Satya Darshan

असम में और एक लाख लोग हुए 'बेघर'

प्रभाकर, कोलकाता | जून 26, 2019

एनआरसी की अतिरिक्त सूची में उन लोगों के नाम हैं जो बीते साल प्रकाशित एनआरसी के मसविदे में तो शामिल थे. लेकिन विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों की आपत्तियों के बाद अब उनको सूची से बाहर निकाल दिया गया है.

पूर्वोत्तर राज्य असम में विवादों में रही नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस यानी एनआरसी की कवायद के चलते बीते साल ही 40 लाख लोगों की नागरिकता और भविष्य अधर में लटक गए थे. अब बुधवार को जारी एक अतिरिक्त सूची में और एक लाख लोग बेघर हो गए हैं. इन लोगों के नाम पिछली एनआरसी के मसविदे में शामिल थे लेकिन तमाम आपत्तियों के बाद अब उनको सूची से बाहर निकाल दिया गया है. एनआरसी की अंतिम सूची 31 जुलाई को प्रकाशित होनी है. जिन लोगों के नाम इस अतिरिक्त सूची में शामिल हैं वह 11 जुलाई तक एनआरसी सेवा केंद्रों पर अपने दावे दर्ज करा सकेंगे. 31 जुलाई को एनआरसी के अंतिम प्रकाशन से पहले उनके दावों का निपटान किया जाएगा. इस बीच, बिहार मूल की एक महिला को विदेशी घोषित कर डिटेंशन शिविर में भेजे जाने से खासकर बाहरी राज्यों से आकर कई पीढ़ियों से यहां रहने वाले लोग आतंक में दिन काट रहे हैं.

अगले महीने अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले बुधवार को एनआरसी के प्रदेश संयोजक की ओर से जारी एक अतिरिक्त सूची में 1,02,462 लोगों के नाम हैं. संयोजक की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि शेड्यूल आफ सिटीजनशिप (रजिस्ट्रेशन आफ सिटीजंस एंड इश्यू आप नेशनल आइडेंटिटी कार्ड), रूल्स, 2003 की धारा पांच के प्रावधानों के तहत जारी इस अतिरिक्त सूची में ऐसे लोगों के नाम शामिल हैं जो बीते साल प्रकाशित एनआरसी के मसविदे में थे. लेकिन आखिर ऐसा क्यों हुआ कि अब उनको सूची से बाहर रखा गया है?

इस सवाल पर संयोजक प्रतीक हाजेला बताते हैं, "इनमें तीन वर्गों के लोग शामिल हैं. पहले वर्ग में ऐसे लोग शामिल है जिनको इस दौरान विदेशी घोषित कर दिया गया है या फिर वे संदिग्ध वोटर हैं या जिनके मामले विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित हैं. दूसरे वर्ग में दावों और आपत्तियों के निपटान के लिए गवाह के तौर पर पेश ऐसे लोग हैं जो अयोग्य पाए गए.” वह कहते हैं कि नागरिकता पंजीकरण के स्थानीय रजिस्ट्रारों की ओर से एनआरसी के मसविदे के प्रकाशन के बाद जांच के दौरान अयोग्य पाए जाने वाले लोगों के नाम भी इस सूची में शामिल किए गए हैं. उपधारा 4(3) के प्रावधानों के तहत स्थानीय रजिस्ट्रार एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले कभी भी संदिग्ध नागरिकों की जांच कर सकते हैं.

एनआरसी के प्रदेश संयोजक कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस सूची में शामिल लोगों को उनके आवासीय पतों पर पत्र भेज कर इसकी और नाम बाहर होने की वजहों की सूचना दी जा रही है. ऐसे लोग 11 जुलाई तक अपना पक्ष रख सकेंगे. अगर उनके पास नागरिकता से संबंधित सही दस्तावेज हुए तो सुनवाई और जांच के बाद उनके नाम दोबारा सूची में शामिल कर लिए जाएंगे.

ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट के निर्दोश पर राज्य में अवैध तरीके से रहने वाले विदेशी नागरिकों की शिनाख्त कर उनको बाहर निकालने के लिए एनआरसी की कवायद चल रही है. लेकिन इस पर शुरू से ही विवाद रहा है. शीर्ष अदालत खुद इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है. उसने विदेशी घोषित लोगों और उनके वंशजों को एनआरसी से बाहर रखने को कहा है. इसी तरह संदिग्ध वोटरों और उन लोगों को इस सूची से बाहर रखने का निर्देश दिया गया है, जिनके मामले विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित हैं. बीते साल एनआरसी के मसिवदे के प्रकाशन के बाद 40 लाख लोगों को इससे बाहर रखा गया था. उनमें से लगभग 36 लाख ने दोबारा दस्तावेजों के साथ अपना दावा पेश किया है.

बिहार की महिला भी विदेशी घोषित

असम में कई दशकों से रहने वाली बिहार की एक महिला को विदेशी घोषित कर डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया है. इस महिला अमिला शाह के पिता का नाम केशव प्रसाद है और उनका जन्म बिहार का नालंदा में हुआ था. उनके पिता वर्ष 1948 में ही असम के प्रतापगढ़ चाय बागान में नौकरी करने आए थे. लेकिन अमिला के पास इस बात को साबित करने के दस्तावेज नहीं थे. दिलचस्प बात यह है कि शाह के परिवार के बाकी सदस्यों के नाम एनआरसी के मसविदे में शामिल हैं. शाह के भाई रमेश गुप्ता बताते हैं, "हम वास्तव में भारतीय हैं. हम मूल रूप से बिहार के हैं लेकिन कई पीढ़ियों से असम में रह रहे हैं. हमारे पिता बिहार से असम आए थे.” वह कहते हैं कि गरीब और अशिक्षित होने की वजह से उनके लिए दस्तावेज जुटाना काफी मुश्किल था.

अब अमिला का परिवार विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने की योजना बना रहा है. अमिला के बेटे भोला शाह कहते हैं, "यह एनआरसी का सवाल नहीं है. एनआरसी अवैध विदेशी प्रवासियों को हिरासत में लेने के लिए है. हम भारत के ही एक राज्य बिहार से यहां आए हैं. मेरी मां विदेशी कैसे हो सकती है.”

इस बीच, विभिन्न संगठनों ने एनआरसी की ताजा सूची पर मिली-जुली प्रतिक्रिया जताई है. प्रदेश कांग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं, "एनआरसी का मकसद तो ठीक है. लेकिन इसकी प्रक्रिया ठीक नहीं है. इसमें जाने-अनजाने वैध नागरिक भी बलि का बकरा बन रहे हैं. 40 लाख लोगों के भविष्य पर पहले से ही तलवार लटक रही थी. अब और एक लाख लोग इसमें जुड़ गए हैं.” बीजेपी ने यह कह कर इससे पल्ला झाड़ लिया है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है. लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने का पर्याप्त मौका दिया गया है. लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरी कवायद पर सवाल उठाते हुए कहा है कि नागरिकता साबित करने की प्रकिया पूरी तरह दुरुस्त नहीं थी. एक मानवाधिकार कार्यकर्ता सोमेन गोहांई कहते हैं, "पीढ़ियों से यहां रहने वाले लोग विदेशी कैसे हो सकते हैं? इससे साफ है कि इस प्रक्रिया में कई खामियां हैं.”

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