Satya Darshan

राजनीति को हां, अर्थशास्त्र को ना?

श्रीनिवास राघवन | जून 27, 2019

चंद रोज पहले चेन्नई से प्रकाशित होने वाले और देश के शीर्षस्थ समाचार पत्रों में स्थान रखने वाले एक अखबार में भारत के भविष्य को लेकर एक निराशावादी आलेख प्रकाशित हुआ। उस आलेख में जताए गए अनुमान अत्यंत भयानक थे। उसे लिखा था हर्ष मंदर सिंह ने, जो कभी प्रशासनिक अधिकारी हुआ करते थे लेकिन अब पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता बन चुके हैं। वह हमेशा से सरकार के कटु आलोचक रहे हैं, भले ही किसी भी राजनीतिक दल की सत्ता रही हो। अपनी इस आलोचना में वह अक्सर नैतिक और व्यावहारिक आधार पर सही भी होते हैं।

बहरहाल, उनका यह आलेख इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे 2019 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त विजय के बाद नेहरूवादी उदारवादियों के मन में निराशा घर कर गई है। उनके लिए तो मानो दुनिया खत्म ही हो गई है।

बहुत अजीब संयोग है कि लगभग उसी समय कराची से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र डॉन में भी एक आलेख प्रकाशित हुआ जिसे लिखा था जाने माने पाकिस्तानी अर्थशास्त्री अंजुम अल्ताफ ने। भारतीय लेखक की तरह उन्होंने भी भारतीय उदारवादियों की निराशा को ही प्रकट किया। वह कहते हैं कि नेहरूवादी योजना एक बुर्जुआ योजना थी जिसमें काले अंग्रेजों का एक छोटा सा समूह भारत पर ब्रिटिश राजनीतिक मूल्य थोपने का प्रयास कर रहा था। वह बेस्ट सेलर पुस्तक आइडिया ऑफ इंडिया के लेखक सुनील खिलनानी को उद्धृत करते हैं।

खिलनानी ने लिखा था कि सन 1947 में अधिकांश भारतीयों को यह पता ही नहीं था कि उन्हें क्या सौंपा गया है। इसलिए नेहरू और उनके वंशजों ने बड़ी मशक्कत करके उन्हें समझाया कि धार्मिक सहिष्णुता, उदार मूल्य और राष्ट्रीय मामलों के संचालन का उच्च वर्गीय लेकिन उदार अंग्रेजी दां माहौल ही वे चीजें हैं जो उन्हें विरासत में मिलीं।

अल्ताफ कहते हैं कि यह सब इतिहास की बात हो चुकी है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता और तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों के परदे के पीछे भारतीय मूलत: असहिष्णु और अलोकतांत्रिक हैं।

ऐसे विचार प्रकट करने वाले विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की पूरी की पूरी जमात है। अर्मत्य सेन जैसे लोग भी इसमें शामिल हैं, जिनकी विद्वता पर किसी को संदेह नहीं है लेकिन उनकी आशंकाएं और उनके द्वारा की जा रही व्याख्याएं यकीनन संदेह के घेरे में हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी विचार अच्छा है या बुरा, इसका निर्धारण इस बात से नहीं होता है कि उक्त विचार किसने प्रकट किया है। ऐसे में यह दुखद है कि अधिकांश उदारवादी लोग ऐसे ही सोचते हैं। मैं ऐसे तमाम लोगों से एक सवाल पूछना चाहता हूं: राजनीतिक उदारवाद, आर्थिक उदारवाद के साथ किस तरह सुसंगत है? मैं यहां यह कहना चाहूंगा कि सन 1950 के बाद से संविधान के अनुच्छेद 19(जी) का बहुत हद तक मर्दन हुआ है। यह हर नागरिक को अपनी पसंद का रोजगार जैसे चाहे वैसे करने की स्वतंत्रता देता है। 

वाम उदारवादियों का उत्तर हमेशा यही रहा है कि अगर आर्थिक उदारीकरण का अर्थ राज्य की प्रत्यक्ष भागीदारी और आर्थिक गतिविधि में निरंतर हस्तक्षेप से है तो यह आवश्यक है कि इसके माध्यम से समतावादी आर्थिक लक्ष्यों और गरीबी उन्मूलन जैसे लक्ष्यों को हासिल किया जाए। क्या वाकई? 

ऐसी स्थिति में क्या हमें इसका उलट सवाल नहीं पूछना चाहिए? मसलन क्या राजनीतिक उदारवाद को अर्थव्यवस्था के समतावादी निष्कर्षों के साथ असंगत होना चाहिए। आखिर कार तमाम दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से भी पहले चीन का राजनीतिक उदारवाद ऐसे समतावादी आर्थिक नतीजे देने में कामयाब रहा जिन्हें वाम उदारवादी पसंद करते हैं। ऐसे में जो लोग नेहरूवादी राजनीतिक उदारवाद की उचित सराहना करते हैं वे नेहरूवादी आर्थिक उदारवाद की अनदेखी कर गलत करते हैं। नेहरू के युग के किसी भी आर्थिक विधान को देखिए, आप पाएंगे कि उसमें उदारीकरण की भावना निहित है। 

यही कारण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसी कार की तरह हो गई जिसके एक ओर राजनीतिक उदारवाद रूपी कार के पहिये जबकि दूसरी ओर आर्थिक उदारवाद के रूप में स्कूटर के पहिये लगा दिए गए हैं। जाहिर है इसका संतुलन खराब रहेगा। विडंबना यह है कि जो उदारवादी इन दिनों नेहरूवादी राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों के गुजर जाने से नाराज हैं, वही उनके दुर्लभ आर्थिक उदारवाद को समाप्त करने की भी मांग कर रहे हैं। उदाहरण के लिए डॉ मनमोहन सिंह तक ने समय-समय पर कहा है कि भारतीय श्रम बाजार को अधिक लचीला बनाए जाने की आवश्यकता है। इससे उनका तात्पर्य कम उदार बनाने से ही है। 

इसी प्रकार वही लोग जो वर्ष 2006 में मनरेगा लाए उन्होंने गरीबों की सब्सिडी खत्म किए जाने की बात पर कोई सवाल नहीं उठाया। वाम उदारवादी मस्तिष्क में हर चरण पर भ्रम नजर आता है। दो राय नहीं कि ऐसे लोग बेहद सदाशयता से भरे होते हैं लेकिन उनको नेहरूवादी युग से उदाहरण और उल्लेख लेने बंद करने होंगे।  

मैं उनके सामने एक ऐसा मॉडल पेश कर सकता हूं जिसका अनुकरण किया जा सकता है। यह उदाहरण है सन 1990 के दशक के उत्तराद्र्घ की ब्रिटिश लेबर पार्टी के न्यू लेबर का। नेहरूवादी उदार लोग भी नव उदारवादी हो सकते हैं। उन्हें राजनीतिक उदारवाद और आर्थिक उदारवाद में एक संतुलन कायम करना होगा। इसके लिए राजनीतिक उदारवाद को संकुचित करते हुए आर्थिक उदारवाद का विस्तार करना होगा। यह खेद की बात है कि राहुल गांधी ने मुझसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं ली। अगर वह लेते तो मैं उन्हें बताता कि भाजपा एकदम यही करने का प्रयास कर रही है और ऐसा करके वह एकबार फिर जीत हासिल करने जा रही है।

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