Satya Darshan

जल संकट का समाधान

सरोकार | जून 17, 2019

यह एक शनिवार को सुबह 8 बजे की बात है। बेंगलूरु की उलसूर झील में सुबह घूमने वालों की भीड़ जमा हो जाती है। झील के पास जाने के बजाय ये लोग उन वालेंटियर्स के तौर पर शामिल होने के लिए यहां कतार में खड़े होते हैं जो उलसूर को अनिश्चित भविष्य से बचाना चाहते हैं। बड़ी तादाद में लोग इस प्रयास में शामिल हुए हैं। 

इस मुहिम से पहले ही जुड़ चुका चार लोगों का एक परिवार उस गलियारे को टकटकी लगाकर देख रहा है जो 123.6 एकड़ की झील वाले द्वीपों से घिरा हुआ है। परिवार का बुजुर्ग मुखिया कहता है, 'हमें इस गलियारे के लिए कम से कम 500 लोगों की जरूरत है।' उनकी पोती कहती है, 'हमें बड़ी संख्या में ठेला गाडिय़ों की जरूरत है। इस इलाके में बड़े पैमाने पर प्लास्टिक, पेपर कप, बोतलों और खराब कपड़ों का अंबार लगा हुआ है।' जल्द ही इस परिवार से कई और लोगों के जुडऩे की संभावना है।

हलासुरू रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव धु्रव नागरकट्टी कहते हैं, 'हमने पुन: इस्तेमाल के मकसद से 100 गार्बेज बैग (कूड़ा रखने के बोरे) एकत्रित किए थे, लेकिन हमें बाहर जाने तथा ज्यादा बैग हासिल करने थे।' किसी को उम्मीद नहीं थी कि कूड़ा चुनने के लिए सप्ताहांत में सुबह सुबह लगभग 800 लोग आगे आएंगे। लेकिन ऐसा हुआ और ये लोग अपने परिवारों और दोस्तों के साथ आए। भले ही कुछ ने इसके लिए एक घंटा ही काम किया। 

दो लड़कियां बेहद उत्सुकता से अपनी बारी का इंतजार कर रही थीं, जबकि कई वयस्क हाथ में दस्ताने पहने और मुंह पर मास्क लगाकर कचरा उठा रहे थे। इनमें शामिल 10 वर्षीय नित्या ने कहा, 'बच्चों को वहां जाने की अनुमति नहीं है, इसलिए हम आसपास के इलाकों से कूड़ा उठाएंगे।'

झील के संरक्षक आनंद मल्लिगावड ने लोगों को कई टोलियों में विभाजित किया और उन्हें इसके बारे में बताया कि वे सही ढंग से कैसे कचरा उठा सकते हैं। वह माइक्रोफोन में बोल रहे थे, 'जल है तो जीवन है।'बेंगलूरु में पानी का प्रमुख स्रोत और तमिलनाडु के साथ संघर्ष का कारण रही कावेरी यहां से लगभग 140 किलोमीटर दूर बहती है। 

16वीं सदी में गौडाओं (कैम्पे गौडा 1 ने शहर की सीमाएं स्थापित कीं) द्वारा निर्मित इसकी कई झीलें और तालाब शहर के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, गैर-शोधित सीवर व्यवस्था और रसायन प्रदूषकों जैसे कारकों से इन जल स्रोतों को खतरा पैदा हुआ है।

सरकारी रिकॉर्डों के अनुसार, 1960 में शहर में 262 जल स्रोत थे। हाल के वर्षों में, बस स्टैंड, आवासीय समितियों और स्टेडियमों ने इनमें से कई का अस्तित्व समाप्त कर दिया है। आखिरकार, सिर्फ 81 जल स्रोत बरकरार हैं और सिर्फ 34 ही चालू झीलों के रूप में शेष बचे हैं। इनमें से कुछ प्रदूषण की वजह से समाप्त हो चुके हैं। अन्य जल स्रोत मायावी हिमखंडों के तौर बेकार हो गए हैं। इसलिए ये बदबूदार और झागदार झीलें दुर्भाग्य का प्रतीक बन गई हैं जिसके लिए बेंगलूरु को वैश्विक मानचित्र पर जाना जाता है। 

द गार्जियन अखबार ने 2017 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था, 'विश्लेषकों को आशंका है कि वर्ष 2025 तक बेंगलूरु रहने के लिहाज से उपयुक्त नहीं रह जाएगा।'इस तरह की सुर्खियां अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया दोनों में लगातार जगह बना चुकी हैं। मल्लिगावड कहते हैं, 'इसे लेकर मेरी रातों की नींद गायब हो गई और आखिरकार मैंने झीलों को बचाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी।'

मैकेनिकल इंजीनियर मल्लिगावड शुरू में सनसेरा फाउंडेशन में कॉरपोरेट परियोजनाओं के प्रमुख थे। यह बेंगलूरु में एक प्रमुख गैर-लाभकारी संगठन है। वह झील पुनरुद्घार परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पिछले पांच साल से प्रयासरत हैं। वह कहते हैं, 'हमारी योजना वर्ष 2025 तक 45 झीलों को बचाने की है। वह ह्यूलिट-पैकर्ड जैसी कंपनियों की मदद से इस दिशा में तेजी से काम कर  रहे हैं। वह तीन झीलों - क्यालासानाहल्ली, गवी केरे और वैबासैंड्रा का अस्तित्व पहले ही बचा चुके हैं।'  

