Satya Darshan

नयी शिक्षा नीति पर तेज होता हिंदी-विरोधी स्वर

प्रभाकर | जून 4, 2019

एनडीए सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद त्रिभाषा फार्मूले संबंधी नई शिक्षा नीति के मसविदे पर विवाद गहरा गया है. तमिलनाडु और कर्नाटक के अलावा पश्चिम बंगाल में भी हिंदी थोपने के कथित प्रयासों का विरोध तेज हो रहा है.

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद त्रिभाषा फार्मूले संबंधी नई शिक्षा नीति के मसविदे पर विवाद गहराने लगा है.

इसरो के पूर्व अध्यक्ष के.कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने बीते शुक्रवार को शिक्षा नीति का जो नया मसविदा पेश किया, उसमें गैर-हिंदीभाषी राज्यों में स्थानीय भाषा और अंग्रेजी के साथ ही हिंदी सीखने की भी सिफारिश की गई है. लेकिन इस मुद्दे पर विरोध के तेज होते स्वरों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार अब डैमेज कंट्रोल पर उतर आई है. उसने सफाई दी है कि सरकार किसी भी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपेगी.

त्रिभाषा फॉर्मूला

नई शिक्षा नीति का इंतजार लगभग दो साल से किया जा रहा था. कस्तूरीरंगन समिति ने बीते शुक्रवार को मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को इसका मसविदा सौंपा था. नई शिक्षा नीति के मसविदे में कहा गया है कि एक अजनबी भाषा में अवधारणाओं पर समझ बनाना बच्चों के लिए मुश्किल होता है और अक्सर उनका ध्यान इसमें नहीं लगता. जहां तक संभव हो, कम से कम पांचवी कक्षा तक बच्चों की पढाई मातृभाषा में ही होनी चाहिए. 

इसमें कहा गया है कि छोटे बच्चों की सीखने की क्षमताओं को पोषित करने के लिए प्री-स्कूल और पहली कक्षा से ही तीन भाषाओं से अवगत कराया जाना चाहिए ताकि तीसरी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे इन भाषाओं में बोलने के अलावा लिपि भी पहचानने लगें.

समिति ने कहा है कि बहुभाषी देश में बहुभाषिक क्षमताओं के विकास और उनको बढ़ावा देने के लिए त्रिभाषा फार्मूले को अमल में लाया जाना चाहिए. अगर कोई विदेशी भाषा भी पढ़ना और लिखना चाहे तो यह इन तीन भारतीय भाषाओं के अलावा चौथी भाषा के तौर पर पढ़ाई जाए.

वैसे, सबसे पहले 1968 में जारी की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले का जिक्र किया गया था. इसके अनुसार हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ाए जाने की बात कही गई थी. गैर-हिंदीभाषी राज्यों के लिए मातृभाषा और अंग्रेजी के अलावा हिंदी पढ़ाई जानी थी. लेकिन इस नीति को कभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया.

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक आयोग ने वर्ष 2009 में त्रिभाषा फार्मूले को सख्ती से लागू करने की सिफारिश की थी. लेकिन उस पर भी अमल नहीं किया गया.

विरोध

अब खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी थोपने के इस कथित प्रयास का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है और तमाम राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज उठाई है. तमिलनाडु में डीएमके के सांसदों ने इसका विरोध करते हुए चेताया है कि अगर हिंदी को थोपने का प्रयास किया गया तो फिर आंदोलन होगा.

डीएमके राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा ने केंद्र को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर केंद्र सरकार ने तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी भाषा को थोपने की कोशिश की तो प्रदेश के लोग सड़क पर उतरकर इसका पुरजोर विरोध करेंगे. तिरुचि कहते हैं, "सरकार अगर हिंदी को अनिवार्य रूप से लागू करती है तो यह आग में घी डालने जैसा होगा और प्रदेश के युवा इसके खिलाफ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करेंगे. वर्ष 1965 का हिंदी-विरोधी आंदोलन इस बात की मिसाल है.”

