Satya Darshan

नये मानव संसाधन मंत्री के सामने हैं कई चुनौतियां

विनय जी | जून 3, 2019

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री के रूप में रमेश पोखरियाल का काम काफी चुनौतीपूर्ण है। अपने सहयोगी प्रकाश जावड़ेकर के उत्तराधिकारी के रूप में मानव संसाधन विकास मंत्री का कार्यभार संभालने के पहले ही दिन पोखरियाल को अपने काम की शुरुआत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के मसौदे के तहत हिंदी थोपे जाने के दक्षिण भारतीय शिक्षा बिरादरी के डर को दूर करने के साथ करनी पड़ी। 

इस मसौदा नीति को तैयार करने में जुटी समिति ने हाल ही में पोखरियाल को इसका मसौदा सौंपा है। इसे लागू करने से पहले वह अब इसकी महत्त्वपूर्ण चीजों पर काम करेंगे। अब देखना यह है कि इस मसौदे में दिए गए सुझाव किस हद तक इस नीति का हिस्सा बनेंगे। इस नीति को बड़े पैमाने पर स्कूली और उच्च शिक्षा के हलकों से मंजूरी और समर्थन मिला है। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) की पिछली रिपोर्टों के कई सुझावों को इस मसौदा नीति में जगह मिली है जो महासंघ की सहायक महासचिव और शिक्षा सलाहकार शोभा घोष के शब्दों में 'प्रगतिशील' हैं।

घोष ने बताया, 'हम वर्षों से धन की अलग व्यवस्था, मानकों और मान्यता तंत्र की वकालत कर रहे हैं जिसे अब शामिल कर लिया गया है। यह नीति उस अति महत्त्वपूर्ण उच्चतर शिक्षा विनियामकीय संस्था के बारे में भी बात करती है जो हमने सुझाया है। हम पिछले 2-3 वर्षों से अमेरिका के राष्ट्रीय विज्ञान कोष की तर्ज पर एक राष्ट्रीय अनुसंधान कोष की स्थापना करने की सिफारिश कर रहे हैं जिसे अब इस नीति में शामिल कर लिया गया है। इस नीति में शिक्षा के एकीकरण की भी बात की गई है।'

फिक्की की इस रिपोर्ट - विजन 2030 में विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालयों की स्थापना का भी सुझाव दिया गया था। इसे इस नीति में उच्च शिक्षा के त्रि-स्तरीय संरचना के रूप में जगह मिली है। ये शोध विश्वविद्यालय, पेशेवर विश्वविद्यालय और जीवन कौशल शिक्षण विश्वविद्यालय हैं। शिक्षा क्षेत्र में जिन बातों पर मंत्री द्वारा तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है उनमें धन की व्यवस्थामें सुधार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीयकरण भी शामिल है जिसके बारे में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के घोषणापत्र में भी बात की गई थी।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-गुवाहाटी (आईआईटी-जी) के निदेशक गौतम विश्वास का कहना है कि ऋण- आधारित अनुदान को राजस्व के साथ जोड़ा जाना अच्छा विचार है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को ज्यादा दिक्कत के बिना लाभ मिल सके। सरकार से संबद्ध और निजी कॉलेजों को अच्छे ढंग से बढऩे के लिए ज्यादा पैसे की आवश्यकता होती है और इसलिए सरकार धन के अधिक समान वितरण पर विचार कर सकती है। केपीएमजी इंडिया के साझेदार और प्रमुख (शिक्षा एवं कौशल विकास क्षेत्र) नारायणन रामास्वामी भी  शिक्षा में और ज्यादा निजी धन की बात करते हैं। 

वह कहते हैं, 'धन (निजी) को शिक्षा में लाने पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि इस क्षेत्र में बहुत अधिक धन की आवश्यकता है और मुझे नहीं लगता कि सरकार के पास पूरा पैसा है। धन जुटाने और संबंधित क्षेत्रों के संबंध में सरकार को कुछ कम कठोर और विश्वविद्यालय की संरचना के लिहाज से कुछ खुलापन अख्तियार करना चाहिए।' 

बेहतर अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि विश्वविद्यालयों के परिसर और पाठ्यक्रम घरेलू छात्रों के साथ-साथ विदेशी छात्रों के लिए भी आकर्षक हों। इसके लिए विश्वास और रामास्वामी ने 'स्टडी इन इंडिया' पहल जारी रखने की बात कही है। चिंता की दूसरी बात है सरकारी की कानून, इंजीनियरिंग और प्रबंधन में सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना जिसके बारे में शिक्षा विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इससे समाधान नहीं हो सकता है।

घोष का कहना है कि भारत में इंजीनियरिंग की ज्यादा सीटें हैं लेकिन इन्हें लेने वाला कोई नहीं है क्योंकि जो कार्यक्रम पेश किए गए हैं वे उद्योग 4.0 युग के लिए प्रासंगिक नहीं हैं। बड़े स्तर पर बहु-विषयक और अंतर-विषयक कार्यक्रमों, डेटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम मेधा (एआई) आदि की आवश्यकता है। हमें भविष्य में उद्योग सम्मत नौकरी की भूमिकाओं को पहचानने की जरूरत है। ऐसे मॉड्यूलर कार्यक्रम शुरू करने चाहिए जिन्हें करियर के साथ-साथ सीखा जा सकता हो। रामास्वामी कहते हैं कि अगले पांच सालों में हमें ऐसी स्पष्ट नीतियां लानी चाहिए कि शिक्षा में प्रौद्योगिकी का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है।

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