Satya Darshan

मात खायीं ममता के अब कैसे हैं मिजाज

प्रभाकर | मई 30, 2019

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी राज्य में अपनी पार्टी के लिए भावी रणनीति बनाने में जुट गई हैं. कुछ मंत्रियों के विभाग बदले तो कुछ की छुट्टी ही कर दी.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी की ओर से लगे झटके के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश करने वाली तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अब पार्टी की खामियों की शिनाख्त कर उसको चंगा करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. इसके तहत उनकी निगाहें पार्टी के उन नेताओं पर भी है जो कथित रूप से बीजेपी से मिले हुए हैं. दो-तीन वरिष्ठ नेता भी ममता के निशाने पर हैं. 31 मई को होने वाली तृणमूल की अंतिम समीक्षा बैठक में ममता अपनी रणनीति का खुलासा करेंगी.

इधर, कोलकाता नगर निगम के 53 वार्डों में बीजेपी की जीत ने भी पार्टी की चिंता बढ़ा दी है. 'मिनी विधानसभा' चुनाव कहे जाने वाले कोलकाता नगर निगम चुनाव अगले साल होने हैं. ऐसे में बीजेपी सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए गंभीर खतरा बन सकती है.

दूसरी ओर, चुनावी नतीजों के बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच होने वाली हिंसक झड़पों में अब तक दो बीजेपी समर्थकों की मौत हो गई है और कम से कम 50 लोग घायल हो चुके हैं. इस बीच, पार्टी से छह साल के लिए निकाले गए विधायक शुभ्रांशु राय समेत तृणमूल के दो विधायकों और 60 से ज्यादा पार्षदों को अपने पाले में खींच कर बीजेपी ने पांच दिनों के भीतर ममता को दूसरा झटका दिया है.

ममता अब इन झटकों से उबरते हुए भावी रणनीति पर काम कर रही हैं. इसके तहत उन्होंने मंगलवार को मंत्रिमंडल में फेरबदल करते हुए दो मंत्रियों की छुट्टी कर दी और कई मंत्रियों के अधिकारों में कटौती कर दी.

तनातनी व कड़वाहट

अबकी लोकसभा चुनावों में जिन राज्यों पर सबकी निगाहें थीं उनमें पश्चिम बंगाल शीर्ष पर था. बीजेपी ने अबकी अपनी सीटें बढ़ाने के लिए यहां पूरी ताकत झोंक दी थी. नतीजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दूसरे नेताओं के साथ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट के तौर पर सामने आया. लगभग तीन महीने से दोनों दलों और उसके नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का जो दौर चला, उसकी बंगाल के चुनावी इतिहास में दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती.

कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान होने वाली हिंसा से दोनों दलों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया. अपनी रणनीति में बीजेपी को भारी कामयाबी भी मिली और उसके सीटों की तादाद जहां दो बढ़ कर 18 तक पहुंच गई वहीं वोट भी वर्ष 2014 के 17 फीसदी के मुकाबले बढ़ कर 40 फीसदी से ज्यादा हो गए.

नतीजों के बाद दो दिनों तक चुप्पी साधे बैठी ममता ने इसकी समीक्षा के लिए अपने आवास पर आयोजित पार्टी की आपातकालीन बैठक में अपने इस्तीफे की पेशकश कर सबको हैरत में डाल दिया. उन्होंने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी पर आपातकालीन हालात पैदा करने, केंद्रीय बलों को तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करने और चुनाव आयोग पर बीजेपी के पक्ष में काम करने का आरोप भी लगाया. लेकिन पार्टी के तमाम नेताओं ने एक स्वर में उनकी इस पेशकश को खारिज कर दिया.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल, इस्तीफा देने की पेशकश कर एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया है. इससे उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वास्तव में वह बंगाल के लोगों की सबसे बड़ी हमदर्द हैं और दूसरे वे आम लोगों से भावनात्मक रूप से और मजबूत जुड़ाव चाहती हैं. ममता अच्छी तरह जानती हैं कि उनकी जगह लेने वाला पार्टी में कोई नहीं है. बावजूद इसके आठ साल पहले सत्ता में आने के बाद चुनावी नतीजों की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने पहली बार इस्तीफे की पेशकश की थी.

