Satya Darshan

क्योटो की इन जापानी कलाकारों को दुनिया सेक्स वर्कर समझती है

विश्व दर्शन | जून 17, 2019

बरसों की ट्रेनिंग और दशकों की प्रैक्टिस, तब जाकर कोई जापानी लड़की एक गाइशा कलाकार बनती है. लेकिन विदेशी लोगों में यह गतलफहमी आम है कि गाइशा परफॉर्मर सेक्स वर्कर हैं. ऐसा क्यों है?

नोरी ने अभी सुबह की डांस प्रैक्टिस पूरी की है और उसे झटपट दूसरी क्लास के लिए तैयार होना है. राजधानी टोक्यो के असाकुसा गाइशा डिस्ट्रिक्ट में हर कोई इसी तरह की आपाधापी में है. दरअसल यहां सात साल में एक बार होने वाले असाकुसा ओदोरी डांस फेस्टिवल की तैयारियां चल रही हैं जो इस साल अक्टूबर में होगा.

इसमें पांरपरिक गाइशा डांस, म्यूजिक और पार्टियां होती हैं जहां नोरी और उसकी दूसरी साथी अपने कद्रदानों के जाम भरती हैं, उनसे हंसी मजाक करती हैं, जोक मारती हैं और फ्लर्ट भी करती हैं. लेकिन इस सबसे पहले सख्त ट्रेनिंग होती है. नोरी कहती हैं, "अभी हम बहुत ही व्यस्त हैं क्योंकि यह बहुत बड़ा फेस्टिवल होता है और हमें इसके लिए परफेक्ट होना है. हालांकि मैंने अपना गाइशा घराना 20 साल पहले जॉइन किया था, लेकिन गाइशा में सीखने का सिलसिला कभी नहीं थमता."

'गाइशा' का शाब्दिक अर्थ होता है व्यक्ति. क्योटो में पारंपरिक शब्द 'गाइको' इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है कला की औरत. जापान में महिला गाइशा कलाकारों की परंपरा 600 साल पुरानी है, जब शिक्षित युवा महिलाएं सामाजिक अवसरों पर अपने कद्रदानों का मनोरंजन कर रोजी रोटी कमाती थीं. जो महिलाएं नाचने, गाने और कोई वाद्य यंत्र बजाने में अच्छी थीं, उनकी उस वक्त कुलीन समाज में बड़ी मांग होती थी.

गाइशा संस्कृति पर रिसर्च करने वाले और 1993 से क्योटो में रहे कनाडाई लेखक पीटर मेसिंतोश कहते हैं, "1920 और 1930 के दशकों में जापान के शहरों और कस्बों में 80 हजार गाइशा कलाकार हुआ करती थीं, लेकिन अब मान्यता प्राप्त सिर्फ 47 डिस्ट्रिक्ट में 800 ऐसी कलाकार हैं."

वह कहते हैं कि दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने तक भी जापान में महिलाओं के लिए करियर के विकल्प बहुत सीमित थे. वे या तो नौकर, सेक्स वर्कर या गाइशा डांसर बन सकती थीं या फिर शादी कर लेती थीं. लेकिन वह कहते हैं कि युद्ध ने महिलाओं के लिए बहुत सारे अवसर खोल दिए और वे ज्यादा स्वतंत्र हो सकीं.

मेसिंतोश कहते है कि जापान के आर्थिक बुलबुले के चरम के वक्त 1980 में गाइशा डिस्ट्रिक्ट को बड़ी मार झेलनी पड़ी. इसकी वजह थी बड़ी संख्या में खुलने वाले काराओके बार और होस्टेस क्लब, जहां मनोरंजन के कई साधन मौजूद थे. लेकिन हाल के सालों में गाइशा की दुनिया में फिर से बहार आने लगी है. मेसिंतोश कहते हैं, "पिछले 10 साल में एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि महिलाएं भी गाइशा परफॉर्मेंस देखने जाने लगी हैं क्योंकि वे पारंपरिक अंदाज में अपना मनोरंजन करना चाहती हैं. पहले सिर्फ वहां पुरुष जाते थे. लेकिन अब जापानी युवतियों के पास दूसरी अच्छी नौकरियां हैं जिनमें बढ़िया सैलरी मिलती है और वे जिस पर चाहें, अपना पैसा खर्च करती हैं."

गाइशा कलाकार बड़े विग पहनती हैं, जिनमें चमकती चीजें जड़ी होती हैं. इनके जरिए वे देखने वालों की नजर अपनी तरफ खींचती हैं. उनके चेहरे पर पारंपरिक सफेद मेकअप होता है. आंखों और होठों को उभारने के लिए पिंक या लाल मेकअप के शेड का इस्तेमाल किया जाता है.

क्योटो में गाइको इवेंट कराने वाली एक कंपनी से जुड़ीं नाओमी मानो कहती हैं कि जो महिलाएं इस करियर को चुनती हैं, उनका जापानी समाज में बहुत सम्मान है. वह कहती हैं, "ये महिलाएं बहुत ही प्रोफेशनल और अपनी कला में माहिर होती हैं. यह समझना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि ये किसी भी तरह से देह व्यापार से जुड़ी हैं. युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह गलतफहमी फैलाई गई थी." वह बताती हैं कि युद्ध के समय "गाइशा लड़कियों" का इस्तेमाल वेश्याओं के लिए किया जाता है, लेकिन एक असली गाइशा कलाकार को यह जानकर बहुत धक्का लगेगा कि कोई पुरुष उसे पैसों के बदले अपने साथ रात गुजराने की पेशकश करे.

फिर भी नोरी कहती हैं कि गाइशा की दुनिया आधुनिक जापान में बड़े दबाव से गुजर रही है. उनके मुताबिक, "जब मैंने शुरुआत की थी, तो असाकुसा में 60 गाइशा कलाकार थीं, लेकिन अब उनकी संख्या घट कर 20 रह गई है और उस इलाके में सिर्फ चार ही रेस्तरां हैं जहां पर हम परफॉर्म कर सकते हैं." वह कहती हैं, "चीजें बदल रही हैं, लेकिन मुझे विश्वास है कि हम अपनी इस संस्कृति को जीवित रख पाएंगे."

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