Satya Darshan

हकीकत की पड़ताल

संपादकीय | जून 13, 2019

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के ताजा शोध ने भारत के आर्थिक आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर बहस तेज कर दी है। अब यह शोध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर इंटरनैशनल डेवलपमेंट के शोध-पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में डॉ. सुब्रमण्यन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़ों की तथाकथित 'नई श्रृंखला' की पड़ताल की है। उन्होंने वास्तविक जीडीपी के आकलन के लिए नई श्रृंखला के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुमानों की तुलना उस पिछली प्रणाली से की है, जिसमें आधार वर्ष अलग और पहले का था। 

उन्होंने पाया है कि जीडीपी की नई शृंखला का अर्थव्यवस्था के अन्य संकेतकों के साथ तालमेल पुरानी श्रृंखला की तुलना में कम है। यह तालमेल इतना कम है कि भारत तुलनात्मक अर्थव्यवस्थाओं में बिल्कुल अलग हो गया है। पत्र में पुरानी एवं नई श्रृंखला और समकक्ष अर्थव्यवस्थाओं के आंकड़ों की तुलना की गई है। इसमें अनुमान जताया गया है कि जीडीपी वृद्धि अनुमान से कई प्रतिशत बिंदु कम हो सकती है। 

गौरतलब है कि पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने 2000 के दशक में वृद्धि के लिए नीति आयोग द्वारा हाल में जारी 'पिछली श्रृंखला' या हाल की वृद्धि के लिए संशोधित नई श्रृंखला का इस्तेमाल नहीं किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि ये दोनों हाल की वृद्धि को और अधिक बढ़ा देंगी। उनके शोध के दायरे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन दोनों सरकारों के कार्यकाल के वर्ष शामिल हैं, इसलिए शोध राजनीति प्रेरित होने के कयास लगाना अनुचित है।

जीडीपी वृद्धि दर को जिस हद तक बढ़ाचढ़ाकर पेश किए जाने की बात कही जा रही है, उसे लेकर तर्क किया जा सकता है। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है कि वास्तविक जीडीपी की दर 4.5 फीसदी या उससे अधिक है अथवा नहीं। उक्त पर्चा उसी बात को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करता है जिसके बारे में बहुत पहले से संदेह था कि आधिकारिक जीडीपी आंकड़े विभिन्न स्वतंत्र आर्थिक कारकों मसलन निर्यात और माल परिवहन आदि से मेल नहीं खाते। 

डॉ. सुब्रमण्यन ने सीईए रहते हुए भी अपनी बात रखी थी। उस वक्त उन्होंने दलील दी थी कि एक ऐसी अर्थव्यवस्था में वृद्धि हासिल करना बहुत मुश्किल है जहां निर्यात और ऋण तथा निवेश स्थिर हों या उनमें गिरावट आ रही हो। इस बात का निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए काफी गहन अर्थ है। 

इसे कतई खारिज नहीं किया जाना चाहिए। अधिकारियों का कहना है कि नई श्रृंखला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य तौर तरीकों का प्रयोग कर तैयार की गई है। यह बात सही हो सकती है लेकिन इससे तुलनात्मकता और विश्वसनीयता जैसे मूलभूत प्रश्नों के जवाब नहीं मिलते। चाहे जो भी प्रक्रिया या तरीका अपनाया जाए, अंतिम नतीजों की जांच आवश्यक है और यह स्पष्ट है कि वृद्धि के मौजूदा तौर तरीके इस पर खरे नहीं उतरते।

अगर आंकड़ों की विश्वसनीयता बहाल करनी है तो आधिकारिक सांख्यिकी के लिए इस्तेमाल पद्धति और नतीजों की फिर से स्वतंत्र जांच जरूरी है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने डॉ. सुब्रमण्यन के शोध पत्र को सर्वाधिक अनावश्यक कवायद करार देते हुए कहा कि वह इसका बिंदुवार खंडन जारी करेगी। यह अकादमिक जगत की बहस में एक मूल्यवान योगदान होगा लेकिन इतनी प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। 

डॉ. सुब्रमण्यन ने नए जीडीपी अनुमान की प्रक्रिया के नए सिरे से परीक्षण की पृष्ठभूमि तैयार की है। इसका असर उच्च वृद्धि के अनुमानों पर भी पड़ेगा जिनके आधार पर नीति निर्माता काम करते हैं। ऐसे में यह स्वीकार करना ही उचित होगा कि देश की वृद्धि के आंकड़ों पर बादल मंडरा रहे हैं और इन्हें पारदर्शिता बढ़ाकर और हकीकत से इनकी दूरी की जांच करके ही छांटा जा सकता है।

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