री शारदाप्रसाद गुप्त ने अपने मिट्टी के प्रयोगों का वर्णन किया है। उनमें से कुछ ये हैं- “नाल काटने का उचित प्रबन्ध करने पर भी मेरी पुत्री को बहुत कष्ट भोगना पड़ा। उस समय तो नाल सूख कर गिर गई पर बाद में उसमें पस पड़ गया। स्त्रियों से अवश्य ही कोई असावधानी हुई थी। इस पर केवल गर्म पानी के फौवारे देना, धोना और मिट्टी की पट्टी बराबर बाँधने से यह ठीक हो गया।

“पड़ौस के एक चार वर्ष के बालक के तमाम नितम्ब, फोते और जननेंद्रिय पर भयानक फुड़ियाँ निकल आई, जननेंद्रिय अत्यधिक मोटी होकर धनुषाकार और कई स्थानों में टेढ़ी मेढ़ी हो गई। अग्रभाग चिपक गया और उसमें पीब भर गया। चारपाई के पैताने बच्चे को लेटाकर नीचे नीम की पत्ती की भाप दिन में दो बार दी गई। भाप देने के पश्चात उस स्थान पर ठंडी मिट्टी का लेप कर दिया गया। पहले ही दिन सूजन कम हो गई। एक गर्म जल का एनिमा देकर उसके पेडू पर मिट्टी की पट्टी का लेप करने से रोग दूर हो गया।

एक सज्जन के हाथ में खुजली हो गई। यह बहुत पुरानी होती गई। अन्त में दो तीन दिन उस स्थान पर भाप देकर मिट्टी का लेप लगाने से फोड़े फुँसियाँ दूर हो गई।

पेडू पर मिट्टी की पट्टी का प्रयोग -

डॉ. दिलकश ने पेडू पर मिट्टी की पट्टी के प्रयोग पर काफी लिखा है। आपके अनुभवों के अनुसार पेडू पर मिट्टी की पट्टी का प्रयोग सभी प्रकार के प्रदाह की अवस्था में, विशेषतः आमाशय की झिल्लियों के प्रदाह में नितान्त आवश्यक है। इससे आमाशय के रक्त-संचारण में वृद्धि होती है। मिट्टी की शोषण शक्ति विषैले द्रव्य को सोख लेती है और कीटाणुओं को नष्ट करती है।

मिट्टी के अन्य प्रयोग -

यदि सिर गंजा हो और बाल उड़ गये हों तो चिकनी काली मिट्टी का लेप कीजिये। निद्रा ना आती हो, तो काली मिट्टी की पट्टी का प्रयोग कीजिये, मस्तक सम्बन्धी समस्त रोग अवश्य मिट जायेंगे। पेडू पर मिट्टी की पट्टी से आँतों के रोग दूर होते हैं। मूत्राशय के रोगों में भी मिट्टी की पट्टी अपना अद्भुत चमत्कार दिखाती है। मिट्टी की चिकित्सा से रक्त शुद्ध होकर ठीक तरह प्रवाहित होने लगता है। स्वामी जगदीश्वरानन्दजी के अनुसार समस्त सिर रोगों में मिट्टी की पट्टी का उपचार निश्चित रूप से लाभकारी सिद्ध होगा। आँखों के रोगों में हमने स्वयं मिट्टी की पट्टी से बहुत लाभ उठाया है। प्रत्येक प्रयोग में यह ध्यान रहे कि आपका आहार सरल, हल्का, सुपाच्य रहे, कुछ व्यायाम अवश्य करते रहें और फलों का उपयोग करें। मिट्टी में फिटकरी और मीठा तेल मिलाकर दन्तमंजन से दन्त रोग दूर हो जायेंगे। कान के दर्द में मिट्टी को गर्म करके बाँधने से तत्काल लाभ होता है। हृदय रोग तथा पेट के विकारों के लिए भी मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। दाद-खुजली और चर्म रोगों के लिए गोमूत्र में मिट्टी मिलाकर काम में लाने से दूर हुए हैं। चर्म रोगों में मिट्टी के साथ त्रिफला या नीम के पत्ते उबाल कर उस पानी का उपयोग करने से विशेष लाभ होता है।

(5) प्राकृतिक चिकित्सा का अनुपम साधन सेंक-

सेंकना बड़ी ही सरल क्रिया है किन्तु इसकी शक्तियाँ बड़ी ही अद्भुत हैं। अनेक जटिल दीखने वाले रोगों पर सेंकने का बड़ा ही अच्छा प्रभाव पड़ता है। चोट आने पर सेंक देने से रक्त का संचार पुनः तीव्र हो जाता है और दर्द विलुप्त हो जाता है। छाती या फेफड़ों में सर्दी लगने के कारण दर्द हो जाता है। इसमें मालिश और सेंक सबसे अधिक लाभप्रद होते हैं। दुखती हुई आँख पर गर्म पानी का सेंक अपना अद्भुत प्रभाव दिखाया करता है। पेट को सेंकने से पाचन प्रणाली को सहायता मिलती है और पेट दर्द दूर हो जाता है।

