Satya Darshan

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र पर लगी रोक हटी

विधि दर्शन | मई 27, 2019

नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र कुछ महीनों से कानूनी पचड़े में फंसा हुआ था और पिछले सप्ताह दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसे स्थापित करने के सरकार के अध्यादेश पर लगी रोक हटा दी। सरकार ने मार्च में इस संबंध में मध्यस्थता अध्यादेश जारी किया था जिसे इंटरनैशनल सेंटर फॉर ऑल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन (आईसीएडीआर) ने इसे चुनौती दी थी। इस केंद्र की स्थापना संस्थागत मध्यस्थता के लिए स्वायत्त व्यवस्था बनाने और आईसीएडीआर की जिम्मेदारियों के अधिग्रहण के लिए की गई थी जो नई दिल्ली मध्यस्थता केंद्र में निहित थे।

आईसीएडीआर ने आरोप लगाया कि इस अध्यादेश की तत्काल कोई जरूरत नहीं थी फिर भी इसे जारी किया गया। सरकार ने इसका विरोध किया और कहा कि इस केंद्र को स्थापित करने के संबंध में एक विधेयकर लोक सभा में पारित हो चुका है लेकिन फरवरी में संसद के कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के कारण इसे राज्य सभा में पेश नहीं किया जा सका। वैकल्पिक विवाद समाधान के लिए एक केंद्र स्थापित करना सरकार के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों में शामिल है। बीएन श्रीकृष्ण आयोग और 84वीं संसदीय समिति ने इस तरह का केंद्र स्थापित करने की सिफारिश की थी।

आईसीएडीआर की स्थापना 1995 में की गई थी और इसका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था। इसमें मध्यस्थता के मामले नहीं आ रहे थे। सरकार ने दलील थी कि इन्हीं वजहों से अध्यादेश जारी किया गया। साथ में यह भी कहा गया कि उच्च न्यायालय की रोक के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील पर सुनवाई नहीं हो सकती है क्योंकि तीन पीठों के न्यायाधीश खुद को इससे अलग कर चुके हैं। उच्च न्यायालय ने अध्यादेश पर लगी रोक हटा दी और स्पष्ट किया कि उसका आदेश अंतरिम था और मुख्य रिट याचिका पर जुलाई में सुनवाई होगी।

न्यायालय ने कहा, 'आईसीएडीआर में लंबित मध्यस्थता के सभी मामलों उसी तरह चलते रहेंगे जैसे अध्यादेश जारी होने से पहले चल रहे थे। साथ ही पहले से यह संगोष्ठियां, सम्मेलन और प्रशिक्षण गतिविधियों भी अपने कार्यक्रम के मुताबिक चलेंगी।'

फ्लैट बिक्री से पहले लिखित अनुबंध

आवासीय परियोजना के डेवलपर का यह कर्तव्य है कि वह खरीदार से अग्रिम भुगतान मिलने पर बिक्री के लिए लिखित समझौता तैयार करे। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के फैसले को खारिज करते हुए यह बात कही। आयोग ने फ्लैट खरीदार की अपील को खारिज कर दिया था। न्यायालय ने सुमन जिंदल बनाम आदर्श डेवलपर्स वाद में कहा कि वित्तीय संस्थान से ऋण लेने के लिए यह समझौता जरूरी है।

इस मामले में डेवलपर ने भुगतान में कथित देरी के कारण आवंटन रद्द कर दिया। खरीदार ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया जिसने उसकी याचिका खारिज कर दी। अपील पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आयोग गलत था और कहा कि कर्नाटक में फ्लैटों के मालिकाना हक से संबंधित कानून में भी कहा गया है कि डेवलपर को लिखित समझौता करना होगा। इस बीच डेवलपर ने फ्लैट किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया। न्यायालय ने कहा कि यह बाद में हुई बिक्री है और इस पर मूल आवंटी का बड़ा दावा बनता है। फ्लैट उसके हवाले किया जाना चाहिए। 

बिल में दी गई राशि करें स्वीकार

उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह कहा कि प्रविष्टि बिल में उल्लेखित लेनदेन मूल्य को खारिज नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि इसकी कोई वाजिब वजह न हो। न्यायालय ने सेंचुरी मेटल रिसाइक्लिंग लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में यह बात कही। कंपनी एल्यूमीनियम की मिश्र धातु बनाती है जिसके लिए उसे अपनी खपत के लिए एल्यूमीनियम के कबाड़ का नियमित आयात करना पड़ता है।