डीएमके के अध्यक्ष स्टालिन कहते हैं, "त्रिभाषा फार्मूले से देश बंट जाएगा. तमिलनाडु में द्विभाषा नीति लागू है. अब बीजेपी अगर त्रिभाषा नीति को लागू करती है तो यह मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने की तरह होगा.” तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के.ए.अलागिरी कहते हैं, "केंद्र सरकार को किसी भी छात्र को जबरन हिंदी सीखने पर मजबूर नहीं करना चाहिए. छात्रों को अपनी पसंद की भाषा सीखने की छूट होनी चाहिए.” सीपीआई और सीपीएम के अलावा बीजेपी की सहयोगी पीएमके ने भी नई शिक्षा नीति का विरोध किया है. मक्कल निधि मैयम (एमएनएम) नेता कमल हासन कहते हैं, "मैंने कई हिंदी फिल्मों में काम किया है. लेकिन मेरी राय में हिंदी को किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए.”

शिक्षा नीति का यह विरोध पड़ोसी कर्नाटक से होते हुए अब पश्चिम बंगाल तक पहुंच गया है. यहां लेखकों व बुद्धिजीवियों के एक समूह ने केंद्र से बंगाल के स्कूलों पर जबरन हिंदी नहीं थोपने की चेतावनी दी है. राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लागू करने का मतलब हिंदी को थोपना है. केंद्र ने राज्यों से सलाह-मशविरा किए बिना एकतरफा तरीके से इस शिक्षा नीति को तैयार किया है. लेकिन बंगाल सरकार इसको स्वीकार नहीं करेगी.”

सीपीएम पोलितब्यूरो की ओर से रविवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि इस तरह जबरन किसी भाषा को थोपना देश की एकता के हित में नहीं है. पार्टी ने इसके खिलाफ सड़को पर उतरने की चेतावनी दी है.

रबींद्र भारती विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर और जाने-माने भाषाविद पवित्र सरकार कहते हैं, "समिति की सिफारिशों के तहत हिंदी थोपने से प्राइमरी के छात्रों पर दबाव बढ़ेगा. मौजूदा शिक्षा प्रणाली के चलते छात्रों पर पहले से ही काफी दबाव है.” वह कहते हैं कि पहली कक्षा से हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य करना उचित नहीं है. इसकी बजाय गैर-हिंदीभाषी राज्यों में हिंदीभाषी लोगों को स्थानीय भाषा सीखना चाहिए. मशहूर बांग्ला लेखक शीर्षेंदु मुखर्जी कहते हैं, "किसी भी भाषा को जबरन थोपना सही नहीं है. कौन व्यक्ति कौन सी भाषा सीखेगा, यह उसका निजी फैसला होना चाहिए.”

केंद्र की सफाई

शिक्षा नीति के बढ़ते विरोध को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार अब डैमेज कंट्रोल की कवायद पर उतर आई है. मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल कहते हैं, "सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए कृतसंकल्प है. किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी.” उनका कहना है कि मसविदे पर विभिन्न पक्षों और आम लोगों की राय के बाद ही कोई अंतिम फैसला किया जाएगा.

दक्षिण भारतीय राज्यों में कथित तौर पर हिंदी भाषा थोपने को लेकर जारी विरोध पर पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, "किसी पर कोई भाषा थोपने का विचार नहीं है. हम देश की सभी भाषाओं को प्रमोट करना चाहते हैं.” त्रिभाषा फार्मूले पर वह कहते हैं कि अभी यह प्रस्ताव है. आम लोगों की राय के बाद ही इस पर कोई फैसला किया जाएगा. नई शिक्षा नीति का मसविदा प्रकाश जावड़ेकर के मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए तैयार किया गया था.

View More

Search

Search by Date

जनमत

वाराणसी से पीएम मोदी लोस चुनाव 2019 जीतेंगे?

Navigation

Follow us

Mailing list

Copyright 2018. All right reserved