सेंकने की क्रिया का प्रभाव समझ लीजिये। रक्त के संचार में जब किसी कारण रुकावट उत्पन्न हो जाती है, तो सेंक उसे पुनः तीव्र कर देता है। फोड़े फुन्सियों को भी गर्म जल द्वारा सेंकने से बड़ा लाभ होता है। थके हुए नेत्रों को गर्म पानी से सेंकने पर स्नायुओं में स्फूर्ति उत्पन्न होती है। नेत्र-स्वास्थ्य के लिए सेक अनुपम साधन है। खाँसी में गला सेंकने से विशेष लाभ होता है। गला बैठ जाने पर भी सेंक कर आवाज खोली जा सकती है। हाकी, फुटबाल इत्यादि खेल खेलने या कूदने फाँदने में यदि कहीं मोच आ जाय, तो उसे सेंक कर ठीक करना चाहिये। अन्दर के दर्दों के लिए भी सेंक से अच्छी दूसरी दवाई नहीं है। सेंक से रक्त का परिभ्रमण तीव्रतर हो जाता है। रक्त संचालन यथोचित रीति से होने पर अंग का दर्द स्वयं ठीक हो जाता है। जल चिकित्सा के अंतर्गत पेडू का स्थानीय गर्म सेंक बहुत लाभदायक प्रयोग है (इसे अंग्रेजी में (Abdominal heating pack) कहते हैं। टी.बी. में छाती सेंकना सफलतापूर्वक व्यवहार में लाया जाता है। पुरानी खाँसी तथा फेफड़ों की सूजन में गर्म सेंक का प्रयोग विशेष लाभदायक पाया गया है।

डॉक्टर ए. सी. सेलमन का कथन है कि सेंक लगभग पीड़ा वाली सब व्याधियों में आराम देता है। वह सब प्रकार के लेप व मरहमों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

गर्म जल में निचोड़े हुए कपड़े या गर्म जल की बोतल से त्वचा में उष्णता लाना वाष्प स्नान का काम देता है। इस सेंक के जिए मोटी फलालेन या ऊनी कपड़ा अच्छा है। जल को उबलता हुआ रखने के लिए बाल्टी पर बरतन को थोड़े से जलते हुए कोयलों पर रख कर तापक्रम स्थिर रक्खें। सदैव त्वचा पर सूखा कपड़ा रखकर फोमेन्टेशन दें। जहाँ सेंक करना हो वहाँ नारियल के तेल या वैसलीन को भी रगड़ दें।

सेंक का प्रयोग कहाँ करें?

डॉ. जे. एच. कैलाग के अनुसार “जब किसी सूजन को कम करना हो या स्राव व पसीने के अवरोध में उत्तेजित करना हो, नस या माँसपेशी को उत्तेजित करना हो, किसी विशेष अंग में रक्त बदलना हो, रुधिर के विशेष जीवाणु बढ़ाना हो या काम करने की सामर्थ्य जाग्रत करना हो तो सेंक का प्रयोग करना चाहिये।” निम्न रोगों में सेंक कीजिये-

“लीवर की सूजन, स्त्री या पुरुष के गुप्ताँग की सूजन, रगों और पुट्ठों की सब प्रकार की सूजन युक्त व्याधियाँ, आँत उतरना, बड़ी रग से दाँत की पीड़ा, आधाशीशी, पुट्ठों के जोड़ों का जकड़ना, सूजाक, कंठ या तालू का फूलना, पथरी की पीड़ायें, ग्रन्थि रोग, नसों का दर्द, सूजन, फेफड़ों का दर्द, वायु-नली की सूजन, दमा में इसके प्रयोग विशेष गुणकारी सिद्ध हुए हैं।”

सेंक देने की तीन विधियाँ हैं-

1. गर्म सेंक- गर्म जल में निचोड़े हुए कपड़े या रुई से सेंक।

2. बारी बारी से सेंक- समान काल का बारी-2 से गर्म व अतिशीत सेंक। गर्म से शुरू कर अन्त में शीत फोमेन्टेशन करें।

3. आवाहिक सेंक- यह भी बारी-बारी से सेंक देने के ही समान है। भेद केवल यही है कि शीत प्रयोग सदैव कम समय का होता है। गर्म सेंक 4-5 मिनट का दें और ठंडा 20-30 सेकिंड का) प्रयोग करके देखें सेंक कर आप कितने ही रोगों से छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं।

