Satya Darshan

देश में एक जगह ऐसी भी, जहां रोजगार है मगर कामगार नहीं

श्रेया | मई 13, 2019

इस बार लोकसभा चुनावों के दौरान जहां बेरोजगारी दर पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है, वहीं सोनीपत के औद्योगिक क्लस्टर इससे उलट तस्वीर बयां कर रहे हैं। इलाके के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रमों (एमएसएमई) में कुशल एवं अकुशल श्रमिकों की काफी तादाद में जरूरत है लेकिन कारखाने तक बमुश्किल ही श्रमिक आते हैं। 

उद्यमियों को डर है कि न्यूनतम आय योजना और पीएम-किसान जैसी योजनाओं से श्रमिकों की उपलब्धता और भी कम हो सकती है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने मतदाताओं से इस तरह की योजना लाने का वादा किया है। लेकिन उद्यमियों का कहना है कि इससे उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

राई औद्योगिक क्षेत्र में प्लास्टिक पैकेजिंग इकाई के मालिक आर देवगन ने कहा, 'हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश से श्रमिकों का आना लगभग बंद हो चुका है। कुशल श्रमिकों ने तो इस औद्योगिक इलाके से किनारा ही कर लिया है। हमें काफी संख्या में कुशल श्रमिकों की जरूरत है। अगर मैं न्यूनतम वेतन से ज्यादा पैसे देने को तैयार हो जाऊं तब भी इस शहर में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में वे यहां आना नहीं चाहेंगे।' 

सोनीपत में कुंडली, बरही और गन्नौर के औद्योगिक क्षेत्रों के अलावा नए औद्योगिक क्लस्टर के तौर पर राई औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना 2000 में की गई थी। सोनीपत जिले में करीब 13,000 पंजीकृत औद्योगिक इकाइयां हैं। सोनीपत में दो विनिर्माण इकाइयों के मालिक ए मनचंदा ने कहा, 'औद्योगिक क्लस्टरों में श्रमिकों के लिए बुनियादी सुविधाओं - आवास, अस्पताल और परिवहन सुविधाओं आदि का भारी अभाव है। सरकार हमसे ये सभी चीजें उपलब्ध कराने की उम्मीद करती है और हम ऐसा कर सकते हैं लेकिन उन्हें हमारी लागत कम करनी चाहिए। पिछले पांच साल में जमीन की लागत दस गुनी बढ़ गई है।' 

देवगन ने कहा कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में ऑनलाइन प्रक्रिया से जमीन की नीलामी में पारदर्शिता आई है लेकिन इसमें भू-माफिया हिस्सा लेते हैं और बाद में ज्यादा कीमत पर उसकी बिक्री करते हैं। कुंडली औद्योगिक क्षेत्र में 5-6 साल पहले श्रमिकों के लिए आवासीय सोसायटी बनाई गई थी, जो बेजार पड़ी है। 

श्रमिकों का दावा है कि ये मकान काफी महंगे हैं। प्रत्येक मकान की कीमत 13 लाख रुपये है जबकि उनका आकार बामुश्किल 10 गुना 8 वर्ग मीटर है और दीवार में दरारें पड़ी हैं और छत भी कमजोर है। 

कुंडली औद्योगिक एसोसिएशन के एक अधिकारी ने कहा, 'स्थानीय लोगों ने श्रमिकों को किराये पर देने के लिए काफी कम आकार के कमरे बनाए हुए हैं। और अधिकांश लोगों को मजबूरी में उनमें रहना पड़ता है।' इन क्लस्टरों का आवंटन हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम (एचएसआईआईडीसी) द्वारा किया गया और इनके विकास की जिम्मेदारी भी उसी की है। उद्योगों का दावा है कि एचएसआईआईडीसी इलाके में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में काफी सुस्त है। 

कुंडली औद्योगिक क्षेत्र के सुभाष गुप्ता ने कहा, 'हम हरित पट्टी का विकास कर रहे हैं, सीवर की सफाई करते हैं और श्रमिकों के लिए मेस भी बना रहे हैं। हमें निजी सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करनी पड़ी है और खुद से ऑटो भी चलवाने पड़ते हैं।' 

कुंडली में अधिकांश स्टेनलेस स्टील विनिर्माण इकाइयां हैं, जिनमें 2 लाख से ज्यादा श्रमिक काम करते हैं। बिजली आपूर्ति की समस्या, जमीन की ऊंची लगात और सुविधाओं की कमी की वजह से श्रमिक इलाके से दूर हो रहे हैं। 

गुप्ता ने कहा, 'कौन कहता है कि नौकरियां नहीं हैं? हमें कुशल श्रमिकों की जरूरत है। अभी यहां आने वाले अधिकतर अकुशल बेरोजगार लोग हैं। हम उन्हें प्रशिक्षित करते हैं लेकिन वे छोड़कर चले जाते हैं क्योंकि उनका पूरा वेतन बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च हो जाता है।' 

अब इस इलाके के उद्यमियों को एक नई समस्या का समाना करना पड़ सकता है। उद्यमियों का कहना है कि न्यूनतम आय योजना और पीएम-किसान आदि जैसी योजनाओं से श्रमिकों का यहां आना और भी कम हो जाएगा। पहले भी मनरेगा की वजह से श्रमिकों की किल्लत का सामना करना पड़ा था। 

गुप्ता ने कहा, 'अगर आपको घर बैठे 6 से 12 हजार रुपये प्रतिमाह मिलेंगे तो फिर काम करने कौन बाहर निकलेगा? अगर इलाके में बुनियादी सुविधाओं का विकास हो जाए तो फिर यह शहर अकेले लाखों रोजगार पैदा कर सकता है।'

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