Satya Darshan

जेपी नड्डा को भलीभांति जानते पहचानते हैं भाजपा कार्यकर्ता

अदिति फडनिस | जुलाई 1, 2019

जगत प्रकाश नड्डा को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है और भाजपा की बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) इकाई इस बात को लेकर बेहद प्रसन्न है कि उनके यहां के नेता को इतनी बड़ी सफलता मिली है। आम धारणा यही है कि छह महीने बाद जब वह पार्टी के पूर्णकालिक अध्यक्ष बन जाएंगे (ऐसा होना ही है क्योंकि भाजपा के संविधान में कार्यकारी अध्यक्ष का प्रावधान ही नहीं है) तब भी वह अमित शाह की निगरानी के अधीन ही काम करेंगे। 

महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद भाजपा के सामने अगले 18 महीनों के दौरान कुछ ही चुनावी चुनौतियां हैं। ऐसे में कहा जा रहा है कि शाह की अनुपस्थिति पार्टी पर बहुत भारी नहीं पड़ेगी और ज्यादा नुकसान नहीं होगा।

भाजपा जितने वर्षों तक सत्ता में रही है, उस दौरान उसके चार अध्यक्ष रहे हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब कुशाभाऊ ठाकरे पार्टी के अध्यक्ष थे। ठाकरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रतिनिधि थे। ठाकरे एक प्रचारक थे और लगता नहीं कि निकट भविष्य में भाजपा किसी प्रचारक को पार्टी का अध्यक्ष बनाएगी। बंगारू लक्ष्मण दलित थे और उनको सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग के तौर पर पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था लेकिन वह रिश्वत लेते हुए पकड़े गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। तीसरा नाम जन कृष्णमूर्ति का है। इन सभी की पार्टी को चलाने की अपनी-अपनी शैली थी। जब आदर्श चुनने की बारी आएगी तो नड्डा शायद वेंकैया नायडू की शैली के सबसे करीब होंगे। वह नायडू जैसे चतुर भले ही नहीं हों लेकिन उनकी कार्य शैली वैसी ही व्यापक है। 

उन्होंने भाजपा में एक कार्यकर्ता और संगठन के व्यक्ति के रूप में लंबे समय तक काम किया है और यह खूबी उनमें वहीं से आई है। अपने आसपास देखिए। आपको उस पीढ़ी के और उस स्तर पर ज्यादा लोग नहीं दिखेंगे। पीयूष गोयल और भूपेंद्र यादव जैसे जिन नेताओं को सरकार में ऊंचे पद मिले हुए हैं, उन्हें पार्टी संगठन का कोई खास अनुभव नहीं है। नड्डा को 40 वर्ष का संगठनात्मक अनुभव है जो उनके समकालीनों में शायद ही किसी के पास हो।

उन्होंने सन 1980 के दशक में हिमाचल विश्वविद्यालय से छात्र राजनीति की शुरुआत की और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के लिए पहली बार छात्र संघ का चुनाव जीता। वह चुनाव बराबरी पर छूटा था और उन्हें अध्यक्ष पद अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ साझा करना पड़ा। यही कारण है कि वह आधे कार्यकाल तक ही पद पर रह सके। बाद में वह एबीवीपी के अखिल भारतीय संगठनात्मक सचिव बन गए और आगे चलकर भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी बने। उस वक्त हिमाचल के अन्य बड़े नेता प्रेम कुमार धूमल कहीं दृश्य में ही नहीं थे। वह दिल्ली में लोकसभा में थे और नड्डा हिमाचल भाजपा के एक अन्य दिग्गज शांता कुमार के साथ विधानसभा में थे।

सन 1998 का हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव बदलाव लेकर आया। नरेंद्र मोदी भाजपा के महासचिव बन चुके थे। भाजपा के पास पिछली विधानसभा में केवल आठ सीट थीं। चुनाव के बाद पार्टी 31 सीट जीत चुकी थी। पिछली विधानसभा में नड्डा नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। लेकिन पार्टी ने धूमल को मुख्यमंत्री बनाया। संभव है इस नियुक्ति में मोदी की भूमिका रही हो। नड्डा अपनी निराशा को पचा गए और धूमिल सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। साथियों के साथ उनके रिश्ते को एक उदाहरण से परिभाषित किया जा सकता है। उनके सहयोगियों के मुताबिक कार्यकर्ताओं से मिलने पर वह कहते, 'काम के अलावा कोई काम बताओ।'

जब भाजपा हिमाचल प्रदेश में सत्ता से बाहर हुई तो नड्डा तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के अधीन हो गए। गडकरी ने उन्हें राज्यसभा में भिजवाया और उनकी पदोन्नति की। आगे चलकर वह भाजपा की सर्वोच्च संस्था यानी पार्टी के संसदीय बोर्ड के सचिव बन गए। इस बोर्ड में केवल आठ सदस्य हैं। वह सात वर्ष से अधिक समय तक इस पद पर रहे। 

अपनी अखिल भारतीय नियुक्तियों के कारण नड्डा भाजपा संगठन को करीब से जानते हैं। वह अब किसी के लिए खतरा भी नहीं है। वह अपनी वाक कला से भीड़ भले ही न जुटा पाएं लेकिन कार्यकर्ता उनको अच्छी तरह जानते हैं और दोनों का तालमेल बहुत अच्छा है। भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद वह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के कद से कहीं ऊपर निकल गए हैं। लेकिन कौन जानता है, शायद एक दिन वह लक्ष्य भी हासिल हो जाए। जेपी नड्डा भाजपा के ऐसे नेता हैं जिन पर नजर रखी जानी चाहिए।

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