उसकी समस्या यह है कि नोएडा में सीमा शुल्क विभाग के प्रधान आयुक्त प्रविष्टि बिल में उल्लेखित लेनदेन मूल्य के मुताबिक खेप को हरी झंडी देने से इनकार करते हैं। अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि कंपनी को एक पत्र लिखकर यह सहमति जतानी होगी कि वह उनके मूल्यांकन के मुताबिक सीमा शुल्क देगी। इस तरह कंपनी को सीमा शुल्क कानून के तहत अस्थायी मूल्यांकन के अपने अधिकार को त्यागने के लिए मजबूर किया जाता है।

न्यायालय ने उसकी अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि सीमा शुल्क अधिकारियों का आदेश गलत था और कानून के खिलाफ था। उन्होंने प्रविष्टि बिल में घोषित लेनदेन मूल्य को खारिज करने का कोई ठोस कारण नहीं दिया। 

उत्पाद कर में विवाद का समाधान

केंद्रीय उत्पाद कर कानून में एक नियम की व्याख्या को लेकर उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों के विचारों में विवाद को न्यायालय की व्यापक पीठ ने सेल बनाम केंद्रीय उत्पाद कर आयुक्त में अपने फैसले में हल कर दिया। सवाल यह था कि धारा 11एबी के तहत पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ उत्पाद शुल्क में अंतर पर ब्याज देय है। यह प्रावधान उत्पाद शुल्क के देरी से भुगतान पर ब्याज से संबंधित है।  

सेल ने दरों में संशोधन से पहले चुकाए गए उत्पाद शुल्क पर ब्याज की मांग का विरोध किया था। यह विरोध फैसलों के एक सेट पर निर्भर था। कई अन्य कंपनियों ने भी इस तरह की मांग का विरोध किया और उच्चतम न्यायालय में पहुंच गईं। मौजूदा पीठ ने इस कानून और आय कर कानून के समान प्रावधानों और दूसरे वाणिज्यिक नियमों का व्यापक अध्ययन करने के बाद सेल और अन्य कंपनियों के विरोध को खारिज कर दिया। 

काम के तनाव से मौत पर मुआवजा

एक स्वस्थ्य व्यक्ति सऊदी अरब गया और वहां भीषण गर्मी में ज्यादा काम करने के कारण तनाव में उसकी मौत हो गई। उसके करीबी संबंधी मुआवजा पाने के हकदार हैं और बीमा कंपनी इसके भुगतान के लिए बाध्य है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्टार हेल्थ ऐंड एलॉयड इंश्योरेंस कंपनी बनाम अंबेडकर सिंह वाद में यह बात कही। भारत छोडऩे से पहले दिल्ली में उनके स्वास्थ्य की जांच हुई थी और सऊदी अरब में काम शुरू करने से पहले बीमा कंपनी तथा नियोक्ता ने भी उन्हें स्वस्थ करार दिया था। जब उनकी मौत हुई तो उसके संबंधियों का कहना था कि मौत काम के दौरान हुई थी और कर्मचारी मुआवजा कानून के तहत वे मुआवजा पाने के हकदार हैं।

कंपनी की दलील थी कि मौत स्वाभाविक कारणों से हुई थी या मृतक ने अपनी बीमारी छिपाई थी। अगर मौत किसी ङ्क्षहसा की वजह से होती तो उसी सूरत में वह मुआवजा देती। निचली अदालत ने बीमा कंपनी की दलील को स्वीकार नहीं किया और मृतक के संबंधियों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने की बात कही। कंपनी ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जिसे खारिज कर दिया गया। 

चेक बाउंस के मामले में सुनवाई की जगह

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह व्यवस्था दी कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की संशोधित धारा 142 (2) में साफ किया गया है कि चेक बाउंस होने के मामलों में जहां चेक संग्रह के लिए डाला जाता है, वहीं अपराध के लिए मुकदमा चलेगा। न्यायालय ने साथ ही साफ किया कि न्यायक्षेत्र के बारे में आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों पर इस कानून के प्रावधान पर भारी पड़ेंगे। न्यायालय ने सोमानी वस्र्टेड बनाम ऐज इन्फ्राटेक मामले में यह बात कही। इस मामले में तीन याचिकाओं को दिल्ली से मेरठ हस्तांतरित करने का आदेश दिया गया क्योंकि चेक वहां जमा कराए गए थे।

 

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