(6) शास्त्रीय मालिश के चमत्कार -

मालिश का प्रधान कार्य रक्त को हृदय की ओर गतिमान करना है। जिस स्थान की मालिश की जाती है, वहाँ से घर्षण द्वारा रक्त की तीव्रता में वृद्धि की जाती है। रक्त फेफड़ों में शीघ्रता से जाकर स्वच्छ होता है उसके विकार दूर हो जाते हैं। भारत में लोग प्रायः थकान मिटाने के लिए ही मालिश का प्रयोग करते हैं किन्तु इससे सूजन, झटका, चोट, मोच इत्यादि भी सफलतापूर्वक दूर की जा सकती हैं। ग्रीक-स्त्रियों का यह विश्वास था कि मुँह, कान, हाथ, जंघा तथा नितम्ब की मालिश होने से सौंदर्य तथा यौवन सदैव सुरक्षित रहता है। अफ्रीका की हब्शी जातियाँ विवाह के पूर्व वधू की मालिश महीने भर तक इसी आशा से करती थीं कि वधू का सौंदर्य बढ़ जायेगा। मेडगास्कर की जंगली जातियाँ एक हजार वर्ष पूर्व रोगी के शरीर में रक्त बढ़ाने के लिए मालिश करती रही हैं।

मालिश का उपयोग किन-2 रोगों में करें?

1. सब तरह की मोचें, सूजन, झटका, हाथ, पैर कमर के दर्द इत्यादि पर।

2. मालिश से ढीली एवं स्थान च्युत आँतें, आमाशय एवं मूत्राशय ठीक जगह बैठाया जा सकता है।

3. मालिश व्यायाम पद्धति भी है। मालिश के द्वारा अच्छी कसरत हो जाती है।

4. मालिश के द्वारा शरीर के अंगों को सतेज किया जा सकता है। उनमें स्फूर्ति एवं नवजीवन संचार होता है। हल्की मालिश निद्रा तक बुला सकती है।

5. इलाजुलगुर्बा में लिखा है कि जहरीले जन्तुओं के काटने पर उनके विष को निकालने के लिए जैतून, सरसों तथा कंज के तेल की मालिश करनी चाहिए।

6. यदि त्वचा को स्वच्छ, स्वस्थ एवं सुन्दर रखना है तो सम्पूर्ण शरीर की सूखी मालिश करनी चाहिए। संघर्षण से रक्त की नालियों में रगड़ उत्पन्न होती है जो गर्मी उत्पन्न कर रक्त संचालन से रक्त में मिश्रित अनावश्यक विजातीय तत्व स्वस्थ रक्त से पृथक हो जाते हैं। अतः त्वचा का रंग निखर आता है।

मालिश की भिन्न-2 क्रियाएँ-

शास्त्रीय मालिश में कई क्रियाएँ सम्मिलित हैं। साधारणतः इन्हें इस प्रकार विभक्त किया जा सकता है-

1. छूना 2. रगड़ना 3. थपथपाना 4. गूँथना 5. चुटकी भरना 6. कंपन 7. जोड़ों को हिलाना। कुशल मालिश विशेषज्ञ उपरोक्त क्रियाओं को आवश्यकतानुसार काम में लाता है।

हस्त संचालन में हथेली का मुख्य उपयोग होता है। छूने और रगड़ने में से पहली में उंगलियों और दूसरी में हथेली का उपयोग होता है। गूँथना और चुटकी भरना किन्हीं विशेष स्थलों में रक्त संचार के काम आता है। कंपन में हाथ की थिरकन की प्रधानता होती है। सिर का दर्द निकालने के लिए नाई इसी थिरकन का उपयोग करते हैं। किन्तु संघर्षण (अर्थात् रगड़) से जितना रक्त संचार होता है, उतना थिरकन से नहीं। जब मालिश की जाती है, तो रगड़ से गर्मी उत्पन्न हो जाती है। इस गर्मी से स्नायु और रक्त नलिकाएँ फैलती हैं, रक्त की गति बढ़ती है। थपथपाने से इन नलिकाओं को मालिश विशेष पुनः संकुचित करता है।

मालिश की सावधानियाँ 

प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. विट्ठलदास का विचार है कि “उपवास एवं मालिश का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। उपवास और मालिश के साथ-2 उपयोग से रोगियों को शक्ति मिलती है। मालिश विशेषज्ञ गठिया, कब्ज, रक्तचाप, दुर्बलता आदि के रोगियों को चंगा कर लेते हैं। जहाँ शरीर को अधिक स्वस्थ करने में मालिश बहुत बड़ी सहायक सिद्ध होती है, वहाँ रोगी को आराम देने में वह बेजोड़ है। पर इसे सर्व रोग हारी समझना गलत है।”

पाठकों को उपरोक्त सम्मति से लाभ उठाना चाहिए। मालिश करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जिस स्थान पर मालिश कराई जाय, वहाँ न तो हवा का आधिक्य रहे और न कमी ही। मालिश कराते समय तंग कपड़ा नहीं पहनना चाहिये। कभी-2 धीरे-2 मुष्टि प्रहार भी करें। हथेली से रगड़ने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होनी चाहिए। गर्दन की मालिश में हाथ की केवल दो अंगुलियों से माँस पेशियों की खींचना चाहिये।

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