Satya Darshan

लाखों प्रतियां बिकने वाली लुगदी साहित्यो के दिन क्या फिर बहुरेंगे

फैसल फरीद | मई 8, 2019

जबरदस्त सफलता के बाद भी भारत के ऐसे उपन्यासों को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा गया, जो 70 के दशक में युवा लोगों की पसंद होते थे. क्यों और कैसे लद गए 'लुगदी साहित्य' या अंग्रेजी में 'पल्प फिक्शन' के दिन.

आमतौर पर अगर किसी किताब की कुछ हजार प्रतियां भी बिक जाएं तो वह बेस्ट सेलर की श्रेणी में आ जाती है. लेकिन अगर किसी उपन्यास की 10 लाख प्रतियां बिक जाएं और वो भी हाथों हाथ, इतनी मांग हो कि प्रकाशक के लिए छाप पाना मुश्किल हो, तो उस उपन्यास को किस श्रेणी में रखेंगे.

कुछ ऐसा ही हुआ था साल 1991 में वेद प्रकाश शर्मा द्वारा लिखे गए उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा' के समय. मेरठ में तुलसी पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास ने धूम मचा दी थी. इसकी लाखों प्रतियां बिक गईं. इतनी जबरदस्त सफलता के बाद भी आज ऐसे उपन्यास को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता. इनके लिए एक नया शब्द बना दिया गया- 'लुगदी साहित्य' या फिर अंग्रेजी में 'पल्प फिक्शन'.

क्या है ये लुगदी साहित्य

मेरठ से प्रकाशित होने वाला ये लुगदी साहित्य एक समय पर खूब धूम मचाए रखता था. धड़ाधड़ छपता था और उससे भी तेजी से बिक जाता था. उस दौर यानी 70 के दशक के बाद से अकसर लोगों के हाथ में मोटे मोटे नावेल रहते थे. ट्रेन हो या बस अड्डा - हर जगह ये उपलब्ध रहती थीं. लोग इनको बड़े शौक से पढ़ते थे. जब घर से बाहर निकलते तो हाथ में एक उपन्यास रखना जैसे कोई फैशन स्टेटमेंट होता था. फिर भी इसको बच्चों से दूर रखा जाता था. उस समय ऐसे उपन्यास पढ़ने का एक तरह से  मतलब होता था कि वह व्यक्ति अब बड़ा हो गया है. तब इतना खुलापन नहीं था और ये उपन्यास ही एक जरिया थे, जिससे उस समय की पीढ़ी थोड़ा बहुत रोमांचित महसूस करती थी.

Zeitschriftenstand in Kalkutta

(रेलवे स्टेशन, बस अड्डे से लेकर रेड़ी पर भी बिकती थीं ये किताबें)

इस पूरे साहित्य को बड़े समीक्षक लुगदी साहित्य कहते थे. लेकिन तमाम बड़े लेखक भी अपना नाम छुपा कर इनको लिखते थे. कारण था ये बिकता था और इसमें पैसा तुरंत मिल जाता था. मेरठ इस प्रकार के साहित्य का अड्डा बन गया था.

शुरुआत और फलने फूलने का दौर

इन उपन्यासों की शुरुआत तो वैसे वाराणसी में देवकी नंदन खत्री ने की थी. उसके बाद ये इलाहाबाद पहुंचा जहां कुछ उर्दू पत्रिकाएं निकलने लगीं. फिर ओम प्रकाश शर्मा इसको मेरठ ले आए. उन्होंने यहां जनप्रिय प्रकाशन की नींव डाली. उसके बाद व्यवसायी नरेश जैन ने कमल प्रकाशन शुरू किया, जिसमें प्रेम बाजपेयी लिखते थे. फिर वेद प्रकाश कम्बोज ने सीक्रेट सर्विस पब्लिकेशन शुरू किया. कम्बोज के पांच पुत्र थे और फिर पांचों ने अपना अलग अलग प्रकाशन शुरू कर दिया. इस तरह मेरठ में बहुत सारे प्रकाशन समूह हो गए.

बहुत सारे लेखक भी उपलब्ध हो गए जिन्होंने उपन्यास लिखने शुरू कर दिए. बहुत सारी सीरीजें आईं, जिसमें जासूसी, क्रांतिकारी, थ्रिलर, क्राइम, सस्पेंस, पारिवारिक सीरीज शुरू हुई. कुछ किरदार तो बहुत मशहूर हुए जैसे केशव पंडित, विभा जिंदल, विजय विकास इत्यादि. लेखक इतनी तेजी से लिखते थे कि महीने में दो उपन्यास पूरे हो जाते. इनके कवर भी बड़े आकर्षक बनाये जाते थे और ज्यादातर हिंदी सिनेमा से प्रेरित रहते थे. ये कवर हाथ से डिजाइन करके बनाये जाते थे क्योंकि तब कंप्यूटर डिजाइनिंग इतनी सुगम नहीं थी.