मल्लिगावड सवालिया अंदाज में कहते हैं, 'मैं कोप्पल (सूखा प्रभावित इलाका) से बेंगलूरु आया। कई अन्य लोग भी यहां आए और उन्होंने झीलों के पास मकान खरीदे। यदि हम इन्हें खो देंगे तो हम कहां जाएंगे?' जब टाटा स्टील के पूर्व वाइस-चेयरमैन बी मुत्तुरामन छह साल पहले निर्मित अपने घर में रहने के लिए 2014 में बेंगलूरु आए तो वह स्तब्ध रह गए। उनके घर के सामने 36 एकड़ में फैली क्यालासानाहल्ली झील खेल मैदान और कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुकी थी। मल्लिगावड इसे लेकर परेशान हो गए और उन्होंने मानव श्रम और संसाधन जुटाने के लिए लगभग 200 दरवाजों को खटखटाया। 

उन्होंने 45 दिन में झील का कायाकल्प किया। यह दो साल पहले की बात है और तब से मल्लिगावड ने अपनी कोशिश बरकरार रखी है। उनके पास अक्सर फोन आते रहते हैं। नागरिक-केंद्रित ट्रस्ट शहर की झीलों को बचाने के लिए आगे आए हैं और वे सभी अपने इलाकों में जल स्रोतों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी समाधान तलाश रहे हैं। नालों का प्रवाह मोडऩे और सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र लगाने से लेकर अतिक्रमण हटाना झीलों की प्रमुख जरूरतें हैं।  

नागरकट्टी का कहना है, 'ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका हम एक दिन में समाधान नहीं निकाल सकते, और यह ऐसे कार्य भी नहीं हैं जो हम सब स्वयं ही कर सकें।' वह कहते हैं कि यह देखना सुखद है कि लोग उलसूर के स्वच्छता अभियान के लिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

उलसूर को अभी भी लंबा रास्ता तय करना है, लेकिन यहां अब स्थानीय नागरिकों के साथ साथ बृहत बेंगलूरु महानगर पालिके और प्रेस्टीज गु्रप जैसी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ी है। बेंगलूरु में घूमने पर आप इस शहर के विशाल जल भंडारों की कहानी सुन सकते हैं। शहर के बाहरी छोर पर रह रहे एक नागरिक ने बताया, 'पड़ोसी गांवों के लोग धान के खेतों में काम करने में हमारी मदद के लिए आते हैं। ये खेत गांव के बांध के नजदीक थे।'  

नागरिकों के समूह इबलुर लेक फोरम के सदस्य नरेश सदासिवन कहते हैं, 'इबलुर लेक के आसपास अपार्टमेंट पिछले 8-9 वर्षों में ही दिखे हैं। इसके आसपास रहने वाले कई लोगों ने अपने समय में झील नहीं देखी।' हाईवे और इन नए अपार्टमेंटों के लिए सड़कों ने 18 एकड़ की झील के एक बड़े हिस्से का अस्तित्व समाप्त कर दिया। अन्य हिस्सा अतिक्रमण का शिकार हो गया या स्थानीय बेंगलूरु विकास प्राधिकरण द्वारा सीवेज प्रणाली के अनियंत्रित गड्ढों की चपेट में आ गया। 

वर्ष 2016 में, सदाशिवन और डेटा वैज्ञानिक एवं सामुदायिक नेता मुकुंद कुमार जैसे लोगों ने बृहद बेंगलूरु महानगर पालिके को झील के संरक्षक की जिम्मेदारी लेने के लिए राजी किया। नागरिक समूहों, प्राधिकरणों और गैर-लाभकारी संगठन यूनाइटेड वे बेंगलूरु के बीच भागीदारी के बाद इबलुर झील ने लंबा सफर तय किया है। पिछले साल इससे लगभग 1500 ट्रक कचरा निकाला गया। अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है और मॉनसून भी आ चुका है। ऐसे में इबलुर को अब नई जिंदगी मिल सकती है।

सदाशिवन का कहना है कि नागरिकों को ऐसी परियोजनाओं से गंभीरता से जुडऩा जरूरी है। यह एक ऐसा अनुभव है जो पूरे शहर के लोग तेजी से हासिल कर रहे हैं। चेन्नई में जन्मी फिल्म निर्माता प्रिया रमासुब्बन का कहना है, 'झीलों के संदर्भ में लोगों की लापरवाही से हमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।' उन्हें 2008 में 48 एकड़ की कैकोंड्राहल्ली झील के दलदली इलाके में जाने को मजबूर होना पड़ा था। अधिकारियों के साथ कई घंटों की बातचीत की गई और पैसा जुटाने के लिए निवासियों का समर्थन हासिल करने के प्रयास किए गए। 

2011 में महादेवपुरा परिसरा संरक्षणे माटु अभिवृद्घि समिति (मैपसास) की स्थापना की गई। यह समिति इलाके में झीलों के रखरखाव में सरकारी अधिकारियों के साथ भागीदारी के लिए जिम्मेदार थी।

इसके चार साल बाद नीति आयोग ने इसे भारत में दो सफल झील पुनरुद्घार परियोजनाओं में से एक के तौर पर करार दिया। अन्य परियोजना राजस्थान के मानसागर में थी। फिर भी, झील को के अस्तित्व को बनाए रखने का संघर्ष बरकरार रहा, क्योंकि अतिक्रमणकारी इसे अपने बफर जोन के तौर पर दावा कर रहे थे। झीलों को बचाने का संघर्ष लंबा और चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन इस तरह की सफलता बेंगलूरु वासियों को लगातार प्रोत्साहित कर रही है।

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