ममता ने भगवा पार्टी की चुनौती से निपटने के लिए अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. वे 31 मई को होने वाली पार्टी की अंतिम समीक्षा बैठक में अपने प्रस्तावों को पेश करेंगी. एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बीजेपी की चुनौती से निपटने की खातिर पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए ममता कुछ कड़वे फैसले भी ले सकती हैं. अब उन्होंने सांगठनिक मामलों पर ज्यादा ध्यान देने का फैसला किया है.

इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के जिला अध्यक्ष और खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक ने आरोप लगाया है कि बीजेपी बंदूक की नोंक पर पार्षदों को अपने खेमे में ले जा रही है. दूसरी ओर, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अब टी-20 मैच शुरू हो गया है और पार्टी का लक्ष्य कम से कम ओवरों में अधिक से अधिक रन बनाना है.” वह कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद अब पार्टी का लक्ष्य अगले साल होने वाले कोलकाता नगर निगम चुनावों में जीत कर निगम पर कब्जा करना है.

मंगलवार को मुकुल राय के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के दो और माकपा के एक विधायक ने दिल्ली में बीजेपी का दामन थाम लिया. इनमें मुकुल राय के पुत्र व बीजापुर सीट से तृणमूल विधायक शुभ्रांशु राय, बिष्णुपुर के तृणमूल विधायक तुषार भट्टाचार्य और हेमताबाद के माकपा विधायक देवेंद्र नाथ राय शामिल हैं. पचास से ज्यादा पार्षदों के पाला बदलने की वजह से बीजेपी ने एक झटके में उत्तर 24-परगना जिले की चार नगरपालिकाएं तृणमूल के कब्जे से छीन ली हैं.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी के बेहतरीन प्रदर्शन के रणनीतिकार माने जाने वाले मुकुल राय दावा करते हैं, "तृणमूल कांग्रेस के कई विधायक संपर्क में हैं. धीरे-धीरे उनको शामिल करने के बारे में फैसला किया जाएगा.” बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अभी तो यह शुरुआत है. आने वाले दिनों में तृणमूल के कई और नेता व विधायक भी पार्टी में शामिल हो जाएंगे.

बढ़ती हिंसा

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही राज्य के विभिन्न इलाकों में बीजेपी व तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आ रही हैं. इसी सप्ताह उत्तर 24-परगना व नदिया जिले में दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई. इसके अलावा कूचबिहार, बांकुड़ा, बीरभूम, पश्चिम मेदिनीपुर, उत्तर व दक्षिण 24-परगना जिलों में इन झड़पों में 50 से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं. उत्तर 24-परगना जिले के भाटपाड़ा इलाके में तो मतदान के पहले से ही हिंसा होती रही है.

इस इलाके से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चार बार विधायक रहे अर्जुन सिंह ने इस बार बैरकपुर संसदीय सीट पर बीजेपी के टिकट पर लड़ते हुए पूर्व रेल मंत्री व तृणमूल उम्मीदवार दिनेश त्रिवेदी को हरा दिया.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता की असली चिंता अगले साल होने वाले कोलकाता नगर चुनाव और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव हैं. नगर निगम चुनावों को मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाता है.

एक राजनीतिक विश्लेषक सुप्रिय सेन कहते हैं, "बीजेपी भले शहरी इलाकों की लोकसभा सीटें तृणमूल से छीनने में नाकाम रही हो, उसने निगम के 144 में से 53 वार्डों में बढ़त बनाई है. इसी तरह विधानसभा की 294 में से 128 सीटों पर पार्टी को तृणमूल के मुकाबले ज्यादा वोट मिले हैं. कोलकाता नगर निगम बोर्ड पर तृणमूल का कब्जा है. ऐसे में ममता और तृणमूल के लिए खतरा गंभीर हो गया है. इसी वजह से ममता ने भावी खतरों गंभीरता समझते हुए उनसे निपटने के लिए अभी से ही कमर कस ली है.”

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