सफलतम उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा' प्रकाशित करने वाले तुलसी पेपर बुक्स के संस्थापक सुरेश जैन ऋतुराज बताते हैं, "वो इसका स्वर्णिम दौर था. लगभग 70 के दशक के बाद शुरू हुआ. हमने भी पहला उपन्यास 1972 में लिखा. लोगों में जबरदस्त मांग थी. हर कोई पढ़ना चाहता था.”

'सुपरस्टार' लेखक

मांग का अंदाजा इससे लगता है कि अकेले वेद प्रकाश शर्मा ने ही 170 से अधिक उपन्यास लिख डाले. एक अनुमान के अनुसार इनका हर उपन्यास कोई लाख प्रतियों में छप कर बिकता था. इस प्रकार के लेखकों की लंबी लाइन लग गई, जैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक, राजहंस, गुलशन नंदा, अनिल मोहन, रानू, कुशवाहा कान्त इत्यादि. कुछ लेखक जोड़ी में लिखते थे जैसे धरम राकेश, राम रहीम इत्यादि. महिलाओं में इनकी लोकप्रियता अलग तरह की थी. हर लेखक सौ से ज्यादा उपन्यास लिख डालता था. उस दौर में जब प्रख्यात लेखक पैसे की तंगी से जूझते थे और तमाम साहित्यिक पत्रिकाएं पैसे की कमी की वजह बंद हो रही थीं, वहीं ऐसे लेखक और उनके उपन्यास धड़ाधड़ बिक रहे थे. इन उपन्यासों की कीमत कम ही होती थी, लगभग 40 रुपये प्रति. सब खुश थे- लेखक, प्रकाशक और पाठक भी.

सबसे बड़ी बात इतनी ज्यादा बिकने के लिए कोई पब्लिसिटी भी नहीं करनी पड़ती थी. उस समय हर लेखक की 50 हजार प्रतियां बिक जाना आम बात थी और प्रति उपन्यास एक रूपया भी मिल गया तो पचास हजार की कमाई उस समय के लिए बहुत बड़ी रकम होती थी.

इन उपन्यासों के शीर्षक बड़े रोचक होते थे. जैसे- 'क्यूंकि वो बीवियां बदलते हैं' या 'छह सर वाला रावण', '65 लाख की डकैती', 'कानून किसी का बाप नहीं', 'एक करोड़ की दुल्हन', 'एक दिन का हिटलर' इत्यादि.

लोकप्रियता खोने की वजह 

लेकिन ये फलती फूलती इंडस्ट्री एकदम से खत्म हो गई. अब इक्का दुक्का प्रकाशक ही बचे हैं और वो भी यदा कदा ही कुछ छापते हैं. ऋतुराज इसका कारण टीवी को मानते हैं जिसके आने से उपन्यास पढ़ने की इच्छा एकदम से खत्म हो गई. इन किताबों का पाठक समूह अब सास बहू के सीरियल और फिर तमाम टीवी कार्यक्रमों के लपेटे में आ गया. इसके बाद रही सही कसर इंटरनेट और मोबाइल ने पूरी कर दी और हाल ये है कि अब ये इंडस्ट्री अपनी अंतिम सांसें ले रही है.

क्राइम फिक्शन लिखने वाले और रवि पॉकेट बुक्स से लगातार छप रहे युवा उपन्यासकार एम इकराम फरीदी इसके लिए प्रकाशक समूह को जिम्मेदार मानते हैं. पिछले चार सालों में फरीदी के सात उपन्यास आ चुके हैं. वे बताते हैं, "तीन लेखक वेद प्रकाश शर्मा, अनिल मोहन और सुरेन्द्र मोहन पाठक के बाद पॉकेट बुक्स वालों ने किसी को जमने नहीं दिया. अब ये लोग ट्रेड नाम से लिखवाते हैं. ट्रेड नाम प्रकाशक खुद रजिस्टर करवा लेता है. अब उसमें घोस्ट राइटिंग करनी होती है, मैंने भी की है. लेकिन इसमें मजदूरी वाली फीलिंग आती है जैसे एक उपन्यास लगभग 250 पन्ने का है तो उसके 15,000 मिल जायेंगे. प्रकाशक के पास कई घोस्ट राइटर होते हैं और वो किसी न किसी से ले लेता है. नए लेखकों को इन्होंने जमने ही नहीं दिया. जब नया आएगा नहीं तो पाठक कैसे टिकेगा.”

इतना सब होने के बाद भी इस साहित्य को कभी वो दर्जा नहीं मिला. कम लागत और ज्यादा मुनाफा होने के बावजूद भी इसके लेखक वो सम्मान नहीं पा सके. इसको लुगदी साहित्य कहा जाने लगा. 

ऋतुराज हालांकि इससे सहमत नहीं हैं. वो कहते हैं, "साहित्य वो होता है जिसमें सबका हित हो. ऐसे साहित्य का क्या मतलब जो सिर्फ लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाए. हमारे उपन्यास में आम बोलचाल की भाषा होती थी. सड़क पर चलने वाला हर आदमी इसको खरीद कर पढ़ और समझ सकता था. ऐसी किताब का क्या मतलब जब उसमें इतने मुश्किल शब्द हों कि आपको शब्दकोष देखना पड़ जाये.”

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